रूस-यूक्रेन संघर्ष पर भारत का स्पष्ट संदेश: संवाद और कूटनीति ही समाधान का रास्ता
सारांश
मुख्य बातें
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने 7 अक्टूबर 2026 को नई दिल्ली में आयोजित साप्ताहिक मीडिया ब्रीफिंग में स्पष्ट किया कि रूस-यूक्रेन संघर्ष के समाधान के लिए भारत संवाद और कूटनीति को ही एकमात्र प्रभावी मार्ग मानता है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बार-बार यह रेखांकित कर चुके हैं कि किसी भी समस्या का हल युद्ध के मैदान में नहीं, बल्कि बातचीत की मेज़ पर मिलता है।
भारत का सुसंगत रुख
जायसवाल ने कहा, 'यूक्रेन संघर्ष के मुद्दे पर भारत हमेशा से यह मानता रहा है कि संवाद और कूटनीति ही आगे का रास्ता है। प्रधानमंत्री कई बार कह चुके हैं कि यह युद्ध का युग नहीं है और किसी भी समाधान का रास्ता युद्ध के मैदान से नहीं निकलता।' उन्होंने बिश्केक में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से मोदी की मुलाकात का भी संदर्भ दिया, जिसमें प्रधानमंत्री ने अंतहीन युद्ध समाप्त कर शांति का रास्ता अपनाने का आह्वान किया था।
दोनों पक्षों से संवाद जारी
जायसवाल ने बताया कि भारत ने रूस और यूक्रेन, दोनों पक्षों के साथ लगातार संपर्क बनाए रखा है और शांति-स्थापना के उद्देश्य से दोनों देशों को इन प्रयासों की सराहना करते देखा गया है। उन्होंने रूसी राष्ट्रपति पुतिन और यूक्रेन के विदेश मंत्री आंद्री सिबिहा की हालिया सकारात्मक टिप्पणियों का उल्लेख किया, जिनमें दोनों ने भारत की मध्यस्थ भूमिका की प्रशंसा की। विदेश मंत्री एस. जयशंकर भी इन प्रयासों का सार्वजनिक रूप से उल्लेख कर चुके हैं।
विशेष मुद्दों पर बातचीत
प्रवक्ता ने बताया कि भारत, संघर्ष से जुड़े कुछ ठोस और संवेदनशील विषयों पर भी दोनों पक्षों से चर्चा कर रहा है। इनमें काला सागर में जहाज़ों की सुरक्षा, अनाज और ऊर्जा निर्यात से जुड़ी चिंताएँ तथा संभावित हमलों को रोकने की संभावनाएँ शामिल हैं।
जायसवाल के शब्दों में, 'भारत काला सागर में जहाजों की सुरक्षा, रूस और यूक्रेन की अनाज और ऊर्जा निर्यात से जुड़ी चिंताओं तथा संभावित हमलों को रोकने जैसे मुद्दों पर मददगार की भूमिका निभाने का प्रयास कर रहा है। इस संबंध में दोनों देशों के साथ हमारी बातचीत जारी है।'
पुतिन और ब्रिक्स का संदर्भ
गौरतलब है कि बीते सप्ताह मॉस्को में आयोजित एक कार्यक्रम में पुतिन ने कहा था कि प्रधानमंत्री मोदी हर मुलाकात में यूक्रेन संघर्ष को समाप्त करने का मुद्दा उठाते हैं और दोनों पक्षों को स्वीकार्य समाधान खोजने में गहरी रुचि रखते हैं। यह बयान ऐसे समय में आया था जब भारत की कूटनीतिक सक्रियता को पश्चिमी देशों में भी ध्यान से देखा जा रहा है।
इससे पहले, नई दिल्ली में आयोजित 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान पुतिन से मुलाकात में भी मोदी ने दोहराया था कि मौजूदा संघर्षों के निपटारे के लिए संवाद और कूटनीति सबसे प्रभावी माध्यम हैं। यह ऐसे समय में आया है जब वैश्विक स्तर पर युद्धविराम की माँग तेज़ हो रही है और कई देश मध्यस्थता की भूमिका में आना चाहते हैं।
भारत की भूमिका और आगे की राह
विश्लेषकों के अनुसार, भारत का यह रुख उसकी परंपरागत 'रणनीतिक स्वायत्तता' की नीति के अनुरूप है, जिसमें वह किसी एक गुट के साथ खड़ा हुए बिना शांति-प्रयासों में सक्रिय भूमिका निभाता है। काला सागर अनाज निर्यात और ऊर्जा सुरक्षा जैसे व्यावहारिक मुद्दों पर भारत की मध्यस्थता का दायरा आने वाले महीनों में और व्यापक होने की संभावना है।