जम्मू-कश्मीर में महिलाओं के अधिकारों का सफर: अनुच्छेद 370 और 35ए के निरस्त होने का प्रभाव
सारांश
Key Takeaways
- अनुच्छेद 370 और 35ए के हटने से महिलाओं को कई नए अधिकार मिले हैं।
- पंचायत राज संस्थाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण लागू किया गया।
- महिला श्रम भागीदारी दर में वृद्धि हुई है।
- महिलाओं के लिए विशेष पुलिस थाने और हेल्पलाइन स्थापित किए गए हैं।
- चुनौतियाँ अभी भी बनी हुई हैं, जिन्हें दूर करना आवश्यक है।
श्रीनगर, 13 मार्च (राष्ट्र प्रेस)। जम्मू-कश्मीर में महिलाओं को समान अधिकार प्राप्त करने के लिए का सफर कठिन और दीर्घ रहा है। दशकों से यहां की महिलाएं संपत्ति और अन्य अधिकारों में भेदभाव का सामना कर रही थीं। लेकिन 5 अगस्त 2019 को संसद ने अनुच्छेद 370 और अनुच्छेद 35ए को समाप्त कर दिया, जिसके बाद स्थिति में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन आया। इससे महिलाओं को कई नए अधिकार मिले, जिनसे पहले वे वंचित थीं।
अनुच्छेद 370 के लागू रहने के दौरान जम्मू-कश्मीर की महिलाओं को संपत्ति पर स्थायी अधिकार नहीं मिलते थे। यदि कोई महिला राज्य के बाहर के व्यक्ति से विवाह करती थी, तो उसे अपने पैतृक संपत्ति का अधिकार खोना पड़ता था। इसके साथ ही उसे जम्मू-कश्मीर की 'प्रथम श्रेणी नागरिक' की स्थिति भी गंवानी पड़ती थी, जो कि अनुच्छेद 35ए के तहत परिभाषित किया गया था।
हालांकि, 5 अगस्त 2019 को हुए बदलाव के साथ, जम्मू-कश्मीर में कई केंद्रीय कानून तत्काल प्रभाव से लागू हुए। अब राज्य की महिलाएं अपने पति के जन्मस्थान की परवाह किए बिना संपत्ति पर अधिकार रखती हैं।
अनुच्छेद 370 हटने के बाद, बाल विवाह, घरेलू हिंसा और संपत्ति में समान अधिकार से संबंधित कई केंद्रीय कानून लागू हुए, जैसे कि बाल विवाह निषेध अधिनियम 2006 और घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम 2005। इन कानूनों ने बाल विवाह और बच्चों के प्रति अत्याचार की कानूनी खामियों को दूर किया है।
इसी के साथ, पहले लागू रणबीर दंड संहिता को हटाकर भारतीय दंड संहिता को लागू किया गया। बाद में 1 जुलाई 2024 से तीन नए आपराधिक कानूनों की शुरुआत हुई: भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस), भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) और भारतीय साक्ष्य अधिनियम (बीएसए)। इन कानूनों में आतंकवाद, मॉब लिंचिंग और संगठित अपराध को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया गया है।
अब जम्मू-कश्मीर की महिलाएं अपनी शिकायतों के लिए राष्ट्रीय महिला आयोग से संपर्क कर सकती हैं। कई जिलों में महिलाओं के लिए विशेष पुलिस थाने भी खोले गए हैं। इसके अलावा, आरक्षण और समावेशी नीतियों ने महिलाओं के अधिकारों को और मजबूती दी है।
अनुच्छेद 370 हटने के बाद, पंचायत राज संस्थाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण को लागू किया गया। तेजस्विनी योजना के तहत यह व्यवस्था राष्ट्रीय मानकों के अनुसार लागू हुई। इसके अलावा, नारी शक्ति वंदन अधिनियम 2023 के तहत लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में भी महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण का रास्ता खुला।
राजनीतिक भागीदारी में भी बदलाव देखने को मिला है। 2020 में हुए जिला विकास परिषद चुनावों में महिलाओं ने बड़ी संख्या में सीटें जीतीं, जिससे कई क्षेत्रों में महिला मतदाताओं की भागीदारी 60 प्रतिशत तक पहुंच गई। इससे पहले, 1952 से 2014 तक विधानसभा में महिलाओं का प्रतिनिधित्व 3 प्रतिशत से भी कम था।
आर्थिक क्षेत्र में भी महिलाओं की भागीदारी में वृद्धि हुई है। महिला श्रम भागीदारी दर 2018-19 में 26.5 प्रतिशत थी, जो 2021 में बढ़कर 32.8 प्रतिशत हो गई। जम्मू-कश्मीर स्टार्टअप नीति 2024–27 के तहत 300 से अधिक महिला-नेतृत्व वाले स्टार्टअप पंजीकृत हुए हैं, जो इको-टूरिज्म, हस्तशिल्प और डिजिटल सेवाओं में कार्यरत हैं।
प्रधानमंत्री मुद्रा योजना के तहत 2025 तक जम्मू-कश्मीर में महिलाओं के दो लाख से अधिक खातों को ऋण स्वीकृत किया गया, जिसकी कुल राशि लगभग 47,704 करोड़ रुपए है। वहीं, उम्मीद योजना के तहत स्वयं सहायता समूहों ने ग्रामीण महिलाओं को आत्मनिर्भर बनने में मदद की है।
पर्यटन क्षेत्र में भी महिलाओं के लिए रोजगार के अवसर बढ़े हैं। वर्ष 2024 में जम्मू-कश्मीर में 2.3 करोड़ पर्यटक आए, जिससे हस्तशिल्प जैसे क्षेत्रों में महिलाओं को रोजगार मिला। 'कश्मीर बॉक्स' जैसे प्लेटफॉर्म स्थानीय महिला कारीगरों को वैश्विक बाजार से जोड़ रहे हैं।
हालांकि, चुनौतियां अभी भी मौजूद हैं। एक अध्ययन के अनुसार आदिवासी महिलाओं की साक्षरता दर 39.7 प्रतिशत है, जो राष्ट्रीय औसत 49.4 प्रतिशत से कम है। इससे उनकी आर्थिक भागीदारी प्रभावित होती है।
महिला शिक्षा के क्षेत्र में भी सुधार हुआ है। 2011 में महिला साक्षरता दर 56.4 प्रतिशत थी, जो बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ जैसी योजनाओं के कारण बढ़ी है। 2019 के बाद लड़कियों के नामांकन में भी वृद्धि हुई है। एम्स अवंतीपोरा और आईआईटी जम्मू जैसे नए संस्थानों ने शिक्षा के अवसर बढ़ाए हैं।
सुरक्षा के मामले में भी सुधार देखा गया है। अनुच्छेद 370 हटने के बाद नागरिक मौतों में लगभग 81 प्रतिशत की कमी आई है, जिससे महिलाओं की आवाजाही और सुरक्षा में सुधार हुआ है। महिलाओं के लिए 181 हेल्पलाइन और 50 ग्राम पंचायतों में नारी अदालतें भी स्थापित की गई हैं।
हालाँकि, सामाजिक चुनौतियाँ अभी भी बनी हुई हैं। 2018-19 में 3,069 दहेज से जुड़े मामले दर्ज किए गए, जो समाज में मौजूद समस्याओं को दर्शाते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि जम्मू-कश्मीर में महिलाओं के सशक्तीकरण की दिशा में कई सकारात्मक कदम उठाए गए हैं। लेकिन हिंसा, भ्रष्टाचार और क्षेत्रीय असमानताओं जैसी चुनौतियाँ अब भी महिलाओं की प्रगति में बाधक बनी हुई हैं। इन समस्याओं का समाधान आने वाले समय में सबसे बड़ी चुनौती साबित होगा।