क्या जेएनयू में नारेबाजी पर सांसद मनोज झा का यह कहना सही है कि अभिव्यक्ति की भी एक सीमा होनी चाहिए?
सारांश
Key Takeaways
- अभिव्यक्ति की एक सीमा होनी चाहिए।
- नारेबाजी के तरीके पर विचार आवश्यक है।
- आपराधिक न्याय प्रणाली में सुधार की आवश्यकता है।
- चुनिंदा मुद्दों पर गुस्सा स्वाभाविक है।
- लोकतंत्र की रक्षा के लिए संवाद जरूरी है।
नई दिल्ली, ६ जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। सर्वोच्च न्यायालय ने सोमवार को दिल्ली दंगों की साजिश से जुड़े मामले में आरोपी उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत देने से इनकार कर दिया था। इस निर्णय के बाद जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में विरोध-प्रदर्शन हुए। इस दौरान लगाए गए नारों को लेकर राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के राज्यसभा सदस्य मनोज झा ने लोकतंत्र, अभिव्यक्ति की मर्यादा और आपराधिक न्याय प्रणाली पर गंभीर प्रश्न उठाए हैं।
मनोज झा ने समाचार एजेंसी राष्ट्र प्रेस से विशेष बातचीत में कहा कि उन्होंने इस मुद्दे पर पहले भी लिखा और बोला है कि हमारे लोकतंत्र में 'मुर्दाबाद' जैसे नारों का उपयोग भी बंद होना चाहिए।
उन्होंने यह प्रश्न उठाया कि प्रदर्शन के दौरान लगाए गए अन्य आपत्तिजनक नारों और 'मुर्दाबाद' वाले नारों में आखिर क्या अंतर है। आक्रोश स्वाभाविक हो सकता है, लेकिन इसकी अभिव्यक्ति की भी एक सीमा होनी चाहिए। उन्होंने सुझाव दिया कि हमें एक साथ मिलकर यह तय करना चाहिए कि असहमति और विरोध किस भाषा में व्यक्त किया जाए।
शरजील इमाम और उमर खालिद के मामलों का उल्लेख करते हुए सांसद ने कहा कि देश में कई लोगों को यह लगा कि इन दोनों को जमानत मिल जानी चाहिए थी। उन्होंने कहा कि पांच साल से अधिक का समय बीत चुका है, लेकिन ट्रायल के नाम पर बहुत कम प्रगति हुई है। यह स्थिति अपने आप में चिंता का विषय है कि किसी व्यक्ति को कितने वर्षों तक जेल में रखा जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि यह आपराधिक न्याय प्रणाली पर एक गंभीर चोट है और 'चुनींदा गुस्सा' का सवाल भी यहीं से उठता है।
राज्यसभा सदस्य मनोज झा ने कहा कि लोगों का गुस्सा स्वाभाविक है, लेकिन यह देखना जरूरी है कि क्या यह गुस्सा सभी मामलों में समान रूप से दिखाई देता है या फिर चुनिंदा मुद्दों तक सीमित रह जाता है। लंबे समय तक बिना ठोस ट्रायल के किसी को जेल में रखना लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है और इस पर गंभीर चर्चा की आवश्यकता है।
मनोज झा ने बांग्लादेश में हिंदुओं पर हो रहे अत्याचारों के मुद्दे पर भी केंद्र सरकार और अधिकारियों की चुप्पी पर प्रश्न उठाए। उन्होंने पूछा कि ऐसे महत्वपूर्ण सवाल सत्ता के गलियारों तक क्यों नहीं पहुँचते और जनता को स्पष्ट उत्तर क्यों नहीं मिलते।
उन्होंने कहा कि वह अपनी आवाज उठा सकते हैं और संभव है कि कुछ चैनलों पर यह दिखाया भी जाए, लेकिन असली सवाल यह है कि इन समस्याओं का समाधान कौन करेगा। उन्होंने १९७१ का उदाहरण देते हुए कहा कि उस समय जब ऐसी परिस्थितियाँ बनी थीं, तब मल्टी-पार्टी मीटिंग्स बुलाई गई थीं और सामूहिक रूप से फैसले लिए गए थे, लेकिन वर्तमान में ऐसी कोई व्यापक चर्चा नहीं दिखती।
अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य का उल्लेख करते हुए मनोज झा ने आगे कहा कि जब अमेरिका जैसे देशों में प्रधानमंत्री पर तीखी टिप्पणियाँ हो रही हैं, तब भारत में एक तरह की चुप्पी और निराशा नजर आती है। दक्षिण एशिया का पूरा राजनीतिक और कूटनीतिक ढांचा चिंता का विषय बनता जा रहा है। उन्होंने आगे कहा कि सभी देश अपने-अपने रिपोर्ट कार्ड देखने में असमर्थ होते जा रहे हैं।