क्या बिरजू महाराज ने नृत्य में ट्रेन का जादू बिखेरा था?
सारांश
Key Takeaways
- बिरजू महाराज का जन्म 4 फरवरी 1938 को लखनऊ में हुआ।
- उनकी कला ने कथक को नई पहचान दी।
- उन्होंने अपने नृत्य से कहानी सुनाई।
- उन्हें पद्म विभूषण जैसे कई पुरस्कार मिले।
- उनकी सादगी और तहजीब ने उन्हें खास बनाया।
मुंबई, 16 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। संध्या का समय था, लखनऊ के एक प्राचीन घर के आंगन में सात-आठ साल का एक दुबला-पतला लड़का अपने पैरों में बंधे भारी घुंघरुओं के साथ ऐसी जुगलबंदी कर रहा था कि वहां मौजूद उस्ताद भी हैरान रह गए। उस बच्चे के पैर जमीन पर नहीं, बल्कि ताल के बारीक धागे पर थिरक रहे थे, जिसे पकड़ना बड़े-बड़े दिग्गजों के लिए असंभव था। यह बच्चा और कोई नहीं, बल्कि भविष्य का कथक सम्राट पंडित बिरजू महाराज थे।
बिरजू महाराज का बचपन किसी परीकथा जैसा सुखद नहीं था। 4 फरवरी 1938 को लखनऊ के मशहूर कालका-बिन्दादीन घराने में उनका जन्म हुआ और उनका नाम 'दुखहरण' रखा गया। शायद परिवार को पता था कि यह बच्चा अपने हुनर से न केवल अपने घर का, बल्कि पूरी कला बिरादरी का दुख हर लेगा। बाद में उनका नाम 'बृजमोहन नाथ मिश्रा' पड़ा, जो दुनिया के लिए 'बिरजू महाराज' बन गए।
महज नौ साल की उम्र में पिता और गुरु अच्छन महाराज का साया उनके सिर से उठ गया। उस छोटी उम्र में, जब बच्चे खिलौनों से खेलते हैं, बिरजू महाराज के कंधों पर सदियों पुरानी विरासत को संभालने का भार आ गया। उन्होंने अपने चाचाओं (लच्छू महाराज और शंभू महाराज) की देखरेख में अपनी कला को निखारा और उसे एक नई पहचान दी।
बिरजू महाराज की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि वे केवल नृत्य नहीं करते थे, वे 'कहानी' सुनाते थे। 'कथक' शब्द का अर्थ है 'कथा' कहे सो कथक कहावे। उनके हाथों की भंगिमाएं और आंखों की हरकतें बिना बोले ही पूरी रामायण या कृष्णलीला का बखान कर देती थीं।
एक बार का किस्सा मशहूर है कि उन्होंने एक मंच पर केवल अपने पैरों की थाप से ट्रेन के चलने की आवाज, उसके इंजन की सीटी और पटरी की खटखटाहट उत्पन्न कर दी थी। दर्शक अपनी आंखों और कानों पर विश्वास नहीं कर पा रहे थे।
बहुत कम लोग जानते हैं कि बिरजू महाराज जितने अच्छे नर्तक थे, उतने ही अद्वितीय गायक और संगीतकार भी थे। उनकी ठुमरी सुनने वाले मंत्रमुग्ध हो जाते थे। शास्त्रीय संगीत के सख्त अनुशासन को उन्होंने बड़े प्यार से फिल्मी पर्दे पर भी प्रस्तुत किया।
सत्यजीत रे की 'शतरंज के खिलाड़ी' से लेकर संजय लीला भंसाली की 'देवदास' और 'बाजीराव मस्तानी' तक, उन्होंने कथक को ग्लैमर में भी उसकी पवित्रता के साथ पेश किया। 'काहे छेड़ मोहे' (देवदास) में माधुरी दीक्षित के भाव हों या 'मोहे रंग दो लाल' (बाजीराव मस्तानी) में दीपिका पादुकोण की नजाकत, इन सबके पीछे बिरजू महाराज की वह पारखी नजर थी जो जानती थी कि कैमरा और कला का तालमेल कैसे बैठाना है। उन्हें फिल्म 'विश्वरूपम' के लिए नेशनल अवार्ड से भी सम्मानित किया गया था।
दुनियाभर के सबसे बड़े मंचों पर प्रदर्शन करने और पद्म विभूषण जैसे सम्मान प्राप्त करने के बावजूद महाराज जी दिल से एक 'लखनवी रईस' थे, पैसों से नहीं, तहजीब से। उन्हें पतंग उड़ाने और गैजेट्स का बड़ा शौक था। वे अक्सर बच्चों की तरह नई मशीनों और मोबाइल को देखकर चकित होते थे। उनके पास बैठने वाला हर शख्स उनकी सादगी का कायल हो जाता था।
17 जनवरी 2022 को जब दिल्ली की सर्द रात में उन्होंने अपनी आखिरी सांस ली, तो मानो कथक के पैरों से घुंघरू ही छिटककर बिखर गए, लेकिन बिरजू महाराज केवल एक नर्तक नहीं थे। वे तो एक बहती हुई नदी थे, जिसमें लय, सुर, ताल और अभिनय का संगम था।