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क्या सीपी राधाकृष्णन ने नियम 267 के दायरे पर दी सफाई? ट्रेजरी बेंच के विचार साझा

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क्या सीपी राधाकृष्णन ने नियम 267 के दायरे पर दी सफाई? ट्रेजरी बेंच के विचार साझा

सारांश

राज्यसभा में नियम 267 पर चर्चा ने सदन के सदस्यों को विचारों का आदान-प्रदान करने का एक मंच दिया। सीपी राधाकृष्णन ने नियम के दायरे को स्पष्ट करते हुए बताया कि इसका दुरुपयोग हो रहा है और इसे केवल सूचीबद्ध कार्यों के लिए ही सीमित रखना चाहिए।

मुख्य बातें

नियम 267 का उद्देश्य केवल सूचीबद्ध मुद्दों पर चर्चा करना है।
राधाकृष्णन ने नियम का दुरुपयोग होने की बात कही।
2000 में नियम 267 का संशोधन हुआ था।
राज्यसभा में इस नियम का अनियमित उपयोग हो रहा है।
सरकार चर्चा से भागती नहीं है।

नई दिल्ली, 4 दिसंबर (राष्ट्र प्रेस)। राज्यसभा में नियम 267 के उपयोग और उसके दायरे पर गुरुवार को एक विस्तृत और गहन चर्चा हुई। यह चर्चा तब प्रारंभ हुई जब सीपी राधाकृष्णन ने सदन को सूचित किया कि उन्हें दो अलग-अलग मुद्दों पर नियम 267 के तहत नोटिस प्राप्त हुए हैं।

सीपी राधाकृष्णन ने कहा कि कई सदस्यों की मांग पर उन्होंने इस नियम की वर्तमान प्रथा की समीक्षा करने और एक स्पष्ट व विचारशील निर्णय देने का आश्वासन दिया था।

अपनी बात रखते हुए राधाकृष्णन ने कहा कि नियम 267 के नोटिस लगभग रोज दिए जा रहे हैं, जिनका उद्देश्य सूचीबद्ध कामकाज को स्थगित कर सदस्य द्वारा चुने गए मुद्दों पर तत्काल चर्चा कराना होता है। उन्होंने स्पष्ट किया, "यह नियम 267 का उद्देश्य नहीं है।"

उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि राज्यसभा का नियम 267 लोकसभा के स्थगन प्रस्ताव जैसा नहीं है, क्योंकि लोकसभा में यह प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 75(3) के तहत मान्य है, लेकिन राज्यसभा के लिए ऐसा कोई संवैधानिक या प्रक्रियात्मक प्रावधान नहीं है।

राधाकृष्णन ने कहा कि नियम 267 केवल उन्हीं मामलों पर लागू हो सकता है जो दिन के सूचीबद्ध कार्य में शामिल हों। जो नोटिस सूचीबद्ध कार्य से बाहर किसी मुद्दे से जुड़ा हो, वह स्वयं ही अवैध माना जाएगा।

उन्होंने याद दिलाया कि नियम 267 का मौजूदा स्वरूप वर्ष 2000 में संशोधित किया गया था। तब के राज्यसभा चेयरमैन कृष्ण कांत की अध्यक्षता वाली समिति में डॉ. मनमोहन सिंह, प्रणब मुखर्जी, अरुण जेटली, वेंकैया नायडू और फाली नरिमन जैसे वरिष्ठ सदस्यों ने यह संशोधन सुझाए थे।

समिति ने पाया था कि नियम का दुरुपयोग हो रहा है और इसके नाम पर ऐसे मुद्दे उठाए जा रहे हैं जो सूचीबद्ध नहीं थे या जिन पर अभी कोई निर्णय नहीं हुआ था। इसलिए सुझाव दिया गया कि इसका इस्तेमाल सिर्फ दिन के कार्य से जुड़े मामलों तक सीमित किया जाए। सदन ने यह संशोधन 15 मई 2000 को मंजूर किया था।

चेयरमैन राधाकृष्णन ने आंकड़े भी प्रस्तुत किए।

उन्होंने बताया कि 1988 से 2000 के बीच नियम 267 केवल तीन बार लागू हुआ। इनमें से केवल दो बार इसका पूरी तरह पालन हुआ। 2000 के संशोधन के बाद, बिना सर्वसम्मति के नियम 267 पर कोई चर्चा नहीं हुई। करीब चार दशक में केवल आठ बार सर्वसम्मति से चर्चा हुई है।

उन्होंने कहा, "यह तरीका बेहद दुर्लभ परिस्थितियों में ही इस्तेमाल किया गया है।"

विपक्ष पर तंज कसते हुए जेपी नड्डा ने कहा कि सरकार किसी भी चर्चा से नहीं भागती। उन्होंने कहा, "आपने जो भी मांगा, हमने हमेशा चर्चा का समय दिया है।"

नड्डा ने याद दिलाया कि पिछली सत्र में विपक्ष द्वारा उठाए गए कई मुद्दों पर विस्तृत चर्चा कराई गई थी। उन्होंने यह भी बताया कि वंदे मातरम् और एसआईआर जैसे मुद्दों पर सभी दलों की बैठक में सहमति बनी है और अगले सप्ताह इन पर चर्चा होगी।

संपादकीय दृष्टिकोण

जो दर्शाता है कि राज्यसभा में निर्णय प्रक्रिया को और भी पारदर्शी और प्रभावी बनाने की आवश्यकता है।
RashtraPress
10 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सीपी राधाकृष्णन ने नियम 267 पर क्या कहा?
सीपी राधाकृष्णन ने कहा कि नियम 267 का उद्देश्य केवल सूचीबद्ध कार्यों से संबंधित मुद्दों पर चर्चा करना है।
क्या नियम 267 का दुरुपयोग हो रहा है?
हां, राधाकृष्णन ने बताया कि इस नियम का दुरुपयोग हो रहा है और इसे केवल सूचीबद्ध कार्यों तक सीमित किया जाना चाहिए।
नियम 267 का संशोधन कब हुआ था?
नियम 267 का मौजूदा स्वरूप वर्ष 2000 में संशोधित किया गया था।
क्या सरकार चर्चा से भागती है?
जेपी नड्डा ने कहा कि सरकार किसी भी चर्चा से भाग नहीं रही है और हमेशा समय दिया है।
राष्ट्र प्रेस
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