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चैतुरगढ़ मंदिर कोरबा: मां महिषासुर मर्दिनी का प्राचीन धाम और लाफागढ़ किले का इतिहास

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चैतुरगढ़ मंदिर कोरबा: मां महिषासुर मर्दिनी का प्राचीन धाम और लाफागढ़ किले का इतिहास

सारांश

कोरबा की पहाड़ियों पर बसा चैतुरगढ़ महज एक मंदिर नहीं — यह बारह भुजाओं वाली देवी, राजा पृथ्वीदेव प्रथम के किले और सात किलोमीटर लंबी प्राचीर का जीवंत इतिहास है। 1920 से संरक्षित यह धाम नवरात्रि में आस्था का महाकेंद्र बन जाता है।

मुख्य बातें

चैतुरगढ़ मंदिर , जिसे लाफागढ़ भी कहा जाता है, छत्तीसगढ़ के कोरबा जिले में स्थित है और मां महिषासुर मर्दिनी का प्राचीन धाम है।
किले का निर्माण राजा पृथ्वीदेव प्रथम ने कराया था; 17 दिसंबर 1920 को इसे संरक्षित स्मारक घोषित किया गया।
गर्भगृह में देवी की बारह भुजाओं वाली प्रतिमा स्थापित है; किले की बाउंड्रीवॉल 7 किलोमीटर तक फैली है।
पहाड़ी के शीर्ष पर पाँच तालाब हैं, जिनमें से तीन में वर्षभर पानी रहता है।
मंदिर से लगभग 2.5–3 किमी दूर शंकर गुफा स्थित है, जो लगभग 25–35 फीट गहरी बताई गई है।
मंदिर में तीन सार्वजनिक प्रवेश द्वार — मेनका द्वार, हुंकारा द्वार और सिंहद्वार — तथा एक चौथा गुप्त द्वार है।

छत्तीसगढ़ के कोरबा जिले में पहाड़ियों और घने वनों के मध्य स्थित चैतुरगढ़ मंदिर — जिसे लाफागढ़ के नाम से भी जाना जाता है — धार्मिक श्रद्धा, प्राचीन स्थापत्य और प्राकृतिक वैभव का दुर्लभ संगम है। यह स्थल मां महिषासुर मर्दिनी के पवित्र मंदिर के लिए समूचे छत्तीसगढ़ में विख्यात है। कोरबा जिला प्रशासन के अनुसार, 17 दिसंबर 1920 को इसे संरक्षित स्मारक घोषित किया गया था।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और किले का निर्माण

कोरबा जिला प्रशासन के विवरण के अनुसार, चैतुरगढ़ किले का निर्माण राजा पृथ्वीदेव प्रथम ने कराया था। ऊंची पहाड़ी पर स्थित होने के कारण इसकी प्राकृतिक भौगोलिक बनावट ही इसकी मुख्य सुरक्षा-व्यवस्था रही होगी। किले के कुछ हिस्सों में अतिरिक्त सुरक्षा के लिए पत्थर की दीवारें भी खड़ी की गई थीं।

छत्तीसगढ़ संस्कृति विभाग ने इस किले और मंदिर को संरक्षित ऐतिहासिक धरोहर के रूप में अभिलेखबद्ध किया है। गौरतलब है कि छत्तीसगढ़ की प्राचीन रियासतों की स्थापत्य परंपरा में पहाड़ी किलों का विशेष महत्व रहा है, और चैतुरगढ़ उस परंपरा का एक प्रमुख प्रतिनिधि है।

मां महिषासुर मर्दिनी — शक्ति और विजय का प्रतीक

चैतुरगढ़ की केंद्रीय पहचान यहाँ के मंदिर के गर्भगृह में स्थापित बारह भुजाओं वाली देवी प्रतिमा है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां दुर्गा ने महिषासुर नामक असुर का वध कर देवताओं और समस्त सृष्टि को उसके अत्याचारों से मुक्त किया था, इसीलिए उन्हें महिषासुर मर्दिनी कहा जाता है।

मंदिर के पुजारी हरीश कुमार पांडेय, जो पिछले 17 वर्षों से माता की सेवा में संलग्न हैं, ने बताया: 'महिषासुर राक्षस को मारने के बाद माता इस जगह पर आकर विराजमान हुई हैं। उन्होंने राजा को सपने में बोला था कि वे यहाँ पर मंदिर बनाएं। जब वे यहाँ आए तो देखा कि माता की भव्य मूर्ति रखी हुई थी। उसके बाद उन्होंने मंदिर का निर्माण कराया। साथ ही तालाब बनवाया। सात किलोमीटर तक बाउंड्रीवॉल कराकर किले का निर्माण कराया था।'

किले की संरचना और प्रवेश द्वार

चैतुरगढ़ किले के तीन प्रमुख प्रवेश द्वार — मेनका द्वार, हुंकारा द्वार और सिंहद्वार — का उल्लेख ऐतिहासिक विवरणों में मिलता है। छत्तीसगढ़ संस्कृति विभाग के अभिलेखों में इन प्रवेश द्वारों के कुछ स्थानीय नाम भिन्न रूप में भी दर्ज हैं। पुजारी पांडेय के अनुसार मंदिर में आने के तीन सार्वजनिक गेट हैं, जबकि एक चौथा गुप्त द्वार भी बताया जाता है।

किले की समग्र संरचना इस तथ्य की पुष्टि करती है कि प्राचीन काल में प्राकृतिक भूगोल का सैन्य सुरक्षा में कुशलतापूर्वक उपयोग किया जाता था — पहाड़ी का उत्तुंग आधार और चारों ओर के घने जंगल स्वाभाविक अवरोध का काम करते थे।

प्राकृतिक धरोहर — तालाब, पठार और शंकर गुफा

पहाड़ी के शीर्ष पर एक समतल पठार है जहाँ पाँच तालाब स्थित हैं; इनमें से तीन में वर्षभर जल उपलब्ध रहने का उल्लेख मिलता है। मंदिर से लगभग तीन किलोमीटर की दूरी पर शंकर गुफा है, जो सुरंग जैसी संकरी बनावट की है और लगभग 25 फीट लंबी बताई गई है।

पुजारी पांडेय के अनुसार, 'मंदिर से 2.5 किमी दूर भगवान शिव की गुफा है, जिसमें 35 फीट घुटनों के बल जाने पर भगवान शंकर के दर्शन होते हैं।' ये प्राकृतिक संरचनाएं चैतुरगढ़ को केवल धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि एक समृद्ध भौगोलिक-ऐतिहासिक परिसर बनाती हैं।

नवरात्रि में श्रद्धालुओं की आस्था

नवरात्रि के दौरान चैतुरगढ़ में विशेष पूजा-अर्चना होती है और छत्तीसगढ़ के विभिन्न हिस्सों से श्रद्धालु यहाँ दर्शन के लिए आते हैं। एक महिला श्रद्धालु ने अपने अनुभव साझा करते हुए कहा, 'मैं दूसरी बार यहाँ आई हूँ। माता का दर्शन करके बहुत अच्छा लगा। मां का स्वरूप बहुत ही अच्छा है; वे अपने श्रद्धालुओं की सभी मन्नत पूरी करती हैं।' एक अन्य श्रद्धालु ने बताया कि वे पूरे परिवार सहित आए हैं और यहाँ बहुत सुकून महसूस हो रहा है।

यह ऐसे समय में और भी प्रासंगिक है जब छत्तीसगढ़ में धार्मिक पर्यटन को राज्य सरकार की प्राथमिकताओं में स्थान मिल रहा है। चैतुरगढ़ जैसे स्थल — जो इतिहास, प्रकृति और आस्था का त्रिवेणी-संगम हैं — आने वाले वर्षों में और अधिक आगंतुकों को आकर्षित कर सकते हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

जबकि इनका वास्तविक मूल्य उनके पुरातात्विक और प्रशासनिक उपेक्षा के सवालों में छुपा है। 1920 में संरक्षित घोषित यह स्मारक एक सदी से अधिक पुरानी विरासत है, फिर भी संरक्षण की स्थिति और पर्यटन अवसंरचना पर ठोस सरकारी आँकड़े सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं हैं। छत्तीसगढ़ में धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देने की राज्य सरकार की नीतियों के बावजूद, ऐसे दूरस्थ किले-मंदिर परिसरों तक पहुँच और उनके संरक्षण बजट की पारदर्शिता पर ध्यान देना ज़रूरी है।
RashtraPress
15 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

चैतुरगढ़ मंदिर कहाँ स्थित है और इसे लाफागढ़ क्यों कहते हैं?
चैतुरगढ़ मंदिर छत्तीसगढ़ के कोरबा जिले में पहाड़ियों और घने जंगलों के बीच स्थित है। इसे लाफागढ़ के नाम से भी जाना जाता है — यह स्थानीय प्रचलित नाम है जो इस किले-मंदिर परिसर की पहाड़ी भौगोलिक स्थिति से जुड़ा है।
मां महिषासुर मर्दिनी कौन हैं और इनकी मूर्ति कैसी है?
मां महिषासुर मर्दिनी देवी दुर्गा का वह स्वरूप है जिन्होंने महिषासुर नामक असुर का वध किया था। चैतुरगढ़ मंदिर के गर्भगृह में देवी की बारह भुजाओं वाली प्राचीन प्रतिमा स्थापित है, जो शक्ति और बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक मानी जाती है।
चैतुरगढ़ किले का निर्माण किसने कराया था?
कोरबा जिला प्रशासन के अनुसार, चैतुरगढ़ किले का निर्माण राजा पृथ्वीदेव प्रथम ने कराया था। किले की सात किलोमीटर लंबी बाउंड्रीवॉल और तीन सार्वजनिक प्रवेश द्वार इसकी प्राचीन सैन्य वास्तुकला के प्रमाण हैं।
चैतुरगढ़ को संरक्षित स्मारक कब घोषित किया गया?
छत्तीसगढ़ संस्कृति विभाग के अनुसार, चैतुरगढ़ के किले और मंदिर को 17 दिसंबर 1920 को संरक्षित स्मारक घोषित किया गया था। यह भारत की औपनिवेशिक-युग की धरोहर संरक्षण सूची में दर्ज प्रमुख स्थलों में से एक है।
चैतुरगढ़ में शंकर गुफा क्या है और वहाँ कैसे पहुँचें?
मंदिर से लगभग 2.5 से 3 किलोमीटर की दूरी पर शंकर गुफा स्थित है, जो सुरंग जैसी बनावट की है और 25 से 35 फीट तक गहरी बताई गई है। मंदिर के पुजारी के अनुसार, इसमें घुटनों के बल जाने पर भगवान शंकर के दर्शन होते हैं।
राष्ट्र प्रेस
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