बॉम्बे हाईकोर्ट की फटकार पर शिवसेना (यूबीटी) का हमला: 'महाराष्ट्र सरकार का मुखौटा उतरा, फेरीवाला नीति पूरी तरह विफल'
सारांश
Key Takeaways
शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे गुट) ने 30 अप्रैल 2026 को अपने मुखपत्र 'सामना' के संपादकीय के जरिए महाराष्ट्र सरकार पर तीखा प्रहार किया और बॉम्बे हाईकोर्ट की उस कड़ी टिप्पणी का समर्थन किया, जिसमें अदालत ने अनधिकृत फेरीवालों की समस्या पर सरकार की राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी को सार्वजनिक रूप से उजागर किया था। पार्टी ने कहा कि अदालत की इस फटकार ने सत्ता में बैठे लोगों के मुखौटे को पूरी तरह उतार दिया है।
बॉम्बे हाईकोर्ट की टिप्पणी: क्या कहा अदालत ने
बॉम्बे हाईकोर्ट ने मुंबई में अनधिकृत फेरीवालों द्वारा किए जा रहे अतिक्रमण से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान महाराष्ट्र सरकार को कड़ी फटकार लगाई। अदालत ने स्पष्ट कहा कि अधिकारियों को अपने ही कानूनों और अधिकारों की जानकारी न होने पर शर्म आनी चाहिए। अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि यह समस्या अब राज्य के सभी बड़े और छोटे शहरों में नागरिकों के लिए गंभीर परेशानी बन चुकी है।
शिवसेना (यूबीटी) का आरोप: भ्रष्ट त्रिकोण जिम्मेदार
'सामना' के संपादकीय में कहा गया कि राज्य सरकार, नगर निगम और पुलिस एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डालते रहते हैं और इस भ्रष्ट त्रिकोण को फुटपाथों को खाली कराने में विफलता का मुख्य कारण बताया गया। पार्टी का कहना है कि कभी-कभार दिखावटी कार्रवाई होती है, लेकिन जल्द ही स्थिति पहले जैसी हो जाती है। लेख में आरोप लगाया गया कि अगर वास्तव में कानूनी शक्तियों का उपयोग किया गया तो सत्ता से जुड़े हितों को नुकसान पहुंचेगा और उनका गठजोड़ टूट जाएगा।
सरकार की सफाई और शिवसेना (यूबीटी) की तीखी प्रतिक्रिया
सरकार ने कोर्ट को बताया कि अधिकृत हॉकर्स के लिए 'वेंडिंग कमेटी' बनाने में सात महीने लगेंगे और उसके लागू होने में एक महीना और लगेगा। इस जवाब पर शिवसेना (यूबीटी) ने तीखी टिप्पणी करते हुए सवाल उठाया कि क्या सत्ता, पैसा और राजनीतिक विरोधियों को निशाना बनाने में व्यस्त यह सरकार इस सार्वजनिक फटकार के बाद भी कोई आत्ममंथन करेगी। 'सामना' ने कहा कि जिनकी राजनीतिक इच्छाशक्ति केवल सत्ता और उससे मिलने वाले धन से तय होती है, क्या वे इस न्यायिक खुलासे से शर्म महसूस करेंगे।
आम जनता पर असर
गौरतलब है कि फेरीवालों का अतिक्रमण केवल मुंबई तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे महाराष्ट्र के शहरों में पैदल यात्रियों के लिए यह गंभीर समस्या बन चुका है। जिन लोगों की जिम्मेदारी फेरीवालों को हटाने और पैदल चलने वालों को राहत देने की है, वे प्रशासनिक उदासीनता के चलते चुप हैं। कानून मौजूद हैं और सरकार के पास कार्रवाई की शक्ति भी है, लेकिन 'सामना' के अनुसार इन शक्तियों का उपयोग जानबूझकर नहीं किया जाता।
व्यापक शासन विफलता का संकेत
'सामना' के मुताबिक, कोर्ट की टिप्पणी यह दिखाती है कि सरकार की लापरवाही सिर्फ हॉकर्स के मुद्दे तक सीमित नहीं है, बल्कि यह महाराष्ट्र में शासन की व्यापक विफलता को भी दर्शाती है। यह ऐसे समय में आया है जब राज्य में सत्तारूढ़ गठबंधन पहले से ही कई मोर्चों पर विपक्षी दबाव का सामना कर रहा है। आने वाले दिनों में यह देखना होगा कि सरकार अदालत की बार-बार की फटकार के बाद ठोस कदम उठाती है या नहीं।