सीएम स्टालिन ने 'थ्री-लैंग्वेज पॉलिसी' को हिंदी थोपने का प्रयास बताया
सारांश
Key Takeaways
- सीएम स्टालिन ने 'थ्री-लैंग्वेज पॉलिसी' को हिंदी थोपने का प्रयास बताया।
- केंद्र सरकार की नीति का तमिलनाडु में विरोध हो रहा है।
- यह नीति शिक्षण क्षेत्र में असमानता बढ़ा सकती है।
- सीएम ने राजनीतिक मकसदों पर सवाल उठाए।
- आधुनिक क्षेत्रों में कौशल की आवश्यकता पर जोर दिया।
चेन्नई, 4 अप्रैल (राष्ट्र प्रेस)। तमिलनाडु में एक बार फिर से भाषा का विवाद उभर आया है। मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने केंद्र सरकार और केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) को चुनौती देते हुए 'थ्री-लैंग्वेज पॉलिसी' को छिपे तरीके से हिंदी थोपने की कोशिश करार दिया।
असल में, केंद्र सरकार की राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के अंतर्गत 2026-27 सत्र से कक्षा 6 से तीन भाषा फॉर्मूला लागू करने का प्रस्ताव है। तमिलनाडु ने हमेशा से अनिवार्य हिंदी का विरोध किया है और अब इस मुद्दे पर राज्य और केंद्र के बीच टकराव तेज हो गया है।
सीएम स्टालिन ने अपने बयान में कहा कि यह सामान्य शिक्षा सुधार नहीं है, बल्कि यह एक राजनीतिक उद्देश्य से उठाया गया कदम है, जो भारत की भाषाई विविधता को कमजोर कर रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार धीरे-धीरे हिंदी को अन्य क्षेत्रीय भाषाओं पर प्राथमिकता दे रही है।
उन्होंने कहा, "यह तीन-भाषा नीति वास्तव में गैर-हिंदी भाषी राज्यों में हिंदी को बढ़ावा देने की कोशिश है। दक्षिण भारत के छात्रों के लिए यह सीधे-सीधे अनिवार्य हिंदी बन जाती है।"
मुख्यमंत्री स्टालिन ने यह सवाल उठाया कि क्या हिंदी भाषी राज्यों के छात्रों को भी तमिल, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम, बंगाली या मराठी सीखना अनिवार्य किया जाएगा। उन्होंने इसे दोहरे मापदंड का उदाहरण बताया और कहा कि केंद्र ने केंद्रीय विद्यालय में तमिल को अनिवार्य नहीं किया और न ही पर्याप्त तमिल शिक्षकों की नियुक्ति की है।
उन्होंने कहा कि इस नीति को लागू करने के लिए न तो पर्याप्त ढांचा उपलब्ध है और न ही प्रशिक्षित शिक्षकों की। उन्होंने यह भी सवाल किया कि क्या केंद्र ने जमीनी हकीकत (जैसे शिक्षकों की कमी और संस्थागत क्षमता) का सही आकलन किया है।
सीएम स्टालिन ने चेतावनी दी कि यह नीति राज्यों के बीच असमानता बढ़ा सकती है और हिंदी भाषी छात्रों को उच्च शिक्षा और रोजगार में बढ़त दे सकती है। उन्होंने कहा कि यह मुद्दा केवल भाषा का नहीं, बल्कि संघवाद, समानता और अवसरों की बराबरी का है।
उन्होंने कहा कि आज के समय में छात्रों को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, एनीमेशन, विजुअल इफेक्ट्स, गेमिंग और कॉमिक्स जैसे आधुनिक क्षेत्रों में कौशल की आवश्यकता है। ऐसे में अतिरिक्त भाषा का बोझ उनके विकास में बाधा बन सकता है। सीएम स्टालिन ने इसे सहकारी संघवाद के खिलाफ और देश की भाषाई पहचान के लिए अपमानजनक कदम बताया।