अर्जुन राम मेघवाल बोले: एआई इंसानों की जगह नहीं ले सकता, 'टेक्नोलॉजी लॉ' पुस्तक का लोकार्पण
सारांश
Key Takeaways
केंद्र सरकार के कानून एवं न्याय राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) अर्जुन राम मेघवाल ने 30 अप्रैल 2026 को नई दिल्ली में आयोजित 'प्रौद्योगिकी कानून: विनियम, साइबर नीति और डिजिटल परिदृश्य' पुस्तक के लोकार्पण समारोह में स्पष्ट कहा कि इनोवेशन, टेक्नोलॉजी या आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस किसी भी इंसान की जगह नहीं ले सकते। यह पुस्तक रॉडनी डी. राइडर और प्रो. निखिल नरेन द्वारा संयुक्त रूप से लिखी गई है और तकनीकी कानून के क्षेत्र में एक व्यापक अकादमिक संसाधन के रूप में प्रस्तुत की गई है।
मंत्री मेघवाल का मुख्य संदेश
मंत्री मेघवाल ने कहा, "एआई कई चुनौतियाँ पेश करता है, और हम तकनीकी रूप से अत्यधिक उन्नत हो चुके हैं, लेकिन यह किसी व्यक्ति की जगह नहीं ले सकता।" उन्होंने भाप इंजन के युग से तुलना करते हुए कहा कि हर तकनीकी बदलाव के साथ समाज ने खुद को ढाला है और नए अवसर उभरे हैं। उनके अनुसार, "जो बदलेगा वह नौकरियों और अवसरों का स्वरूप होगा, और विशेषज्ञों को उन्हें विकसित करना होगा।" उन्होंने इंडस्ट्री 4.0 के दौर में नई चुनौतियों को राष्ट्रहित में उपयोगी बनाने पर जोर दिया।
विशिष्ट अतिथियों के विचार
भारत के अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने कहा कि मानव मस्तिष्क को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अलावा किसी अन्य विनियमन के अधीन नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा, "जीवन का कोई भी हिस्सा कानून और विनियमन से मुक्त नहीं है।" भारत के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने एआई के वैधानिक ढाँचे की अनुपस्थिति पर चिंता जताई और कहा कि अब तक एआई वैधानिक रूप से अनियमित रहा है। उन्होंने ऐसे पेशेवरों की आवश्यकता पर बल दिया जो डिजिटल माध्यम के तकनीकी और कानूनी दोनों पहलुओं को समझें।
भारत सरकार के पूर्व जी20 शेरपा अमिताभ कांत ने भारत के डिजिटल परिवर्तन को दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण विकास कहानियों में से एक बताया। उन्होंने बताया कि 2015 से 2017 के बीच भारत में 55 करोड़ बैंक खाते खोले गए — हर सेकंड एक खाता। उन्होंने न्यायालयों में तकनीक को केवल बैक-ऑफिस कंप्यूटरीकरण तक सीमित न रखने और इसे वैकल्पिक विवाद समाधान तक फैले एक संपूर्ण ऑपरेटिंग सिस्टम के रूप में विकसित करने की वकालत की।
पुस्तक की विशेषताएँ और महत्व
ओ.पी. जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी के संस्थापक कुलपति प्रो. (डॉ.) सी. राज कुमार ने कहा कि ऐसे समय में जब एआई की भूमिका पर व्यापक चर्चा हो रही है, यह अकादमिक कार्य स्पष्टता और बेहतर समझ देगा। पुस्तक में भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, डेटा संरक्षण, निगरानी, ऑनलाइन ब्रांड प्रबंधन और नई तकनीकों सहित तकनीकी कानून का पूरा दायरा शामिल है। यह छात्र-हितैषी मूल्य पर उपलब्ध है, जिससे यह तकनीकी कानून पर सबसे व्यापक और किफायती पुस्तकों में से एक बनती है।
पुस्तक के सह-लेखक रॉडनी डी. राइडर ने इसे सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम के 25 वर्षों की नीतिगत प्रक्रिया का ऐतिहासिक दस्तावेज बताया। उन्होंने कहा कि इसे लगातार सरकारों ने गति और स्पष्टता के साथ आगे बढ़ाया।
सह-लेखक प्रो. निखिल नरेन के नए विचार
जिंदल ग्लोबल लॉ स्कूल के सहायक प्रोफेसर और सिरिल श्रॉफ सेंटर फॉर एआई, लॉ एंड रेगुलेशन के सहायक निदेशक प्रो. निखिल नरेन ने कहा, "कानून इतना कल्पनाशील होना चाहिए कि नवाचार को सक्षम करे, लेकिन इतना कठोर भी कि अधिकारों, गरिमा और लोकतांत्रिक संस्थानों की रक्षा कर सके।" उन्होंने "सोशल मीडिया पैरानॉइया" की अवधारणा का उल्लेख किया — एक ऐसी स्थिति जिसमें दृश्यता, ट्रोलिंग और वायरलिटी यह तय करती है कि व्यक्ति कैसे सोचता और व्यवहार करता है। पुस्तक यह भी तर्क देती है कि "इन्फ्लुएंसर" के स्थान पर "क्लिकस्टार" अधिक सटीक शब्द है, क्योंकि यह क्लिक और एल्गोरिद्मिक दृश्यता पर आधारित पहचान को बेहतर परिभाषित करता है।
आगे की राह
यह पुस्तक विश्वविद्यालय पाठ्यक्रम का आवश्यक हिस्सा बनने और पेशेवरों के पुस्तकालयों में स्थान पाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। गौरतलब है कि यह ऐसे समय में आई है जब भारत में एआई विनियमन पर व्यापक बहस छिड़ी हुई है और वैश्विक स्तर पर भी डिजिटल कानून के ढाँचे को मजबूत करने की माँग तेज हो रही है।