क्या हजार स्तंभों वाले मंदिर में एक ही छत के नीचे भगवान विष्णु, शिव और सूर्य मौजूद हैं?
सारांश
Key Takeaways
- भगवान शिव, भगवान विष्णु और भगवान सूर्य एक ही गर्भगृह में विराजमान हैं।
- यह मंदिर भारत का पहला मंदिर है जहाँ तीन प्रमुख देवताओं का संगम है।
- मंदिर की वास्तुकला अद्वितीय है, जो इसे विशेष बनाती है।
- यहाँ हर साल विभिन्न त्योहार धूमधाम से मनाए जाते हैं।
- 12वीं शताब्दी में रुद्र देव द्वारा निर्मित, यह मंदिर भारतीय संस्कृति का प्रतीक है।
नई दिल्ली, 10 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। भारत के विभिन्न राज्यों में ऐसे कई मंदिर हैं, जिनमें भक्ति और रहस्य का अद्भुत संगम है। यहां भक्त अपने आराध्य के प्रति श्रद्धा से मीलों की यात्रा तय करते हैं।
दक्षिण भारत में भगवान शिव और भगवान विष्णु की पूजा विशेष रूप से की जाती है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि एक ऐसा मंदिर भी है जहां इन दोनों देवताओं के साथ भगवान सूर्य भी एक ही गर्भगृह में विराजमान हैं? मकर संक्रांति (पोंगल) के अवसर पर भक्त इन तीनों देवताओं के दर्शन करने के लिए आते हैं।
तेलंगाना के हनमकोंडा में स्थित यह हजार स्तंभों वाला मंदिर जिसे रुद्रेश्वर स्वामी मंदिर के नाम से भी जाना जाता है, अद्वितीय है। इसे 'हजार स्तंभों वाला मंदिर' इसीलिए कहा जाता है क्योंकि यह पूरी तरह से स्तंभों पर टिका हुआ है और यहां कोई दीवार नहीं है। मंदिर की वास्तुकला इस प्रकार है कि कुछ स्तंभ स्पष्ट रूप से देखे जा सकते हैं, जबकि कुछ इतने निकट हैं कि वे दीवार का आभास देते हैं।
हालांकि, मंदिर की स्थिति पहले जर्जर थी, लेकिन अब सरकारी संरक्षण में इसका पुनर्निर्माण किया जा रहा है और भक्तों के लिए खोला जा चुका है। यह स्टार शेप की वास्तुकला में निर्मित एक प्रमुख तीर्थ स्थान है, जहां रोजाना 1000 से अधिक श्रद्धालु आते हैं। मंदिर में मौजूद काले बेसाल्ट पत्थर से बनी विशाल नंदी प्रतिमा दर्शकों का ध्यान आकर्षित करती है। यहाँ के तीन गर्भगृहों को सामूहिक रूप से त्रिकूटलयम कहा जाता है, जिसमें भगवान शिव, भगवान विष्णु और भगवान सूर्य एक साथ विराजमान हैं। यह देश का पहला मंदिर है जहाँ ब्रह्मांड के तीन प्रमुख देवताओं को एक ही छत के नीचे देखा जा सकता है।
मकर संक्रांति (पोंगल) के दौरान भक्त भगवान सूर्य का आशीर्वाद लेने के लिए यहाँ आते हैं। इसके अलावा, महा शिवरात्रि, कुंकुमा पूजा, कार्तिक पूर्णिमा, उगादी, नागुला चविती, गणेश चतुर्थी, बोनालु महोत्सव और बथुकम्मा महोत्सव भी बड़े धूमधाम से मनाए जाते हैं।
यह मंदिर 12वीं शताब्दी में रुद्र देव द्वारा निर्मित किया गया था और यहाँ रुद्र देव के गृह देवता की प्रतिमा भी विद्यमान है। यही कारण है कि इसे रुद्रेश्वर स्वामी मंदिर कहा जाता है। यह मंदिर चालुक्य शैली की वास्तुकला का अद्भुत उदाहरण है। मंदिर के प्रांगण में मौजूद हाथी और विशाल नंदी महाराज की प्रतिमाएँ भी विशाल बेसाल्ट पत्थर से बनी हैं, जिन पर बारीक नक्काशी की गई है, जो नंदी महाराज की शोभा को और बढ़ाती है।