सीबीआई की बड़ी कार्रवाई: 30 साल से फरार अपराधी अनंत तांबिटकर गिरफ्तार
सारांश
Key Takeaways
- अनंत तांबिटकर की गिरफ्तारी से साबित होता है कि कानून अंततः सभी अपराधियों को पकड़ सकता है।
- सीबीआई की जांच की प्रक्रिया में तकनीकी खुफिया जानकारी का महत्व है।
- भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त कार्रवाई आवश्यक है।
- न्यायिक प्रक्रिया में समय लग सकता है, लेकिन अंततः सत्य की जीत होती है।
- समाज के सभी वर्गों को कानून का सम्मान करना चाहिए।
नई दिल्ली, 27 फरवरी (राष्ट्र प्रेस)। केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) ने एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए, लगभग तीन दशकों से फरार चल रहे एक घोषित अपराधी को पकड़ने में सफलता प्राप्त की है। बैंक धोखाधड़ी के एक पुराने मामले में कार्रवाई करते हुए सीबीआई ने वांछित आरोपी अनंत तांबिटकर को मुंबई से गिरफ्तार किया है।
सीबीआई द्वारा वर्ष 1992 में एक बैंक धोखाधड़ी का मामला दर्ज किया गया था, जिसमें स्टेट बैंक ऑफ बीकानेर एंड जयपुर (एसबीबीजे) को फर्जी वित्तीय लेन-देन के माध्यम से आर्थिक नुकसान पहुंचाया गया था। इस मामले की जांच के बाद, 1996 में चार्जशीट दायर की गई थी। सुनवाई पूरी होने के बाद, अदालत ने 9 आरोपियों को दोषी ठहराया था।
हालांकि, आरोपी अनंत तांबेडकर उर्फ अनंत तांबिटकर, जो जालसाजी और अन्य आपराधिक गतिविधियों में शामिल था, चार्जशीट दायर होने के बाद फरार हो गया था।
दीर्घकालिक न्यायिक प्रक्रिया से बचने के कारण अदालत ने उसे घोषित अपराधी (पीओ) घोषित कर दिया था और उसके मामले की सुनवाई अलग कर दी गई थी।
सीबीआई द्वारा शुक्रवार को जारी प्रेस नोट के अनुसार, तकनीकी खुफिया जानकारी और क्षेत्रीय सत्यापन के आधार पर आरोपी की लोकेशन मुंबई में निर्धारित की गई। इसके बाद सीबीआई की टीम ने 26 फरवरी 2026 को उसे मुंबई से गिरफ्तार कर लिया। विधिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद, आरोपी को न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया है।
इसके अतिरिक्त, एक अन्य मामले में सीबीआई कोर्ट ने भ्रष्टाचार से संबंधित मामले में निर्णय सुनाया। सिलीगुड़ी स्थित सीबीआई विशेष अदालत ने पूर्व सेंट्रल एक्साइज सुपरिटेंडेंट अचिंत्य कुमार प्रमाणिक को रिश्वत के मामले में 4 साल की कठोर कैद और 40 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई है। यह मामला 2015 का है, जब आरोपी कूच बिहार डिवीजन में असिस्टेंट कमिश्नर के पद पर तैनात थे। उन्होंने एक निजी फर्म के मालिक से 1 लाख रुपये रिश्वत मांगी थी।
सीबीआई ने ट्रैप लगाकर 15 सितंबर 2015 को 30 हजार रुपये रिश्वत लेते रंगे हाथों पकड़ा था। रकम बरामद हुई और 30 दिसंबर 2015 को चार्जशीट दायर की गई। अदालत ने सबूतों के आधार पर दोषी करार देते हुए सजा सुनाई।