जेएनयू नारेबाजी मामले पर सद्गुरु रितेश्वर महाराज का कड़ा रुख, क्या संविधान से ऊपर कोई है?
सारांश
Key Takeaways
- संविधान का पालन सभी के लिए अनिवार्य है।
- राष्ट्र की एकता के लिए 'राष्ट्र कथा' का आयोजन महत्वपूर्ण है।
- असंवैधानिक गतिविधियों पर सख्त कार्रवाई होनी चाहिए।
लखनऊ, 10 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। दिल्ली स्थित जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी (जेएनयू) के परिसर में नारेबाजी के मामले पर सद्गुरु रितेश्वर महाराज ने एक सख्त रुख अपनाया है। उनका कहना है कि संविधान सभी पर समान रूप से लागू होता है और कोई भी इससे ऊपर नहीं है।
सद्गुरु रितेश्वर महाराज ने कहा कि जो भी व्यक्ति संविधान की सीमाओं से बाहर जाकर कार्य करता है, उसे इसके परिणाम भुगतने होंगे, चाहे वह एक जेएनयू का छात्र हो या किसी आश्रम से संबंधित व्यक्ति। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि संविधान का पालन सभी पर अनिवार्य है।
मीडिया से बातचीत में उन्होंने कहा कि यदि उनके श्रीआनंदम आश्रम में भी कोई असंवैधानिक गतिविधि होती है, तो सिर्फ यह कहकर जिम्मेदारी से भागा नहीं जा सकता कि वे एक आध्यात्मिक गुरु हैं। उन्होंने बताया कि वे भी संविधान के दायरे में आते हैं और जहां भी संविधान के खिलाफ कार्य होगा, चाहे वह किसी छात्र, साधु-संत या आम नागरिक ने किया हो, उस पर कानून के तहत सख्त कार्रवाई होनी चाहिए। संविधान का उल्लंघन किसी के लिए भी स्वीकार्य नहीं है।
हिंदू राष्ट्र के मुद्दे पर सद्गुरु रितेश्वर महाराज ने कहा कि हमारे ऋषि-मुनियों और महान विचारकों ने पहले ही यह स्पष्ट कर दिया था कि यह भूमि सनातन परंपराओं से जुड़ी हुई है। भारत की लगभग 140 करोड़ जनसंख्या परंपरा से सनातन मूल्यों से पोषित रही है। ये मूल्य लोगों के आचरण, रीति-रिवाजों और पूजा-पाठ में स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि ये परंपराएं कभी नहीं बदली हैं, इसलिए अलग से हिंदू राष्ट्र घोषित करने की कोई आवश्यकता नहीं है।
उन्होंने आगे कहा कि श्रीराम कथा, श्रीकृष्ण कथा, हनुमान कथा, शिव महापुराण कथा और देवी भागवत कथा जैसी धार्मिक कथाएं सदियों से चली आ रही हैं और ये लोगों को अपनी पवित्रता, संस्कृति और धर्म से परिचित कराती हैं। इसी क्रम में उनके मन में यह विचार आया कि यदि राष्ट्र सुरक्षित रहेगा, तो ही सब कुछ सुरक्षित रहेगा। राष्ट्र की एकता, अखंडता और सुरक्षा के लिए क्यों न ‘राष्ट्र कथा’ का आयोजन किया जाए, ताकि लोगों को देश के गौरवशाली इतिहास से अवगत कराया जा सके।
उन्होंने बताया कि ‘राष्ट्र कथा’ के माध्यम से यह बताया जाएगा कि दशमी शताब्दी से पहले भारत को सोने की चिड़िया क्यों कहा जाता था, किस तरह देश को लूटा गया और कैसे लोगों के मन में हीनभावना भरी गई। उनके अनुसार, यह हीन भावना आज भी कायम है, क्योंकि देश की शिक्षा नीति में अभी तक पूरा बदलाव नहीं आया है और हम आज भी काफी हद तक लॉर्ड मैकाले की शिक्षा नीति के प्रभाव में हैं।
सद्गुरु रितेश्वर महाराज ने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी ने लाल किले की प्राचीर से यह घोषणा की थी कि अगले दस वर्षों में मैकाले की शिक्षा नीति को पूरी तरह समाप्त कर दिया जाएगा। ऐसे में ‘राष्ट्र कथा’ छात्रों और आम नागरिकों के लिए बहुत आवश्यक है, विशेषकर उनके लिए जिन्हें अपने देश के इतिहास और गौरव की जानकारी नहीं है। उन्होंने कहा कि आज कई लोग पश्चिमी सभ्यता की ओर इतने अधिक आकर्षित हो गए हैं कि उन्होंने अपने देश के प्रति गर्व और भावनाएं खो दी हैं और ‘राष्ट्र कथा’ का उद्देश्य इसी सोच को बदलना है।