क्या आईआईटी मद्रास के जीडीसी ने इनोवेशन और उद्यमिता को सब तक पहुंचाने पर जोर दिया?
सारांश
Key Takeaways
- उद्यमिता की क्षमता निर्माण
- महिला उद्यमियों की भागीदारी
- डीप-टेक और इनोवेशन की आवश्यकता
- नीति निर्माण और मेंटरशिप का महत्व
- विकसित भारत 2047 का विजन
चेन्नई, 19 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान मद्रास (आईआईटी-मद्रास) के गोपालकृष्णन-देशपांडे सेंटर फॉर इनोवेशन एंड एंटरप्रेन्योरशिप (जीडीसी) ने अपना छठा वार्षिक संपोजियम आयोजित किया। इस वर्ष की थीम थी “भारत में इनॉवेशन और उद्यमिता को डेमोक्रेटाइज करना।” यह कार्यक्रम 17 जनवरी 2026 को संपन्न हुआ, जिसमें देशभर के प्रमुख विचारकों, उद्योगपतियों, शिक्षाविदों और उद्यमियों ने भाग लिया।
संपोजियम का मुख्य ध्यान भारत में डीप-टेक और इनॉवेशन के विकास में उद्यमियों की केंद्रीय भूमिका पर था। इस दौरान गहन चर्चा की गई कि इनॉवेशन को स्केल करने में “क्षमता संपन्न उद्यमियों का निर्माण” एक बड़ी चुनौती है। इसलिए, नीति निर्माण, मेंटरशिप और फंडिंग को इस दिशा में और मजबूत करने की आवश्यकता पर जोर दिया गया।
यह आयोजन उस समय हुआ जब भारत के टियर-2 और टियर-3 शहरों में स्टार्टअप्स की संख्या तेजी से बढ़ रही है। महिला उद्यमियों की भागीदारी भी बढ़ रही है, और डिजिटल प्लेटफार्मों के माध्यम से संसाधनों की उपलब्धता आसान हो गई है। हालांकि, इस संपोजियम ने एक महत्वपूर्ण कमी की ओर ध्यान खींचा - उद्यमिता सोच और कौशलों का निरंतर विकास।
जीडीसी ने इस अवसर पर यह पुष्टि की कि वह भारत के सैकड़ों एसटीईएम विश्वविद्यालयों में फैकल्टी और शोधकर्ताओं की क्षमता बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध है, ताकि अनुसंधान को व्यावहारिक डीप-टेक स्टार्टअप्स में परिवर्तित किया जा सके। विकसित भारत 2047 के विजन को प्राप्त करने के लिए विज्ञान, अनुसंधान, इनॉवेशन, तकनीकी और स्टार्टअप्स की भूमिका को अत्यंत महत्वपूर्ण बताया गया। वक्ताओं ने कहा कि तकनीकी, फंडिंग और बुनियादी ढांचे की आवश्यकता है, लेकिन दीर्घकालिक सफल उद्यमिता के लिए असली कुंजी मेंटरिंग, पोषण और क्षमता निर्माण है।
कॉग्निजेंट टेक्नोलॉजी सॉल्यूशंस के को-फाउंडर और पूर्व वाइस चेयरमैन लक्ष्मी नारायणन ने अपने मुख्य भाषण में कहा कि वैज्ञानिक और शोधकर्ता कई तरीकों से उद्यमी बन सकते हैं। स्टार्टअप आरंभ करने के अलावा, वे बड़ी कंपनियों या सरकारी परियोजनाओं में जटिल तकनीकी समस्याओं को हल करके भी महत्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं। ऐसे परिणाम भी उद्यमिता की सफलता माने जाने चाहिए।
अनुसंधान नेशनल रिसर्च फाउंडेशन के CEO डॉ. शिवकुमार कल्याणरमन ने वीडियो के माध्यम से मुख्य भाषण दिया। उन्होंने एएनआरएफ के विभिन्न कार्यक्रमों जैसे एमएएचए मिशन मोड प्रोग्राम, पैर, पीएम प्रोफेसरशिप, और फंडामेंटल रिसर्च ग्रांट्स के बारे में जानकारी दी। उन्होंने ₹1 लाख करोड़ के आरडीआई पेशेंट कैपिटल फंड का भी उल्लेख किया।
अग्निकूल कॉसमॉस के को-फाउंडर और CEO श्रीनाथ रविचंद्रन ने बताया कि वे हमेशा खुद को “आईआईटी मद्रास स्टार्टअप” कहकर शुरू करते हैं, क्योंकि कंपनी की प्रारंभिक संस्कृति विश्वविद्यालय के वातावरण से आती है।
आईआईटी मद्रास के निदेशक प्रो. वी. कामकोटी ने बताया कि संस्थान में शिक्षा और उद्यमिता का लोकतंत्रीकरण बड़े पैमाने पर हो रहा है। ऑनलाइन बीएस प्रोग्राम से करीब 50,000 छात्रों को (जिनमें कई आर्थिक रूप से कमजोर हैं) उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षा प्राप्त हुई है। जीडीसी के माध्यम से देशभर के स्टार्टअप्स और उद्यमियों को लैब्स, इनक्यूबेटर्स और प्रोग्राम्स से सहायता मिल रही है।
‘भारत में लैब से मार्केट मूवमेंट को तेज करना’ विषय पर व्याख्यान देते हुए प्रो. कृष्णन बालासुब्रमण्यम ने भी महत्वपूर्ण विचार प्रस्तुत किए।
संपोजियम में यह सवाल भी उठा कि क्या भारत ने विकसित भारत 2047 के लक्ष्य के लिए उद्यमियों के प्रशिक्षण में पर्याप्त निवेश किया है। चर्चा में अत्याधुनिक अनुसंधान को बाजार-उपयुक्त समाधानों में बदलने के लिए बिजनेस समझ, लचीलापन और निर्णय क्षमता बढ़ाने पर जोर दिया गया।