फैयाज खां पुण्यतिथि: ध्रुपद-ख्याल के बेताज बादशाह जिन्हें मिली 'आफताब-ए-मौसिकी' की उपाधि
सारांश
मुख्य बातें
हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के इतिहास में उस्ताद फैयाज खां का नाम उन चुनिंदा महारथियों में शामिल है, जिन्होंने ध्रुपद और ख्याल — दोनों शैलियों में एक साथ महारत हासिल की। 5 नवंबर 1950 को बड़ौदा में उनके निधन की यह पुण्यतिथि उस महान स्वर-साधक की स्मृति को ताज़ा करने का अवसर है, जिनकी आवाज़ आज भी संगीत-प्रेमियों के कानों में गूँजती है। मैसूर के महाराजा द्वारा प्रदत्त उपाधि 'आफताब-ए-मौसिकी' — अर्थात संगीत का सूर्य — उनकी प्रतिभा का सबसे सटीक वर्णन है।
प्रारंभिक जीवन और संगीत-दीक्षा
फैयाज खां का जन्म 8 फरवरी 1886 को ब्रिटिश शासनकाल में उत्तर प्रदेश के आगरा के निकट सिकंदरा में एक संगीतकार परिवार में हुआ था। उनके जन्म से कुछ महीने पहले ही उनके पिता सफदर हुसैन खां का निधन हो चुका था, जिसके कारण उनका पालन-पोषण और संगीत की प्रारंभिक शिक्षा उनके नाना की देखरेख में हुई। 25 वर्ष की आयु तक उनके नाना ही उनके प्रमुख गुरु और मार्गदर्शक बने रहे।
संगीत का यह परिवेश जन्मजात मिला और परिश्रम ने उन्हें 20वीं शताब्दी के सर्वश्रेष्ठ गायकों की पंक्ति में ला खड़ा किया। गौरतलब है कि आगरा घराने की जो विशिष्ट गायकी परंपरा है, उसके वे सबसे प्रतिनिधि स्वर बने।
व्यक्तित्व और आवाज़ का अद्भुत वैपरीत्य
फैयाज खां का शारीरिक व्यक्तित्व उनकी आवाज़ के बिल्कुल विपरीत था — यही उनकी पहचान का एक अनूठा पहलू था। वे देखने में लंबे-चौड़े और सुदृढ़ शरीर के थे और मंच पर किसी पहलवान जैसे दिखते थे। शेरवानी और साफा उनकी पोशाक की पहचान थी और बड़ी मूंछें उनके व्यक्तित्व में रोब भरती थीं।
परंतु जैसे ही वे गाना शुरू करते, उनकी गहरी, सुरीली और ताकतवर आवाज़ श्रोताओं को तत्काल मंत्रमुग्ध कर देती थी। यह विरोधाभास — विशाल काया और कोमल संगीत — ही उन्हें भीड़ से अलग करता था।
दरबारी सम्मान और उपाधियाँ
फैयाज खां लंबे समय तक बड़ौदा के महाराजा सयाजीराव गायकवाड़ तृतीय के दरबार में राजगायक के पद पर आसीन रहे। इस दौरान बड़ौदा दरबार ने उन्हें 'ज्ञान रत्न' की प्रतिष्ठित उपाधि प्रदान की। इसके अतिरिक्त, मैसूर के महाराजा ने उन्हें 'आफताब-ए-मौसिकी' — संगीत के सूर्य — की उपाधि से विभूषित किया, जो उनके नाम का पर्याय बन गई।
यह ऐसे समय में आया जब राजदरबारों की संरक्षण-परंपरा धीरे-धीरे समाप्त हो रही थी। फैयाज खां उन अंतिम कलाकारों में थे जिन्होंने राजाश्रय और आधुनिक सार्वजनिक मंच — दोनों पर समान रूप से अपनी उपस्थिति दर्ज कराई।
व्यक्तिगत जीवन और 'प्रेम प्रिया' की छाप
फैयाज खां का वैवाहिक जीवन दुखद रहा — विवाह के कुछ ही समय बाद उनकी पत्नी का निधन हो गया। इसके बाद उन्होंने दूसरा विवाह नहीं किया और जीवनपर्यंत निःसंतान रहे। उनका एकाकी जीवन संगीत को ही समर्पित हो गया। वे अपनी रचनाओं में उपनाम के रूप में 'प्रेम प्रिया' का प्रयोग करते थे, जो उनके भावनात्मक संसार की गहराई को दर्शाता है।
विरासत और प्रासंगिकता
5 नवंबर 1950 को बड़ौदा में उनके निधन के साथ भारतीय शास्त्रीय संगीत ने अपना एक युगपुरुष खो दिया। किंतु फैयाज खां केवल गायक नहीं, एक श्रेष्ठ संगीत-शिक्षक भी थे, जिन्होंने अपनी शिष्य-परंपरा के माध्यम से आगरा घराने की गायकी को जीवित रखा। उन्होंने जो संगीत-विरासत छोड़ी, वह आज भी नई पीढ़ी के साधकों के लिए प्रेरणा का अक्षय स्रोत बनी हुई है।