डॉ. लालजी प्रसाद निर्मल का आरोप: अखिलेश यादव का दलित राजनीति में दोहरा रवैया
सारांश
Key Takeaways
- अखिलेश यादव पर दलित राजनीति में दोहरा रवैया अपनाने का आरोप।
- कांशीराम जी से जुड़े संस्थानों के नाम बदलने का मुद्दा।
- दलितों के अधिकारों की अनदेखी का आरोप।
- चुनावों के समय दलित समुदाय को याद करना राजनीतिक अवसरवाद।
- दलित समाज की जागरूकता में वृद्धि।
लखनऊ, 13 मार्च (राष्ट्र प्रेस)। अम्बेडकर महासभा ट्रस्ट के अध्यक्ष और विधान परिषद सदस्य डॉ. लालजी प्रसाद निर्मल ने समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव पर दलित राजनीति में दोहरा रवैया अपनाने का आरोप लगाया है।
उन्होंने कहा कि जैसे-जैसे विधानसभा चुनाव नजदीक आ रहा है, सपा प्रमुख को बहुजन नायक कांशीराम जी की याद आने लगी है, लेकिन सत्ता में रहते हुए उनके प्रति उनका सम्मान और प्रतिबद्धता दिखाई नहीं देती।
डॉ. निर्मल ने कहा कि मुख्यमंत्री रहते हुए अखिलेश यादव ने कांशीराम जी से जुड़े कई महत्वपूर्ण संस्थानों और स्थलों के नाम बदल दिए। उन्होंने बताया कि कांशीराम जी के नाम पर स्थापित जिला, मेडिकल कॉलेज और विश्वविद्यालयों का नाम तक बदल दिया गया।
उन्होंने आरोप लगाया कि सपा सरकार ने कांशीराम जी के नाम से बने अरबी-फारसी विश्वविद्यालय का नाम बदलकर मोइनुद्दीन चिश्ती विश्वविद्यालय कर दिया। इसी प्रकार, सहारनपुर मेडिकल कॉलेज, जिसे पहले कांशीराम मेडिकल कॉलेज के नाम से जाना जाता था, उसका नाम बदलकर महमूदुल हसन नदवी के नाम पर कर दिया गया। इतना ही नहीं, कांशीराम नगर का नाम भी बदलकर कासगंज कर दिया गया।
उन्होंने कहा कि अब चुनाव नजदीक आते ही दलित समाज के वोट हासिल करने के लिए सपा प्रमुख कांशीराम जी की जयंती को पीडीए दिवस के रूप में मनाने की घोषणा कर रहे हैं। सपा के इस तथाकथित पीडीए में अखिलेश सरकार के दौरान दलित समाज हमेशा उपेक्षित ही रहा है।
डॉ. निर्मल ने आरोप लगाया कि सपा सरकार के कार्यकाल में दलित अधिकारियों के साथ भी अन्याय हुआ। उस समय बदले की भावना से कई दलित अधिकारियों का डिमोशन किया गया, जिसके कारण एसडीएम स्तर के अधिकारियों को तहसीलदार बनकर काम करना पड़ा।
उन्होंने यह भी कहा कि दलितों के प्रमोशन में आरक्षण जैसे महत्वपूर्ण मुद्दे को भी सपा सरकार ने स्वतः संज्ञान लेकर समाप्त करने का प्रयास किया। सपा की राजनीति में दलितों का सम्मान और अधिकारों की जगह केवल वोट बैंक की चिंता दिखाई देती है। सत्ता में रहते समय जहां दलितों की उपेक्षा की गई, वहीं चुनाव आते ही उन्हें याद करना केवल राजनीतिक अवसरवाद का उदाहरण है।
डॉ. निर्मल ने कहा कि दलित समाज अब राजनीतिक दिखावे और अवसरवादी राजनीति को समझ चुका है और वह ऐसे किसी भी प्रयास से भ्रमित नहीं होगा।
-- राष्ट्र प्रेस
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