दामोदर हरि चापेकर: पुणे से भारत की पहली सशस्त्र क्रांति का ज्वाला, भाई भी हुए बलिदान
सारांश
Key Takeaways
- दामोदर चापेकर स्वतंत्रता संग्राम के पहले सशस्त्र क्रांतिकारी थे।
- उनका बलिदान भारतीय युवाओं के लिए प्रेरणा है।
- उन्होंने वॉल्टर चार्ल्स रैंड की हत्या के लिए साहसिक कदम उठाया।
- उनका आत्मवृत्त क्रांतिकारियों के लिए एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है।
- पुणे में उनकी स्मृति में प्रतिमा स्थापित है।
नई दिल्ली, 17 अप्रैल (राष्ट्र प्रेस)। भारत की स्वतंत्रता संग्राम में सशस्त्र क्रांति की शुरुआत करने वाले दामोदर हरि चापेकर को 18 अप्रैल 1898 को अंग्रेजों ने फांसी दी थी। दामोदर चापेकर बंधुओं में सबसे बड़े भाई थे, जिन्होंने ब्रिटिश अत्याचार के खिलाफ पहला प्रमुख क्रांतिकारी कदम उठाया। 18 अप्रैल को उनकी पुण्यतिथि है।
दामोदर हरि चापेकर का जन्म 25 जून 1869 को महाराष्ट्र के पुणे के निकट चिंचवड़ गांव में हुआ था। उनके पिता हरिपंत चापेकर एक प्रसिद्ध कीर्तनकार थे, जिन्होंने उन्हें सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत प्रदान की। उनके छोटे भाई बालकृष्ण हरि चापेकर और वासुदेव हरि चापेकर भी स्वतंत्रता संग्राम में दामोदर के साथ खड़े थे। तीनों भाइयों को सामूहिक रूप से चापेकर बंधु कहा जाता है।
dामोदर बचपन से ही सैनिक बनने की ख्वाहिश रखते थे, जिसके लिए उन्होंने व्यायाम और सैन्य प्रशिक्षण में दिलचस्पी ली। परिवार की आर्थिक स्थिति अच्छी न होने के कारण वे कीर्तन और सांस्कृतिक गतिविधियों में भाग लेते थे। महर्षि पटवर्धन और लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक उनके आदर्श थे। तिलक के केसरी समाचार-पत्र और उनके राष्ट्रवादी विचारों ने दामोदर को गहराई से प्रभावित किया।
1896 के अंत में पुणे में ब्युबोनिक प्लेग फैल गया और 1897 की फरवरी तक यह भयावह रूप धारण कर लिया। तब तक भारत के अंतिम बड़े स्वतंत्रता संग्राम को 40 साल हो चुके थे और ब्रिटिशों ने पूरे भारत पर अपना शिकंजा कस रखा था।
मुंबई के निकट प्लेग के भयावह स्वरूप को देखते हुए आईसीएस अधिकारी वॉल्टर चार्ल्स रैंड को रोकथाम के लिए नियुक्त किया गया। रैंड के प्लेग नियंत्रण के तरीके अत्यंत दमनकारी थे। उसके साथ के फौजी अधिकारी घरों में जबरन घुसकर लोगों में प्लेग के लक्षण ढूंढते और उन्हें अलग कैंप में ले जाते थे। रैंड के निर्देश पर सैनिक घरों में घुसकर सभी को नंगा करके जांच करते थे।
इन अत्याचारों ने पुणे की जनता को आक्रोशित कर दिया। तिलक और अन्य नेताओं ने भी रैंड की नीतियों की कड़ी आलोचना की, जिसके चलते तिलक को जेल हुई। दामोदर और उनके भाइयों ने इस अत्याचार को चुपचाप सहन नहीं किया और रैंड की हत्या का फैसला किया, ताकि ब्रिटिश शासन को संदेश दिया जा सके कि भारतीय अब गुलामी सहन नहीं करेंगे।
22 जून 1897 को रानी विक्टोरिया के डायमंड जयंती समारोह के बाद रैंड सरकारी भवन (गवर्नमेंट हाउस) से लौट रहा था। इस दिन दामोदर ने अपने भाई बालकृष्ण के साथ मिलकर रैंड की हत्या की योजना बनाई। उन्होंने तलवार और बंदूक लेकर हमला करने का निर्णय लिया। गणेशखिंड रोड (वर्तमान सेनापति बापट रोड) पर दामोदर और बालकृष्ण ने रैंड का इंतजार किया। जैसे ही दामोदर की सवारी आई, उन्होंने रैंड की गाड़ी के पास जाकर गोली चला दी। रैंड के ठीक पीछे की सवारी में आय्रेस्ट नाम का वॉल्टर का फौजी एस्कॉर्ट था। बालकृष्ण ने उसके सिर में गोली मार दी, जिससे उसकी मौके पर ही मृत्यु हो गई। हालांकि, रैंड की मौत तुरंत नहीं हुई; उसे अस्पताल ले जाया गया, जहां 3 जुलाई 1897 को उसकी मृत्यु हुई।
यह घटना भारत की स्वतंत्रता संग्राम में पहला सशस्त्र क्रांतिकारी हमला माना जाता है। इससे ब्रिटिश सरकार में खलबली मच गई। दामोदर ने पूरी जिम्मेदारी अपने ऊपर ली और अदालत में निर्भीक बयान दिया।
इस घटना की गवाही द्रविड़ बंधुओं ने दी थी। उनकी पहचान पर दामोदर हरि गिरफ्तार हुए और उन्हें 18 अप्रैल 1898 को पुणे में फांसी दी गई। फांसी से पहले उन्होंने बाल गंगाधर तिलक से गीता की प्रति मांगी थी। फांसी के समय भी उनके हाथ में गीता थी। सबसे छोटे भाई वासुदेव ने गद्दारों की हत्या कर बदला लिया, लेकिन उन्हें भी 8 मई 1899 को फांसी दी गई। जबकि भाई बालकृष्ण को 12 मई 1899 को फांसी दी गई।
दामोदर चापेकर ने फांसी से पहले अपना आत्मवृत्त लिखा था, जिसमें उन्होंने क्रांति के पीछे के कारणों और ब्रिटिश अत्याचारों का विस्तार से वर्णन किया है। यह आत्मवृत्त क्रांतिकारियों के लिए प्रेरणा स्रोत बना। चापेकर बंधुओं का बलिदान भारत की क्रांतिकारी परंपरा की नींव रखने वाला था। विनायक दामोदर सावरकर जैसे युवा क्रांतिकारी इससे प्रेरित हुए। लाला लाजपत राय ने भी उनकी प्रशंसा की। पुणे में आज भी उनके सम्मान में प्रतिमा स्थापित है, जो उनकी याद दिलाती है।