बड़ा फैसला: कलकत्ता हाईकोर्ट ने बाइक प्रतिबंध पर चुनाव आयोग को लगाई कड़ी फटकार, मांगा जवाब
सारांश
Key Takeaways
- कलकत्ता हाईकोर्ट ने 23 अप्रैल 2025 को बंगाल चुनाव से पहले बाइक प्रतिबंध पर चुनाव आयोग को कड़ी फटकार लगाई।
- जस्टिस कृष्णा राव ने पूछा कि क्या पिछले वर्षों में बाइक से चुनावी हिंसा के ठोस मामले दर्ज हैं।
- EC ने चुनाव से 2 दिन पहले मोटरसाइकिल रैलियों पर पूर्ण प्रतिबंध और पीछे सवारी बैठाने पर रोक लगाई है।
- मेडिकल इमरजेंसी, स्कूल, फूड डिलीवरी और ऐप-टैक्सी सेवाओं को प्रतिबंध से छूट दी गई है।
- विशेष परिस्थितियों में बाइक चलाने के लिए स्थानीय पुलिस स्टेशन से लिखित अनुमति अनिवार्य होगी।
- चुनाव आयोग को शुक्रवार तक हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया गया है, जिसमें प्रतिबंध के कारण स्पष्ट करने होंगे।
कोलकाता, 23 अप्रैल 2025 — कलकत्ता हाईकोर्ट ने पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव से ठीक पहले चुनाव आयोग (EC) द्वारा मोटरसाइकिलों पर लगाए गए प्रतिबंध को लेकर कड़ा रुख अपनाया है। जस्टिस कृष्णा राव की अध्यक्षता वाली पीठ ने गुरुवार को सुनवाई के दौरान आयोग से स्पष्ट जवाब माँगा कि यह पाबंदी किन ठोस परिस्थितियों के आधार पर लगाई गई और इससे आम नागरिकों की मौलिक स्वतंत्रता किस हद तक प्रभावित होती है।
अदालत ने क्यों उठाए सवाल
जस्टिस कृष्णा राव ने सुनवाई के दौरान तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि नागरिकों की स्वतंत्रता को इस तरह एकतरफा तरीके से नहीं छीना जा सकता। उन्होंने पूछा कि अगर सुरक्षा चिंता इतनी गंभीर थी, तो केवल मोटरसाइकिल को ही निशाना क्यों बनाया गया — अन्य वाहनों पर प्रतिबंध क्यों नहीं लगाया गया?
अदालत ने यह भी जानना चाहा कि पिछले कुछ वर्षों में ऐसे कितने दर्ज मामले हैं जिनमें बाइक का उपयोग करके चुनावी हिंसा या अराजकता फैलाई गई हो। यह सवाल सीधे तौर पर आयोग के फैसले की तथ्यात्मक नींव पर प्रहार करता है।
चुनाव आयोग की अधिसूचना का विवरण
चुनाव आयोग ने हाल ही में एक अधिसूचना जारी की थी, जिसके अनुसार चुनाव से दो दिन पहले मोटरसाइकिल रैलियों पर पूर्ण प्रतिबंध रहेगा। सीमित परिस्थितियों में सुबह 6 बजे से शाम 6 बजे तक अकेले बाइक चलाने की अनुमति दी गई थी, लेकिन पीछे किसी सवारी को बैठाने पर रोक लगाई गई।
चुनाव के दिन भी बाइक का उपयोग केवल मतदान या किसी अत्यावश्यक कार्य के लिए ही अनुमत होगा। आयोग ने स्पष्ट किया कि यह प्रतिबंध मेडिकल इमरजेंसी, बच्चों को स्कूल पहुँचाने, पारिवारिक आवश्यकताओं, ऐप-आधारित टैक्सी सेवाओं और फूड डिलीवरी जैसी जरूरी सेवाओं पर लागू नहीं होगा।
हालाँकि, जो व्यक्ति इन छूटों से अलग किसी विशेष कारण से बाइक चलाना चाहता है, उसे स्थानीय पुलिस स्टेशन से लिखित अनुमति लेनी होगी — एक प्रक्रिया जिसे आलोचक बोझिल और व्यावहारिक रूप से कठिन मानते हैं।
मामला अदालत तक कैसे पहुँचा
इस अधिसूचना के विरुद्ध बुधवार को कलकत्ता हाईकोर्ट का ध्यान आकर्षित किया गया, जिसके बाद अदालत ने याचिका दाखिल करने की अनुमति दे दी। गुरुवार को हुई सुनवाई में जस्टिस कृष्णा राव ने मामले को गंभीरता से सुना और चुनाव आयोग को शुक्रवार तक विस्तृत हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया।
आयोग ने अदालत को आश्वस्त किया कि वह हलफनामे में उन पूर्व घटनाओं का विवरण देगा जिनके आधार पर यह निर्णय लिया गया।
गहरा संदर्भ: नागरिक अधिकार बनाम चुनावी सुरक्षा
यह मामला महज एक प्रशासनिक विवाद नहीं है — यह उस बड़े सवाल को उठाता है कि चुनाव आयोग की शक्तियाँ कहाँ समाप्त होती हैं और नागरिक अधिकार कहाँ शुरू होते हैं। पश्चिम बंगाल में चुनावी हिंसा का इतिहास रहा है, लेकिन किसी एक वाहन को चुनकर उस पर प्रतिबंध लगाना — बिना डेटा-आधारित औचित्य के — न्यायिक दृष्टि से कमजोर स्थिति है।
गौरतलब है कि 2021 के बंगाल विधानसभा चुनाव के दौरान भी व्यापक हिंसा की शिकायतें आई थीं और उस समय भी आयोग की भूमिका पर सवाल उठे थे। इस बार यदि आयोग ठोस आँकड़े प्रस्तुत नहीं कर पाया, तो यह प्रतिबंध न्यायिक समीक्षा में टिक नहीं पाएगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे प्रतिबंध विशेष रूप से उन मतदाताओं को प्रभावित करते हैं जो सार्वजनिक परिवहन से दूर ग्रामीण या अर्ध-शहरी क्षेत्रों में रहते हैं और जिनके लिए बाइक ही एकमात्र यातायात साधन है।
आगे क्या होगा
शुक्रवार को चुनाव आयोग द्वारा हलफनामा दाखिल किए जाने के बाद अदालत अगली सुनवाई में यह तय करेगी कि प्रतिबंध को यथावत रखा जाए, संशोधित किया जाए या पूरी तरह रद्द किया जाए। इस फैसले का असर न केवल पश्चिम बंगाल के मतदाताओं पर, बल्कि भविष्य में अन्य राज्यों में होने वाले चुनावों में आयोग की नीतियों पर भी पड़ सकता है।