जेपीसी का गुजरात दौरा: 'एक राष्ट्र, एक चुनाव' पर राजनीतिक दलों और अधिकारियों से विस्तृत विचार-विमर्श

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जेपीसी का गुजरात दौरा: 'एक राष्ट्र, एक चुनाव' पर राजनीतिक दलों और अधिकारियों से विस्तृत विचार-विमर्श

सारांश

'एक राष्ट्र, एक चुनाव' पर जेपीसी का गुजरात दौरा महज औपचारिकता नहीं — यह उस प्रस्ताव की ज़मीनी परीक्षा है जो 1967 के बाद से अटका है। गांधीनगर में BJP, कांग्रेस और AAP की अलग-अलग राय सामने आई, जबकि अर्थशास्त्रियों का दावा है कि एक साथ चुनाव से ₹7 लाख करोड़ की बचत और जीडीपी में 1.6% की वृद्धि संभव है।

मुख्य बातें

जेपीसी ने 20 मई 2026 को गांधीनगर में 'एक राष्ट्र, एक चुनाव' पर तीन दिवसीय दौरे का दूसरा दिन पूरा किया।
समिति में 39 सदस्य हैं — लोकसभा के 27 और राज्यसभा के 12 सांसद; अध्यक्ष पीपी चौधरी (BJP)।
BJP, कांग्रेस और AAP के प्रतिनिधिमंडलों ने समिति के समक्ष अपनी-अपनी राय रखी; विपक्ष ने संघीय सिद्धांतों और चुनावी निष्पक्षता पर चिंताएँ जताईं।
अर्थशास्त्रियों के हवाले से कहा गया कि एक साथ चुनाव से देश ₹7 लाख करोड़ बचा सकता है और जीडीपी में 1.6% की वृद्धि संभव है।
गुजरात के प्रशासनिक मॉडल को अन्य राज्यों के लिए नमूने के रूप में साझा करने की योजना है।
संवैधानिक बदलाव पूरे होने पर यह व्यवस्था 2029 से लागू हो सकती है।

संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) ने 20 मई 2026 को गांधीनगर में अपने तीन दिवसीय गुजरात दौरे के दूसरे दिन 'एक राष्ट्र, एक चुनाव' प्रस्ताव पर गहन चर्चा जारी रखी। समिति ने प्रमुख राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों, मौजूदा विधायकों और राज्य के वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों के साथ विस्तृत विचार-विमर्श किया। यह दौरा संविधान (129वें संशोधन) विधेयक, 2024 की जांच प्रक्रिया का हिस्सा है।

समिति की संरचना और कार्यक्षेत्र

39 सदस्यीय इस जेपीसी में लोकसभा के 27 सांसद और राज्यसभा के 12 सांसद शामिल हैं। समिति की अध्यक्षता भारतीय जनता पार्टी (BJP) के सांसद पीपी चौधरी कर रहे हैं। समिति को लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने के संवैधानिक एवं प्रशासनिक पहलुओं की जांच का दायित्व सौंपा गया है। इसके अंतर्गत संविधान (129वां संशोधन) विधेयक, 2024 और केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक, 2024 की बारीकी से समीक्षा की जा रही है।

मुख्य घटनाक्रम

दौरे के पहले दिन समिति ने गांधीनगर के जीआईएफटी सिटी में राज्य के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ बैठक की, जिसमें शासन संरचनाओं और चुनावी तैयारियों पर विस्तृत जानकारी साझा की गई। अध्यक्ष पीपी चौधरी ने इस प्रस्तुति को 'आदर्श' बताते हुए कहा कि यह पहली बार है जब समिति के समक्ष इतनी व्यापक और एकीकृत जानकारी प्रस्तुत की गई। उन्होंने मुख्य सचिव और वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों के प्रयासों की सराहना की तथा संकेत दिया कि गुजरात के इस मॉडल को अन्य राज्यों के साथ नमूने के रूप में साझा किया जाएगा।

दूसरे दिन समिति ने सभी प्रमुख दलों के प्रतिनिधियों को आमंत्रित किया। आम आदमी पार्टी (AAP) के प्रतिनिधिमंडल में प्रदेश अध्यक्ष इसुदान गढ़वी, विधायक गोपाल इटालिया और चैतर वसावा शामिल रहे। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (कांग्रेस) के प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व प्रदेश अध्यक्ष अमित चावड़ा ने किया, जिसमें विधायक इमरान खेड़ावाला भी शामिल थे। BJP का प्रतिनिधित्व वरिष्ठ पदाधिकारियों और विधायकों ने किया।

मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल, उपमुख्यमंत्री हर्ष संघवी, विधानसभा अध्यक्ष शंकर चौधरी और कई कैबिनेट मंत्री भी इन चर्चाओं में भागीदार रहे।

राजनीतिक प्रतिक्रिया

BJP नेताओं ने प्रस्ताव के प्रति अपना समर्थन दोहराया, जबकि विपक्षी दलों ने संवैधानिक ढाँचे, संघीय सिद्धांतों और चुनावी निष्पक्षता से जुड़ी चिंताएँ उठाईं। चौधरी ने पत्रकारों को बताया कि इन चर्चाओं का उद्देश्य संसद के लिए अंतिम सिफारिशें तैयार करने से पहले राज्यों, राजनीतिक हितधारकों और विभिन्न संस्थाओं से व्यवस्थित सुझाव एकत्र करना है। उन्होंने यह भी कहा कि अर्थशास्त्रियों के अनुसार एक साथ चुनाव कराने से जीडीपी में 1.6 प्रतिशत की वृद्धि हो सकती है और देश ₹7 लाख करोड़ की बचत कर सकता है, जिसे बुनियादी ढाँचे, शिक्षा, स्वास्थ्य और कल्याणकारी कार्यों में लगाया जा सकता है।

ऐतिहासिक संदर्भ

भारत में आखिरी बार एक साथ चुनाव 1967 में हुए थे। इसके बाद कई विधानसभाओं और लोकसभा के समय से पहले भंग होने के कारण यह क्रम टूट गया। यह प्रस्ताव पूर्व राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद की अध्यक्षता वाली उच्च-स्तरीय समिति की रिपोर्ट के बाद गहन जांच के दौर से गुजर रहा है। उस समिति ने चरणबद्ध दृष्टिकोण का सुझाव दिया है, जिसमें चुनावी चक्रों का तालमेल और मध्यावधि में विधानसभा भंग होने की स्थिति से निपटने के प्रावधान शामिल हैं।

आगे की राह

यदि संवैधानिक बदलाव पूरे हो जाते हैं, तो इस व्यवस्था को 2029 से लागू किया जा सकता है। जेपीसी से अपेक्षा है कि वह गुजरात दौरे के शेष दिनों में भी हितधारकों से विचार-विमर्श जारी रखेगी और इसके बाद अपनी संसदीय रिपोर्ट के लिए प्राप्त सुझावों को संकलित करने की प्रक्रिया शुरू करेगी।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन असली सवाल यह है कि विपक्ष की संघीय और संवैधानिक चिंताओं को अंतिम रिपोर्ट में कितनी जगह मिलेगी। गुजरात मॉडल की तारीफ और उसे दूसरे राज्यों के लिए 'नमूना' बनाने की घोषणा इस बात का संकेत देती है कि समिति का झुकाव पहले से तय दिशा में है। ₹7 लाख करोड़ की बचत और 1.6% जीडीपी वृद्धि के दावे आकर्षक हैं, लेकिन इनका स्वतंत्र सत्यापन अभी तक सार्वजनिक नहीं हुआ। 1967 के बाद से टूटे इस चुनावी क्रम को जोड़ना संवैधानिक इंजीनियरिंग का सबसे जटिल प्रयोग होगा — और इसकी सफलता केवल संसद की मंज़ूरी पर नहीं, बल्कि राज्यों की सहमति और न्यायिक समीक्षा पर भी निर्भर करेगी।
RashtraPress
20 मई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

'एक राष्ट्र, एक चुनाव' जेपीसी क्या है और इसका काम क्या है?
यह 39 सदस्यीय संयुक्त संसदीय समिति है जिसे संविधान (129वें संशोधन) विधेयक, 2024 और केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक, 2024 की जांच का काम सौंपा गया है। इसका उद्देश्य लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने की संवैधानिक और प्रशासनिक व्यवहार्यता परखना है।
जेपीसी का गुजरात दौरा क्यों महत्वपूर्ण है?
गुजरात दौरे में राज्य सरकार ने शासन संरचनाओं और चुनावी तैयारियों पर जो प्रस्तुति दी, उसे जेपीसी अध्यक्ष पीपी चौधरी ने 'आदर्श' बताया और इसे अन्य राज्यों के लिए नमूने के रूप में साझा करने की बात कही। यह दौरा समिति की उस व्यापक प्रक्रिया का हिस्सा है जिसमें राज्यों और राजनीतिक हितधारकों से व्यवस्थित सुझाव एकत्र किए जा रहे हैं।
एक साथ चुनाव से आर्थिक लाभ कितना होगा?
जेपीसी अध्यक्ष पीपी चौधरी ने कहा कि अर्थशास्त्रियों के अनुसार एक साथ चुनाव कराने से देश ₹7 लाख करोड़ की बचत कर सकता है और जीडीपी में 1.6 प्रतिशत की वृद्धि हो सकती है। यह बचत बुनियादी ढाँचे, शिक्षा, स्वास्थ्य और कल्याणकारी कार्यों में लगाई जा सकती है।
विपक्षी दलों ने 'एक राष्ट्र, एक चुनाव' पर क्या चिंताएँ जताईं?
कांग्रेस और AAP सहित विपक्षी दलों ने संवैधानिक ढाँचे, संघीय सिद्धांतों और चुनावी निष्पक्षता से जुड़ी चिंताएँ उठाईं। उनका तर्क है कि एक साथ चुनाव कराने की व्यवस्था राज्यों की स्वायत्तता और लोकतांत्रिक जवाबदेही को प्रभावित कर सकती है।
'एक राष्ट्र, एक चुनाव' कब से लागू हो सकता है?
पूर्व राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद की अध्यक्षता वाली उच्च-स्तरीय समिति ने चरणबद्ध दृष्टिकोण का सुझाव दिया है। यदि संवैधानिक संशोधन प्रक्रिया पूरी हो जाती है, तो यह व्यवस्था 2029 से लागू की जा सकती है।
राष्ट्र प्रेस
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