'वन नेशन, वन इलेक्शन' पर JPC का लखनऊ दौरा, अनुराग ठाकुर बोले — सभी पक्षों की राय के बाद बनेगी रिपोर्ट
सारांश
मुख्य बातें
'वन नेशन, वन इलेक्शन' विधेयक की समीक्षा कर रही संयुक्त संसदीय समिति (JPC) अपने देशव्यापी परामर्श अभियान के तहत 13 जुलाई 2026 को लखनऊ पहुँची। भारतीय जनता पार्टी (BJP) के सांसद और JPC सदस्य अनुराग ठाकुर ने स्पष्ट किया कि समिति राजनीतिक दलों, सरकारी अधिकारियों और नागरिक समाज के प्रतिनिधियों सहित सभी हितधारकों की राय लेने के बाद ही अपनी अंतिम रिपोर्ट तैयार करेगी।
देशव्यापी परामर्श का दायरा
अनुराग ठाकुर ने बताया कि JPC अब तक कई राज्यों का दौरा कर चुकी है और उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ इस श्रृंखला की अगली कड़ी है। उन्होंने कहा, 'वन नेशन, वन इलेक्शन पर गठित संयुक्त संसदीय समिति कई राज्यों का दौरा कर चुकी है। इस दौरान राजनीतिक दलों, सरकारी अधिकारियों और सिविल सोसायटी के प्रतिनिधियों से बातचीत की जा रही है। सरकार द्वारा प्रस्तावित विधेयक को बेहतर बनाने के लिए सुझाव और संशोधन माँगे जा रहे हैं।'
मौजूदा चुनाव प्रणाली पर आपत्तियाँ
ठाकुर ने मौजूदा व्यवस्था की कमियाँ गिनाते हुए कहा कि पाँच वर्षों के दौरान बार-बार आदर्श आचार संहिता लागू होने से शासन बाधित होता है। उनके अनुसार, 'चुनावी प्रक्रिया अक्सर अन्य महत्वपूर्ण प्रशासनिक कार्यों पर हावी हो जाती है, क्योंकि बड़ी संख्या में सरकारी कर्मचारियों और संसाधनों को चुनावी ड्यूटी में लगाया जाता है।' उन्होंने यह भी कहा कि बार-बार के चुनाव निवेश और विकास परियोजनाओं की गति को प्रभावित करते हैं।
राजनीतिक दलों की मिली-जुली प्रतिक्रिया
ठाकुर ने स्वीकार किया कि 'वन नेशन, वन इलेक्शन' को लेकर राजनीतिक दलों की राय एकसमान नहीं है। उन्होंने कहा, 'कुछ दलों को आशंका है कि अगर देशभर में एक साथ चुनाव होते हैं तो राष्ट्रीय मुद्दे चुनावी चर्चा में ज़्यादा प्रभावी हो सकते हैं और क्षेत्रीय मुद्दों को पर्याप्त जगह नहीं मिल पाएगी।' हालाँकि उन्होंने दावा किया कि इस पहल के समर्थन में पर्याप्त आँकड़े और व्यापक जन-समर्थन मौजूद है।
रिपोर्ट और संसदीय प्रक्रिया की अगली कड़ी
JPC की 17 जुलाई को होने वाली बैठक में रिपोर्ट को अंतिम रूप देकर स्वीकार किए जाने की उम्मीद है। इसके बाद रिपोर्ट आगे की विधायी प्रक्रिया के लिए संसद में प्रस्तुत की जाएगी। यह ऐसे समय में आया है जब विपक्षी दल इस विधेयक के संवैधानिक निहितार्थों को लेकर सवाल उठाते रहे हैं और संघवाद पर इसके प्रभाव को लेकर बहस जारी है।