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भारत की सभ्यतागत सोच से मिलेगा विश्व एकता का मार्ग : होसबोले का वाशिंगटन में ऐतिहासिक संबोधन

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भारत की सभ्यतागत सोच से मिलेगा विश्व एकता का मार्ग : होसबोले का वाशिंगटन में ऐतिहासिक संबोधन

सारांश

आरएसएस सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबोले ने वाशिंगटन में कहा कि भारत की सभ्यतागत सोच — वसुधैव कुटुंबकम — वैश्विक एकता का मार्ग है। भौतिक प्रगति के बावजूद मूल्यों के संकट से जूझ रही दुनिया को भारत का आध्यात्मिक-सांस्कृतिक दर्शन नई दिशा दे सकता है।

मुख्य बातें

आरएसएस सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबोले ने 24 अप्रैल को वाशिंगटन में आयोजित विशेष डिनर कार्यक्रम में भारत के वैश्विक विजन को विस्तार से प्रस्तुत किया।
होसबोले ने कहा कि भारत की सभ्यतागत सोच — वसुधैव कुटुंबकम — आज के वैश्विक विखंडन और पर्यावरण संकट का समाधान दे सकती है।
उन्होंने चेताया कि दुनिया में भौतिक प्रगति तो हुई है, लेकिन नैतिक मूल्यों में गिरावट आई है — ज्ञान बढ़ा, विवेक घटा।
विदेश नीति विशेषज्ञ वाल्टर रसेल मीड ने माना कि एक मजबूत और आत्मविश्वासी भारत एशिया में तनाव घटा सकता है।
अकादमिक वाल्टर एंडरसन ने आरएसएस को भारत में 'स्थिरता की धुरी' और समय के साथ अनुकूलन में सक्षम संगठन बताया।
होसबोले ने योग और संतुलित जीवनशैली के जरिए भारत की वैश्विक स्वास्थ्य नेतृत्व क्षमता को भी रेखांकित किया।

वाशिंगटन, 24 अप्रैलराष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबोले ने वाशिंगटन में आयोजित एक विशेष डिनर कार्यक्रम में कहा कि भारत की सभ्यतागत सोच आज की टूटती दुनिया को एकजुट करने का सबसे प्रभावी मार्ग प्रशस्त कर सकती है। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत इस ऐतिहासिक मोड़ पर एक अधिक शांतिपूर्ण और संतुलित वैश्विक व्यवस्था की नींव रखने में निर्णायक भूमिका निभा सकता है।

वाशिंगटन में भारत के वैश्विक विजन पर मंथन

"भारत का वैश्विक विजन और उभरते विश्व में उसकी भूमिका" विषय पर आयोजित इस विशेष कार्यक्रम में होसबोले ने भारत की परंपराओं को महज अतीत की विरासत नहीं, बल्कि आज की ज्वलंत वैश्विक समस्याओं — जैसे सामाजिक विखंडन और पर्यावरण संकट — का व्यावहारिक समाधान बताया।

उन्होंने कहा, "भारत की सोच यह मानती है कि पूरे अस्तित्व में एक ही एकता है — यह एकता हर जीवित और निर्जीव चीज में मौजूद है।" यही विचार भारत के विश्व दृष्टिकोण की आधारशिला है।

भौतिक प्रगति बनाम मूल्यों का संकट

होसबोले ने दुनिया की मौजूदा दशा पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि मानव ने भौतिक दृष्टि से अभूतपूर्व तरक्की की है, किंतु नैतिक और मूल्यगत स्तर पर वह पिछड़ता जा रहा है। उनके शब्दों में — "हमारे पास संपत्ति बढ़ी है, लेकिन मूल्य नहीं। ज्ञान बढ़ा है, लेकिन विवेक घटा है। विशेषज्ञ बढ़े हैं, लेकिन समस्याएं भी।"

यह टिप्पणी उस वैश्विक संदर्भ में महत्वपूर्ण है जब अमेरिका-चीन व्यापार युद्ध, यूक्रेन संघर्ष और पश्चिम एशिया में अस्थिरता ने दुनिया को एक नई अनिश्चितता की ओर धकेल दिया है। ऐसे में भारत का सभ्यतागत दर्शन एक वैकल्पिक वैश्विक मॉडल के रूप में प्रासंगिक हो उठता है।

होसबोले ने कहा कि भारत की सोच "प्रकृति को मां" मानती है और यह स्वीकार करती है कि पृथ्वी हमारी जरूरतों के लिए पर्याप्त है, लेकिन लालच के लिए नहीं — यह विचार महात्मा गांधी के दर्शन की भी प्रतिध्वनि है।

विविधता उत्सव है, संघर्ष नहीं

दत्तात्रेय होसबोले ने विविधता को लेकर एक स्पष्ट दृष्टिकोण रखा — विविधता को टकराव का कारण नहीं, बल्कि मानव समाज की सुंदरता के रूप में देखा जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि अलग-अलग संस्कृतियों को अपनी अनूठी पहचान बनाए रखते हुए एकता के साथ जीना होगा।

उन्होंने वसुधैव कुटुंबकम"दुनिया एक परिवार है" — के भारतीय दर्शन का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत ने इसे केवल कहा नहीं, बल्कि सदियों से जीकर भी दिखाया है। ऐतिहासिक रूप से भारत में विभिन्न धर्मों, संप्रदायों और संस्कृतियों के लोग दीर्घकाल से शांतिपूर्वक सह-अस्तित्व में रहते आए हैं।

उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि मानव-मानव, मानव-प्रकृति और मानव-सृष्टि के बीच के संबंधों को समझना भारतीय दर्शन की विशेषता रही है। सत्य एक है, लेकिन उसे पाने के मार्ग अनेक — यही भारत की बहुलवादी सोच की ताकत है।

भारत की वैश्विक भूमिका और आंतरिक सशक्तिकरण

होसबोले ने स्पष्ट किया कि यदि भारत को यह वैश्विक नेतृत्व की भूमिका निभानी है, तो पहले उसे भीतर से सुदृढ़ होना होगा। उन्होंने कहा कि आत्मविश्वासी, समृद्ध और सांस्कृतिक रूप से जागरूक भारत ही आधुनिकता और परंपरा का सफल संगम स्थापित कर सकता है।

उन्होंने यह भी दोहराया कि भारत ने कभी विस्तारवादी नीति नहीं अपनाई — न किसी देश पर आक्रमण किया, न किसी को दास बनाया। दुनियाभर में बसे भारतीय प्रवासी अपने मेजबान देशों के विकास में योगदान देते हैं और सामाजिक सामंजस्य की मिसाल पेश करते हैं।

होसबोले ने यह भी जोड़ा कि भारत केवल भू-राजनीति में नहीं, बल्कि स्वास्थ्य और जीवनशैली के क्षेत्र में भी वैश्विक दिशा-निर्देशक बन सकता है। आज पूरी दुनिया योग और संतुलित जीवनशैली के लिए भारत की ओर देख रही है — यह सांस्कृतिक कूटनीति का सबसे सशक्त माध्यम है।

विशेषज्ञों की प्रतिक्रिया और आरएसएस की वैश्विक छवि

कार्यक्रम में उपस्थित著名 विदेश नीति विशेषज्ञ वाल्टर रसेल मीड ने भारत की भूमिका पर सहमति जताते हुए कहा कि एक "मजबूत, आत्मविश्वासी और विश्वोन्मुखी भारत" वैश्विक राजनीति को नई दिशा दे सकता है और विशेष रूप से एशिया में तनाव को कम करने में सहायक हो सकता है।

वहीं, आरएसएस के दीर्घकालीन अध्येता और अकादमिक वाल्टर एंडरसन ने संगठन को भारत में "स्थिरता की धुरी" करार दिया। उन्होंने कहा कि आरएसएस राष्ट्रभक्ति को सर्वोच्च प्राथमिकता देता है और बदलते समय के साथ खुद को अनुकूलित करने की क्षमता रखता है।

गौरतलब है कि यह कार्यक्रम ऐसे समय में हुआ जब भारत-अमेरिका संबंध एक नई ऊंचाई पर हैं और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश नीति के तहत भारत की वैश्विक उपस्थिति लगातार विस्तृत हो रही है। आरएसएस के शीर्ष नेतृत्व का वाशिंगटन में इस स्तर का संवाद भारत की सॉफ्ट पावर कूटनीति की बढ़ती स्वीकार्यता को दर्शाता है।

इस कार्यक्रम में सामुदायिक नेता, विद्वान और नीति-निर्माता शामिल हुए, जहां भारत की बढ़ती वैश्विक भूमिका और उसके सभ्यतागत विचारों पर गहन विमर्श हुआ। आने वाले समय में होसबोले के इस दौरे के परिणाम भारत-अमेरिका सांस्कृतिक और कूटनीतिक संबंधों को नई गहराई दे सकते हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि भारत की उस बढ़ती वैश्विक महत्वाकांक्षा का प्रतिबिंब है जो अब सांस्कृतिक कूटनीति के माध्यम से पश्चिमी नीति-निर्माताओं तक पहुंच रही है। विडंबना यह है कि जब भारत 'वसुधैव कुटुंबकम' का संदेश विश्व को दे रहा है, तब घरेलू स्तर पर सामाजिक सौहार्द की चुनौतियां भी कम नहीं हैं — इस अंतर्विरोध को नजरअंदाज करना बेईमानी होगी। होसबोले का यह दौरा दर्शाता है कि आरएसएस अब केवल संगठनात्मक नहीं, बल्कि वैचारिक और कूटनीतिक मोर्चे पर भी सक्रिय है। भारत की सॉफ्ट पावर की असली परीक्षा तब होगी जब उसके घरेलू आचरण और वैश्विक संदेश में एकरूपता दिखे।
RashtraPress
18 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

आरएसएस सरकार्यवाह होसबोले ने वाशिंगटन में क्या कहा?
आरएसएस सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबोले ने वाशिंगटन में कहा कि भारत की सभ्यतागत सोच दुनिया को एकजुट करने का मार्ग दिखा सकती है। उन्होंने 'वसुधैव कुटुंबकम' के दर्शन को आज की वैश्विक समस्याओं का समाधान बताया।
वसुधैव कुटुंबकम का क्या अर्थ है और यह क्यों महत्वपूर्ण है?
'वसुधैव कुटुंबकम' एक संस्कृत वाक्यांश है जिसका अर्थ है 'दुनिया एक परिवार है'। होसबोले ने कहा कि भारत ने इस विचार को केवल कहा नहीं, बल्कि सदियों से जीकर दिखाया है।
होसबोले ने दुनिया के मौजूदा संकट पर क्या कहा?
होसबोले ने कहा कि मानव ने भौतिक रूप से बहुत प्रगति की है, लेकिन नैतिक मूल्यों के स्तर पर वह पिछड़ा है। उनके अनुसार ज्ञान बढ़ा है पर विवेक घटा है, और विशेषज्ञ बढ़े हैं पर समस्याएं भी।
वाशिंगटन कार्यक्रम में विदेशी विशेषज्ञों ने भारत के बारे में क्या कहा?
विदेश नीति विशेषज्ञ वाल्टर रसेल मीड ने कहा कि एक मजबूत और आत्मविश्वासी भारत वैश्विक राजनीति को नई दिशा दे सकता है। अकादमिक वाल्टर एंडरसन ने आरएसएस को भारत में 'स्थिरता लाने वाली ताकत' बताया।
भारत की वैश्विक भूमिका के लिए होसबोले ने क्या शर्त रखी?
होसबोले ने कहा कि भारत को वैश्विक नेतृत्व निभाने के लिए पहले भीतर से मजबूत बनना होगा। उन्होंने आत्मविश्वासी, समृद्ध और सांस्कृतिक रूप से जागरूक समाज निर्माण को इसकी पूर्वशर्त बताया।
राष्ट्र प्रेस
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