क्या केंद्रीय बजट 2026 से उद्योग जगत को नीति स्थिरता और स्पष्टता की उम्मीद है?
सारांश
Key Takeaways
- नीति स्थिरता और स्पष्टता की आवश्यकता।
- सरल प्रक्रियाएं और व्यावहारिक प्रोत्साहन का महत्व।
- ग्लोबल अनिश्चितता के बीच मध्यम अवधि की आर्थिक योजना।
- नवीकरणीय ऊर्जा को प्राथमिकता दी गई।
- टैक्स विवादों का जल्दी समाधान आवश्यक।
नई दिल्ली, 26 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। जैसे-जैसे केंद्रीय बजट 2026-27 पेश होने का समय नजदीक आ रहा है, उद्योग जगत में एक स्पष्ट परिवर्तन देखने को मिल रहा है। कंपनियां अब बड़ी घोषणाओं की बजाय नीतियों की दिशा, निरंतरता और सही अमल पर ध्यान केंद्रित कर रही हैं। यह जानकारी सोमवार को एक सर्वेक्षण में प्राप्त हुई है।
ग्रांट थॉर्नटन भारत के 'प्री-बजट सर्वे 2026' के अनुसार, वैश्विक अनिश्चितता और सरकार के राजकोषीय घाटे को घटाने के प्रयासों के बीच बजट 2026 को भारत की मध्यम अवधि की आर्थिक योजना का संकेतक माना जा रहा है। सरकार का लक्ष्य घाटे को जीडीपी के लगभग 4.4 प्रतिशत तक लाना है।
अनुमान है कि वित्त वर्ष 2026 में भारतीय अर्थव्यवस्था 6.5 से 7 प्रतिशत की दर से बढ़ेगी। केंद्र सरकार का पूंजीगत खर्च अब वित्त वर्ष 2020 की तुलना में तीन गुना से अधिक हो चुका है। ऐसे में कंपनियों को लंबी अवधि के निर्णयों के लिए स्थिर नीतियां, व्यावहारिक प्रोत्साहन और सरल प्रक्रियाएं चाहिए, न कि अस्थायी उपाय।
सर्वेक्षण के अनुसार, उद्योग जगत संतुलित रणनीति के पक्षधर हैं। लगभग 35 प्रतिशत व्यक्तियों का मानना है कि विकास और रोजगार को प्राथमिकता मिलनी चाहिए, भले ही घाटा कम करने की गति थोड़ी धीमी हो।
इस बीच, 28 प्रतिशत लोग घाटा नियंत्रण और विकास खर्च के बीच संतुलन की मांग कर रहे हैं। इसके अलावा, 26 प्रतिशत ने निवेशकों का विश्वास बनाए रखने के लिए सख्त वित्तीय अनुशासन पर जोर दिया है।
व्यापार के मोर्चे पर, सरल और विश्वसनीय निर्यात प्रोत्साहन प्रणाली को सबसे महत्वपूर्ण माना गया है, जिसे 40 प्रतिशत लोगों का समर्थन प्राप्त हुआ। इसके बाद 31 प्रतिशत ने प्रमुख देशों के साथ मुक्त व्यापार समझौतों (एफटीए) को पूरा करने पर जोर दिया।
नए आयकर कानून में बदलाव के दौरान कंपनियां कम परेशानी चाहती हैं। 28 प्रतिशत लोग जुर्माने में ढील के साथ अधिक समय की मांग कर रहे हैं। 26 प्रतिशत विशेष सहायता केंद्रों की आवश्यकता का उल्लेख कर रहे हैं, जबकि 25 प्रतिशत उद्योग और सरकार के बीच सीधी बातचीत पर जोर दे रहे हैं।
नौकरीपेशा करदाताओं के लिए 44 प्रतिशत का मानना है कि कम टैक्स दरें या अधिक टैक्स स्लैब नई कर व्यवस्था को आकर्षक बना सकते हैं। वहीं 26 प्रतिशत सीमित कटौतियों की मांग कर रहे हैं।
सर्वेक्षण में कहा गया है कि नवाचार फंड और रिसर्च एंड डेवलपमेंट पर टैक्स छूट को सबसे प्रभावी उपाय माना गया है। इससे नई तकनीक में निवेश और जोखिम दोनों कम होते हैं। इसके साथ ही सरकार-निजी साझेदारी को भी आवश्यक बताया गया है।
लंबी अवधि के निवेश के लिए स्पष्टता और विश्वास को सबसे महत्वपूर्ण माना गया है। लगभग 41 प्रतिशत लोगों ने इनविटेशनल इन्वेस्टमेंट्स (इनविट्स), रीइट्स और इंफ्रास्ट्रक्चर बॉंड के लिए स्थिर टैक्स व्यवस्था की मांग की है।
इसके बाद 23 प्रतिशत ने पीपीपी परियोजनाओं में टैक्स स्पष्टता और 19 प्रतिशत ने विदेशी फंडिंग की मंजूरी प्रक्रिया को सरल करने पर जोर दिया।
नवीकरणीय ऊर्जा और ऊर्जा भंडारण को 43 प्रतिशत ने सबसे बड़ी प्राथमिकता दी, जबकि शहरी ढांचा (26 प्रतिशत) और परिवहन व लॉजिस्टिक्स (21 प्रतिशत) की स्थिति रही।
40 प्रतिशत उद्योगों ने लाइसेंस और नियमों को सरल बनाने को सबसे आवश्यक बताया, जबकि 33 प्रतिशत चाहते हैं कि सरकारी सेवाएं निर्धारित समय में पूरी हों।
सर्वेक्षण में कहा गया कि टैक्स विवादों का शीघ्र समाधान आवश्यक है, लेकिन उससे भी अधिक आवश्यक स्पष्ट नियम और सरल प्रक्रिया है।
ग्रांट थॉर्नटन भारत की टैक्स पार्टनर रिचा साहनी ने कहा कि टैक्स, व्यापार और कस्टम्स के सभी क्षेत्रों में कंपनियां स्पष्टता और स्थिरता की आकांक्षा रखती हैं, ताकि उनका काम बिना किसी रुकावट के आगे बढ़ सके।
कस्टम्स के मामले में, अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुसार नियम और आवश्यक कच्चे माल पर कम शुल्क को सबसे प्रभावी उपाय बताया गया है। इसके साथ ही ड्यूटी की स्पष्ट योजना की भी आवश्यकता बताई गई है।