सीएम योगी ने किया सनातन समाज से एकजुट होने का आह्वान, राम मंदिर के निर्माण पर दी बड़ी बातें
सारांश
Key Takeaways
- सीएम योगी ने संतों की उपस्थिति में सनातन समाज से एकजुट होने का आह्वान किया।
- राम मंदिर का निर्माण 500 वर्षों के संघर्ष का परिणाम है।
- संतों की एकता में शक्ति है जो हिंदू विरोधी षड्यंत्रों का सामना कर सकती है।
- भारत की सांस्कृतिक जागरूकता को बढ़ाना आवश्यक है।
- योगी आदित्यनाथ ने व्यक्तिगत स्वार्थ को पीछे रखते हुए सनातन हित पर विचार करने की आवश्यकता बताई।
मथुरा, 7 अप्रैल (राष्ट्र प्रेस)। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने संतों की उपस्थिति में सनातन समाज को एकजुट होने का आह्वान किया। उन्होंने रामनगरी का उदाहरण देते हुए कहा कि 2017 से पहले अयोध्या में केवल तीन घंटे बिजली मिलती थी। जय श्रीराम बोलने पर लड्डू नहीं, बल्कि डंडे और लाठियां मिलती थीं। गलियां संकरी और भवन जर्जर थे।
उन्होंने कहा कि आवागमन के साधन सीमित थे, लेकिन आज अयोध्या त्रेतायुग की छवि प्रस्तुत करती है। जब पूज्य संत एक मंच पर आए और एक स्वर में बोले, तब 500 वर्ष का कलंक मिटा और अयोध्या में भव्य श्रीराम मंदिर का निर्माण संभव हुआ। संतों की एकता में इतनी शक्ति है कि यदि सभी सनातनी एकजुट होकर अपनी ताकत का अहसास कराएं, तो कोई भी विधर्मी और हिंदू विरोधी षड्यंत्रकारियों को भारत का नुकसान नहीं पहुंचा पाएंगे।
सीएम योगी आदित्यनाथ मंगलवार को संत श्रीमद् जगद्गुरु द्वाराचार्य श्रीमलूकदास जी महाराज की 452वीं जयंती पर आयोजित श्रीसीताराम निकुंज अष्टयाम लीला महोत्सव में वृंदावन पहुंचे। यहां उन्होंने दर्शन-पूजन किया और गोपूजन करके गायों को गुड़ खिलाया।
सीएम ने कहा कि हमें बिना रुके, थके या झुके इस यात्रा को चरैवेति-चरैवेति के संकल्प के साथ निरंतर आगे बढ़ाना है। व्यक्तिगत स्वार्थ भारत राष्ट्र और सनातन धर्म के मार्ग में बाधा नहीं बनना चाहिए। मेरा हित सनातन और देशहित से बड़ा नहीं हो सकता। जब पूज्य संतों ने व्यक्तिगत, आश्रम, संप्रदाय और पंथ के हित को एक तरफ रखकर सनातन हित पर ध्यान दिया, तब व्यापक जागृति और दिव्य तेज का अनुभव हुआ। कई पीढ़ियां राम मंदिर का दर्शन नहीं कर पाईं, लेकिन हमारी पीढ़ी सौभाग्यशाली है जो अयोध्या में राम मंदिर आंदोलन, जन्मभूमि की मुक्ति और भव्य प्राण-प्रतिष्ठा की साक्षी बनी।
उन्होंने कहा कि 1528 में राम मंदिर को बाबर के सिपहसालार मीर बांकी ने तोड़ा था। 500 वर्ष भी नहीं हुए और हमने भव्य श्रीराम मंदिर का निर्माण कराया। यही भारत का गौरव है और यह तब संभव होता है जब संतों का आशीर्वाद और सशक्त नेतृत्व हो। डबल इंजन की स्पीड से ताकत भी देखने को मिलती है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि संभल में 1526 में श्रीहरिहर मंदिर को बाबर के अनुयायियों ने तोड़ा था। वहां 67 तीर्थ और 19 कूप थे, जो सब मिट गए थे। 1976-78 में दंगे हुए, जिसमें सैकड़ों हिंदुओं को मारा गया। 1995-96 में सपा सरकार में दरिंदों के मुकदमे वापस कर दिए गए। मैंने एक परिवार के सदस्य से बात की, जिन्होंने बताया कि उनकी प्रॉपर्टी लूट ली गई थी। मैंने कहा कि कागज लेकर आओ, हम आपकी प्रॉपर्टी पर फिर से कब्जा कराएंगे।
उन्होंने कहा कि हमारी सरकार ने 84 कोसी परिक्रमा के लिए धन दिया है। प्रशासन से कहा गया है कि टू-लेन सड़क, सराय और धर्मशाला बनाएं और यात्रा प्रारंभ कराएं। 67 तीर्थों और 19 कूपों से कब्जे हटवाए गए हैं।
सीएम ने संत राजेंद्रदास जी महाराज के कथन का उल्लेख करते हुए कहा कि मलूकदास जी ने चार मुगल बादशाहों (अकबर, जहांगीर, शाहजहां और औरंगजेब) के समय की क्रूरता देखी। भारत के संतों की दिव्य परंपरा कभी भी अपने मूल्यों और आदर्शों से विचलित नहीं होती। उन्होंने उस समय जिस चेतना को जागरूक किया, आज का आध्यात्मिक और सांस्कृतिक भारत उसी पर आधारित है।
सीएम ने संत तुलसीदास का उल्लेख करते हुए कहा कि अकबर के नवरत्न उन्हें लालच देकर ले जाना चाहते थे, लेकिन उन्होंने कहा कि मैं किसी बादशाह को नहीं जानता। भारत के राजा केवल रामचंद्र जी हैं। मुगलकाल में यह नारा संत तुलसीदास ने दिया था, यानी भारत का राजा कोई विधर्मी नहीं हो सकता। तुलसीदास जी को गरीण ब्राह्मण कहने वालों पर सीएम ने तंज कसा और कहा कि उन से बड़ा धनी कौन हो सकता है, जिसने सबसे बड़े बादशाह के प्रस्ताव को ठुकरा दिया। रामलीलाओं के माध्यम से उन्होंने भारत में जनचेतना जागृत की, जो हर भारतीय के लिए प्रेरणा बनी।
मुख्यमंत्री ने कहा कि श्रीरामकथा, श्रीमद्भागवत महापुराण, और शिव महापुराण की कथा भारत की कथा है। कोई भी फिल्म कुछ दिनों चलती है, लेकिन भारत की दिव्य चेतना और आध्यात्मिक-सांस्कृतिक प्रभाव के कारण लाखों श्रद्धालु संतों की कथा में शामिल होते हैं। हर सनातन धर्मावलंबी जानता है कि अगला प्रसंग कौन सा होगा, फिर भी कथा व्यास समसामयिकता को जोड़कर उसे प्रस्तुत करते हैं।
सीएम ने कहा कि अक्टूबर से दिसंबर तक उत्तर भारत के हर गांव में देर रात तक रामलीला होती है। इसमें सरकार सहयोग नहीं करती। गांव के लोग चंदा इकट्ठा करते हैं। रामलीला के पात्र भी गांव के लोग होते हैं। पूरा गांव मिलकर रामलीला का मंचन करता है। इसमें जाति, मत और संप्रदाय का कोई भेद नहीं होता। एक जगह पर पुरुष, महिला, बुजुर्गों समेत पूरा गांव एकजुट होता है। मध्यकाल में इसकी शुरुआत संत तुलसीदास ने की थी।
उन्होंने कहा कि संत रामानंदाचार्य ने विभिन्न जातियों के महापुरुषों को शिष्य बनाया। संत रैदास और कबीर उनके शिष्य हैं। इस परंपरा की 22वीं पीढ़ी में जगद्गुरु मलूकदास जी महाराज का अविर्भाव हुआ। इस परंपरा ने पंथ और संप्रदाय से ऊपर उठकर भारत और सनातन धर्म के बारे में सोचा, तब भारत झंझावतों से मुक्त हुआ।
मुख्यमंत्री ने कहा कि जगद्गुरु मलूकदास जी ने मानवता के आंसू पोंछने, गोरक्षा और भूखे को अन्न देने को जीवन का मिशन बनाया। उन्होंने उपदेश दिया कि दूसरे के दुख को अपने दुख की तरह समझने वाला व्यक्ति ही सच्चा है। जीव के प्रति करुणा का भाव ही संतों की परंपरा है। 451 वर्ष पहले जो दिव्य ज्योति प्रयागराज की धरती पर प्रकट हुई, उसने संपूर्ण भारत को आलोकित किया। ब्रजभूमि आकर उन्होंने वैष्णव परंपरा की अलख जगाने का दायित्व अपने हाथों में लिया। आज मलूकदास जी महाराज की दिव्य समाधि के दर्शन के समय भी उनके दिव्य तेज का अहसास हुआ। उनके प्रकटीकरण और दिव्य समाधि लेने की तिथि (वैशाख कृष्ण पंचमी) एक ही है।