महासप्तमी पर थावे दुर्गा मंदिर में उमड़ा श्रद्धा का सैलाब, एसपी विनय तिवारी ने सुरक्षा व्यवस्था का लिया जायजा
सारांश
मुख्य बातें
शारदीय नवरात्रि की महासप्तमी पर गोपालगंज स्थित थावे दुर्गा मंदिर में 17 अक्टूबर 2026 को श्रद्धालुओं की असाधारण भीड़ उमड़ी। बड़ी संख्या में आ रहे भक्तों को देखते हुए पुलिस अधीक्षक (एसपी) विनय तिवारी ने अपनी पूरी टीम के साथ मंदिर परिसर का व्यापक सुरक्षा निरीक्षण किया और अधिकारियों को सुरक्षित दर्शन एवं बेहतर भीड़ प्रबंधन के निर्देश दिए।
सुरक्षा व्यवस्था का निरीक्षण
एसपी विनय तिवारी ने मंदिर परिसर में मौजूद व्यवस्थाओं का बारीकी से जायजा लिया। उन्होंने कहा, 'हम लोग अपनी पूरी टीम के साथ यहां निरीक्षण करने आए हैं। अगले चार दिन श्रद्धालुओं के लिए थावे मंदिर में क्या व्यवस्था रहेगी, उसका हमने निरीक्षण किया। जो भी थोड़ी-बहुत खामियां दिखीं, उन्हें सुधारने पर जोर दिया है ताकि श्रद्धालुओं को किसी तरह की दिक्कत न हो।'
उन्होंने आगे बताया कि पार्किंग की समुचित व्यवस्था की गई है और श्रद्धालुओं को मार्गदर्शन देने के लिए परिसर में आवश्यक बोर्ड लगाए गए हैं। उनके अनुसार पूरा तंत्र सुचारू रूप से संचालित करने की तैयारी कर ली गई है।
थावे भवानी मंदिर का ऐतिहासिक एवं पौराणिक महत्व
गोपालगंज शहर से कुछ ही किलोमीटर की दूरी पर स्थित थावे भवानी मंदिर को एक जाग्रत शक्तिपीठ माना जाता है। लोककथाओं के अनुसार लगभग 400 वर्ष पूर्व यहाँ चेरो वंश के राजा मनन सिंह का शासन था, जो स्वयं को माँ दुर्गा का परम भक्त मानते थे।
उसी काल में राज्य में भीषण अकाल पड़ा। थावे के जंगल में माँ के एक निर्धन किंतु अनन्य भक्त रहषु भगत रहते थे। मान्यता है कि अकाल के दौरान उनकी भक्ति के प्रताप से वे दिन में बाघों के गले में सांप की रस्सी बांधकर जंगली घास की दवरी करते थे और रात में उसी घास से चमत्कारिक रूप से चावल निकलता था, जिसे वे जनता में बांट देते थे।
राजा के अहंकार और भक्त की परीक्षा की कथा
जब यह समाचार राजा मनन सिंह तक पहुँचा तो उनका अहंकार जाग उठा। राजा ने रहषु भगत को ढोंगी बताकर दरबार में बुलाया और आदेश दिया कि वे माँ को साक्षात महल में बुलाकर दिखाएँ। रहषु ने बहुत मिन्नतें कीं और चेतावनी दी कि देवी को हठपूर्वक बुलाना विनाश का कारण बनेगा, परंतु राजा टस से मस नहीं हुए।
अंततः रहषु ने देवी का ध्यान लगाया। कहा जाता है कि भक्त की पुकार सुनकर देवी माँ असम के कामाख्या से चलीं। मार्ग में वे कोलकाता में दक्षिणेश्वर काली, पटना में पटन देवी और सारण-छपरा के आमी में अंबिका स्थान के रूप में रुकीं।
मंदिर की स्थापना की पौराणिक गाथा
जैसे ही माँ थावे पहुँचीं, राजा के महल ढहने लगे। भयानक गर्जना हुई और रहषु भगत का मस्तक बीच से फट गया। उसी फटे हुए मस्तक से देवी माँ का एक हाथ बाहर निकला, जिसकी कलाई में दिव्य कंगन चमक रहा था। उसी क्षण राजा की मृत्यु हो गई और रहषु को मोक्ष प्राप्त हुआ। माँ उसी स्थान पर स्थापित हो गईं। आज भी वहाँ मनन सिंह के महल के खंडहर मौजूद हैं।
नवरात्रि में आस्था और भीड़ का संगम
इस मंदिर की एक विशेषता यह है कि यहाँ श्रद्धालु पहले रहषु भगत के मंदिर में दर्शन करते हैं, उसके बाद माँ भवानी के। मान्यता है कि रहषु की पूजा के बिना माँ की पूजा अधूरी मानी जाती है। नेपाल, उत्तर प्रदेश और बंगाल सहित देश-विदेश से लाखों भक्त यहाँ दर्शन के लिए आते हैं। नवरात्रि के मेले में माँ को पिड़किया का प्रसाद चढ़ाने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। आने वाले दिनों में अष्टमी और नवमी पर भीड़ और अधिक बढ़ने की संभावना है, जिसके मद्देनज़र प्रशासन पूरी तरह सतर्क है।