पुणे में नामघर उद्घाटन पर हिमंता बिस्वा सरमा बोले — असम की आध्यात्मिक विरासत महाराष्ट्र में फल-फूल रही है
सारांश
मुख्य बातें
असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने 7 अक्टूबर 2026 को महाराष्ट्र के पुणे में एक नामघर के उद्घाटन का हार्दिक स्वागत किया और इसे असम तथा महाराष्ट्र के बीच गहरे सांस्कृतिक सेतु की संज्ञा दी। उन्होंने कहा कि यह देखना अत्यंत हृदयस्पर्शी अनुभव है कि असम की समृद्ध परंपराएँ और आध्यात्मिक धरोहर राज्य की भौगोलिक सीमाओं को पार कर महाराष्ट्र की धरती पर भी अपनी जड़ें जमा रही हैं।
एक्स पोस्ट में क्या लिखा सीएम सरमा ने
मुख्यमंत्री सरमा ने बुधवार को एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर एक पोस्ट में लिखा, 'असम की परंपराओं को पुणे, महाराष्ट्र में घर बनाते देखना दिल को छू लेने वाला एहसास है।' उन्होंने इस अवसर को 'बड़े हर्ष और गर्व का क्षण' बताते हुए कहा कि यह नामघर दोनों राज्यों के लोगों को भावनात्मक रूप से और करीब लाएगा।
शंकरदेव, ज्ञानेश्वर और तुकाराम की शिक्षाओं का संगम
सीएम सरमा ने इस नामघर की स्थापना को असम के श्रीमंत शंकरदेव तथा महाराष्ट्र के संत ज्ञानेश्वर और संत तुकाराम महाराज की शिक्षाओं का सुंदर संगम बताया। उनके अनुसार इन तीनों आध्यात्मिक विभूतियों के संदेश — भक्ति, सद्भाव और सामाजिक एकता — भौगोलिक और सांस्कृतिक सीमाओं से परे जाकर लोगों को एकसूत्र में पिरोते हैं। उन्होंने कहा कि ये परंपराएँ अलग-अलग होते हुए भी एक-दूसरे की पूरक हैं।
नामघर का सामाजिक-सांस्कृतिक महत्व
गौरतलब है कि नामघर परंपरागत रूप से असम के सामाजिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक जीवन की धुरी रहे हैं। श्रीमंत शंकरदेव द्वारा प्रवर्तित नव-वैष्णव आंदोलन से जुड़े ये नामघर केवल प्रार्थना स्थल नहीं हैं — ये सामुदायिक भागीदारी, सांस्कृतिक आयोजनों और सामाजिक संवाद के जीवंत केंद्र भी हैं। पुणे में इस नामघर की स्थापना इसी परंपरा को देश के एक नए भूगोल में स्थापित करने का प्रयास है।
सरहद संगठन की सराहना
मुख्यमंत्री सरमा ने पुणे में इस नामघर की स्थापना की पहल के लिए सरहद संगठन को बधाई दी और उनके प्रयासों की मुक्त कंठ से प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि इस तरह की सांस्कृतिक पहलें क्षेत्रीय पहचान को सुरक्षित रखते हुए देश के विभिन्न हिस्सों के लोगों के बीच भावनात्मक और सामाजिक बंधन को प्रगाढ़ करती हैं।
असम-महाराष्ट्र के बीच सांस्कृतिक सेतु
यह पहल असम और महाराष्ट्र के बीच व्यापक सांस्कृतिक संबंधों को रेखांकित करती है। यह ऐसे समय में और भी प्रासंगिक है जब देशभर में 'एक भारत, श्रेष्ठ भारत' की भावना को सांस्कृतिक आदान-प्रदान के ज़रिए मज़बूत करने पर बल दिया जा रहा है। इस नामघर के साथ, पुणे में रहने वाले असमिया समुदाय को अपनी जड़ों से जुड़े रहने का एक स्थायी केंद्र मिल गया है, और आने वाले समय में यह दोनों राज्यों के बीच सांस्कृतिक संवाद की नई इबारत लिखेगा।