इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले का मुस्लिम समुदाय ने स्वागत किया, बोले — 'विवादित जगहों पर नमाज उचित नहीं'

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इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले का मुस्लिम समुदाय ने स्वागत किया, बोले — 'विवादित जगहों पर नमाज उचित नहीं'

सारांश

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने संभल में विवादित जमीन पर नमाज की अनुमति माँगने वाली अर्जी खारिज की — और मुस्लिम धर्मगुरुओं ने खुद इसका स्वागत किया। मौलाना बरेलवी से लेकर इकबाल अंसारी तक, सबने कहा कि इस्लाम और शरीयत भी यही कहते हैं: झगड़े और विवाद वाली जगहों पर नमाज उचित नहीं।

Key Takeaways

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने संभल ज़िले की कथित निजी जमीन पर नमाज़ की अनुमति और पुलिस सुरक्षा माँगने वाली अर्जी खारिज की। कोर्ट ने कहा कि धर्म-पालन का अधिकार किसी जगह को "बिना नियम-कानून के जमावड़े की जगह" बनाने का अधिकार नहीं देता। मौलाना चौधरी इब्राहिम हुसैन ने कहा — यह फैसला इस्लाम और कानून, दोनों के हिसाब से उचित है। ऑल इंडिया मुस्लिम जमात के अध्यक्ष मौलाना मुफ़्ती शहाबुद्दीन रिजवी बरेलवी ने कहा — शरीयत भी विवादित जगहों पर नमाज की इजाज़त नहीं देती। बाबरी मस्जिद मामले के पूर्व पक्षकार इकबाल अंसारी ने कहा — नमाज मस्जिदों में ही पढ़नी चाहिए, यह फैसला मानने योग्य है।

नई दिल्लीइलाहाबाद हाई कोर्ट के एक महत्वपूर्ण फैसले को मुस्लिम समुदाय के वरिष्ठ धर्मगुरुओं और नेताओं ने शनिवार, 2 मई 2026 को खुले दिल से स्वीकार किया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि धर्म का पालन करने का अधिकार किसी निजी या सार्वजनिक जगह को "बिना किसी नियम-कानून के जमावड़े वाली जगह" में बदलने का अधिकार नहीं देता। यह फैसला उत्तर प्रदेश के संभल ज़िले में एक कथित निजी भूमि पर नियमित नमाज़ पढ़ने की अनुमति और पुलिस सुरक्षा माँगने वाली अर्जी को खारिज करते हुए दिया गया।

फैसले की पृष्ठभूमि

इलाहाबाद हाई कोर्ट में दाखिल अर्जी में संभल की एक कथित निजी जमीन पर नियमित नमाज़ अदा करने की अनुमति और पुलिस सुरक्षा की माँग की गई थी। कोर्ट ने इस अर्जी को खारिज करते हुए कहा कि धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार असीमित नहीं है और इसे सार्वजनिक व्यवस्था तथा अन्य नागरिकों के अधिकारों के साथ संतुलित किया जाना आवश्यक है। गौरतलब है कि यह फैसला ऐसे समय में आया है जब देशभर में सार्वजनिक स्थलों पर धार्मिक गतिविधियों को लेकर बहस तेज़ है।

मुस्लिम धर्मगुरुओं की प्रतिक्रिया

मुस्लिम धर्मगुरु मौलाना चौधरी इब्राहिम हुसैन ने इस फैसले की सराहना करते हुए राष्ट्र प्रेस से कहा, "इस्लाम में, उन जगहों पर नमाज नहीं पढ़नी चाहिए जहाँ झगड़ा होने की गुंजाइश हो। साथ ही, नमाज पढ़ने के लिए एक खास जगह होनी चाहिए।" उन्होंने आगे कहा, "यह फैसला इस्लाम के हिसाब से भी और कानून के हिसाब से भी अच्छा है।"

हुसैन ने यह भी कहा कि चूँकि भारत में अनेक धर्मों के लोग एक साथ रहते हैं, इसलिए आपसी भाईचारा और सम्मान बनाए रखना अनिवार्य है। उनके अनुसार, "अगर किसी एक खास समुदाय के लोग सार्वजनिक जगहों पर अपनी धार्मिक रस्में निभाने लगें, तो इससे दूसरों की भावनाओं को ठेस पहुँच सकती है।" उन्होंने यह भी जोड़ा कि सार्वजनिक स्थल आम जनता के उपयोग के लिए होते हैं और वहाँ किसी भी प्रकार का विवाद उचित नहीं।

ऑल इंडिया मुस्लिम जमात का समर्थन

ऑल इंडिया मुस्लिम जमात के राष्ट्रीय अध्यक्ष मौलाना मुफ़्ती शहाबुद्दीन रिजवी बरेलवी ने भी कोर्ट के फैसले का समर्थन किया। उन्होंने कहा, "'शरीयत-ए-इस्लामिया' भी यही कहती है कि झगड़े वाली जगहों पर नमाज नहीं पढ़नी चाहिए।" बरेलवी ने यह भी स्पष्ट किया कि उन जगहों पर भी नमाज नहीं पढ़नी चाहिए जो किसी के लिए भी आपत्तिजनक हो सकती हों।

उन्होंने व्यावहारिक पहलू को रेखांकित करते हुए कहा कि सार्वजनिक स्थलों पर शोर और भीड़भाड़ अधिक होती है और ऐसी जगहों से एम्बुलेंस भी गुज़रती हैं, इसलिए वहाँ नमाज पढ़ने से रास्ता अवरुद्ध नहीं होना चाहिए। उन्होंने राष्ट्र प्रेस से कहा, "मस्जिदों या अपने घरों जैसी शांत और सुरक्षित जगहों पर नमाज पढ़ना ज्यादा बेहतर है।" हालाँकि, उन्होंने यह भी कहा कि कुछ "नासमझ नौजवानों" ने नमाज को "मज़ाक का विषय" बना दिया है।

बाबरी मस्जिद मामले के पूर्व पक्षकार का बयान

बाबरी मस्जिद मामले के पुराने पक्षकार इकबाल अंसारी ने इस फैसले को उचित बताते हुए कहा, "हमारा मानना है कि मस्जिदें नमाज़ पढ़ने के लिए ही बनी हैं। लोग कभी-कभी सार्वजनिक जगहों पर नमाज़ पढ़ लेते हैं, लेकिन नमाज़ मस्जिदों में ही पढ़नी चाहिए।" अंसारी ने इस बात पर भी जोर दिया कि नियम और कानून सभी पर समान रूप से लागू होते हैं और यह फैसला सभी को मानना चाहिए।

आगे क्या

यह फैसला धार्मिक स्वतंत्रता और सार्वजनिक व्यवस्था के बीच संतुलन की एक महत्वपूर्ण न्यायिक व्याख्या के रूप में देखा जा रहा है। मुस्लिम धर्मगुरुओं के इस फैसले के समर्थन से सामाजिक सद्भाव की दिशा में एक सकारात्मक संदेश गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे फैसले भविष्य में सार्वजनिक स्थलों पर धार्मिक गतिविधियों से जुड़े विवादों को सुलझाने में मार्गदर्शक भूमिका निभा सकते हैं।

Point of View

जिसे मुख्यधारा की कवरेज अक्सर नज़रअंदाज़ करती है। यह केवल एक कानूनी आदेश नहीं, बल्कि समुदाय के भीतर से उठती एक आत्म-नियामक आवाज़ है। हालाँकि, यह भी ध्यान देने योग्य है कि 'विवादित स्थल' की परिभाषा अस्पष्ट रहने पर भविष्य में इसका दुरुपयोग भी संभव है। असली कसौटी यह होगी कि यह मानदंड सभी धर्मों पर समान रूप से लागू हो — केवल एक समुदाय पर नहीं।
NationPress
02/05/2026

Frequently Asked Questions

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने संभल नमाज मामले में क्या फैसला दिया?
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के संभल ज़िले में एक कथित निजी जमीन पर नियमित नमाज़ पढ़ने की अनुमति और पुलिस सुरक्षा माँगने वाली अर्जी खारिज कर दी। कोर्ट ने कहा कि धर्म-पालन का अधिकार किसी स्थान को बिना नियम-कानून के जमावड़े की जगह बनाने का अधिकार नहीं देता।
मुस्लिम धर्मगुरुओं ने इस फैसले का स्वागत क्यों किया?
मौलाना चौधरी इब्राहिम हुसैन और मौलाना मुफ़्ती शहाबुद्दीन रिजवी बरेलवी सहित कई धर्मगुरुओं ने कहा कि इस्लाम और शरीयत भी विवादित या झगड़े वाली जगहों पर नमाज़ पढ़ने की अनुमति नहीं देते। उनके अनुसार, नमाज़ के लिए मस्जिद या घर जैसी शांत और सुरक्षित जगहें उचित हैं।
इकबाल अंसारी ने इस फैसले पर क्या कहा?
बाबरी मस्जिद मामले के पूर्व पक्षकार इकबाल अंसारी ने कहा कि मस्जिदें नमाज़ के लिए ही बनी हैं और नमाज़ वहीं पढ़नी चाहिए। उन्होंने इसे एक अच्छा फैसला बताया और कहा कि नियम-कानून सभी पर समान रूप से लागू होते हैं।
क्या सार्वजनिक जगहों पर नमाज़ पढ़ना गैरकानूनी है?
इलाहाबाद हाई कोर्ट के इस फैसले के अनुसार, धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार असीमित नहीं है और इसे सार्वजनिक व्यवस्था के साथ संतुलित किया जाना चाहिए। हालाँकि, यह फैसला एक विशेष अर्जी के संदर्भ में है और इसे सभी मामलों पर सामान्य रूप से लागू करने के लिए कानूनी विशेषज्ञों की राय आवश्यक है।
यह फैसला सामाजिक सद्भाव के लिए क्यों महत्वपूर्ण है?
मुस्लिम धर्मगुरुओं ने इस फैसले का समर्थन करते हुए कहा कि भारत जैसे बहुधार्मिक देश में आपसी भाईचारा बनाए रखने के लिए यह ज़रूरी है कि कोई भी समुदाय सार्वजनिक जगहों पर ऐसी गतिविधियाँ न करे जो दूसरों की भावनाओं को ठेस पहुँचाए। यह फैसला धार्मिक स्वतंत्रता और सार्वजनिक व्यवस्था के बीच संतुलन की एक महत्वपूर्ण न्यायिक व्याख्या है।
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