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'जुर्म' और 'हार जीत': जुलाई 1990 में एक ही कहानी से बनीं दो अलग हिंदी फिल्में, दोनों रहीं हिट

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'जुर्म' और 'हार जीत': जुलाई 1990 में एक ही कहानी से बनीं दो अलग हिंदी फिल्में, दोनों रहीं हिट

सारांश

जुलाई 1990 में हिंदी सिनेमा ने एक अनोखा संयोग देखा — महज दो हफ्ते के अंतर पर 'जुर्म' और 'हार जीत' रिलीज हुईं, दोनों एक ही हॉलीवुड फिल्म से प्रेरित लव-ट्राएंगल कहानियाँ। हैरानी की बात यह कि अलग-अलग किरदारों के साथ दोनों ने दर्शकों का दिल जीता।

मुख्य बातें

13 जुलाई 1990 को रिलीज 'जुर्म' में विनोद खन्ना , मीनाक्षी शेषाद्रि और संगीता बिजलानी मुख्य भूमिकाओं में थे; निर्देशन महेश भट्ट ने किया।
27 जुलाई 1990 को रिलीज 'हार जीत' में कबीर बेदी , माधवी और फराह नाज़ ने लव-ट्राएंगल की कहानी पेश की।
दोनों फिल्में हॉलीवुड फिल्म 'समवन टू वॉच ओवर मी' की कहानी से प्रेरित बताई जाती हैं।
एक ही महीने में एक जैसी कहानी के बावजूद दोनों फिल्मों ने बॉक्स ऑफिस पर अच्छा प्रदर्शन किया।
यह 90 के दशक की उस बॉलीवुड परंपरा की मिसाल है जब सफल फॉर्मूले को बदले किरदारों के साथ दोहराया जाता था।

हिंदी सिनेमा के इतिहास में जुलाई 1990 का महीना एक दिलचस्प संयोग के लिए याद किया जाता है — इस दौरान सिनेमाघरों में महज दो हफ्ते के अंतराल पर दो ऐसी फिल्में रिलीज हुईं, जिनकी बुनियादी कहानी लगभग एक जैसी थी, लेकिन किरदार और नाम बिल्कुल अलग। दोनों ने बॉक्स ऑफिस पर दर्शकों का भरपूर प्यार बटोरा।

पहली फिल्म: 'जुर्म'

13 जुलाई 1990 को रिलीज हुई फिल्म 'जुर्म' में विनोद खन्ना ने इंस्पेक्टर शेखर वर्मा का किरदार निभाया। कहानी में शेखर अपनी पत्नी मीनाक्षी शेषाद्रि से गहरा प्यार करता है, लेकिन एक आपराधिक मामले की गवाह संगीता बिजलानी की मदद करते-करते उनके प्रति आकर्षित हो जाता है। फिल्म विवाहोत्तर संबंध को नैतिक रूप से गलत ठहराती है और भावनात्मक संघर्ष के बाद शेखर अपनी पत्नी का दिल दोबारा जीत लेता है।

फिल्म का निर्देशन महेश भट्ट ने किया था और यह उस साल की चर्चित हिट फिल्मों में शामिल रही।

दूसरी फिल्म: 'हार जीत'

ठीक दो हफ्ते बाद, 27 जुलाई 1990 को 'हार जीत' सिनेमाघरों में उतरी। इस फिल्म में कबीर बेदी, माधवी और फराह नाज़ ने मुख्य भूमिकाएँ निभाईं। 'जुर्म' की ही तरह यहाँ भी एक लव-ट्राएंगल की कहानी थी, जिसमें कबीर बेदी शादीशुदा होते हुए भी विवाहोत्तर संबंध में लिप्त हो जाते हैं। फिल्म दो रिश्तों के बीच के भावनात्मक द्वंद्व को केंद्र में रखती है।

यह ऐसे समय में आई जब दर्शकों ने महज दो सप्ताह पहले 'जुर्म' में यही कहानी देखी थी — फिर भी 'हार जीत' को सिनेमाघरों में अच्छी प्रतिक्रिया मिली।

दोनों फिल्मों की साझा प्रेरणा

गौरतलब है कि 'जुर्म' और 'हार जीत' — दोनों ही हॉलीवुड फिल्म 'समवन टू वॉच ओवर मी' (Someone to Watch Over Me) की कहानी से प्रेरित बताई जाती हैं। यह अपने आप में एक दुर्लभ संयोग था कि एक ही विदेशी फिल्म की कहानी को आधार बनाकर हिंदी सिनेमा में एक ही महीने में दो अलग-अलग फिल्में बनाई और रिलीज की गईं।

बॉक्स ऑफिस पर दोनों का प्रदर्शन

हैरान करने वाली बात यह रही कि एक जैसी कहानी होने के बावजूद दोनों फिल्मों ने दर्शकों को सिनेमाघरों तक खींचा। विनोद खन्ना और महेश भट्ट की जोड़ी ने 'जुर्म' को उस साल की यादगार फिल्मों में जगह दिलाई, जबकि कबीर बेदी अभिनीत 'हार जीत' भी दर्शकों के बीच सराही गई। यह दोनों फिल्में 90 के दशक के हिंदी सिनेमा की उस परंपरा की मिसाल हैं, जब एक सफल फॉर्मूले को थोड़े बदलाव के साथ दोबारा परोसा जाता था।

हिंदी फिल्म इतिहास में ऐसे संयोग कम ही देखने को मिलते हैं — और 1990 का यह जुलाई उनमें से एक बना रहेगा।

संपादकीय दृष्टिकोण

जहाँ दर्शक एल्गोरिदम से तुलना कर सकते हैं, ऐसा प्रयोग शायद संभव न होता।
RashtraPress
26 जून 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

फिल्म 'जुर्म' (1990) की कहानी क्या थी?
'जुर्म' में विनोद खन्ना एक शादीशुदा पुलिस इंस्पेक्टर की भूमिका में हैं जो एक आपराधिक मामले की गवाह के प्रति आकर्षित हो जाते हैं। फिल्म विवाहोत्तर संबंध को नैतिक रूप से गलत ठहराती है और अंत में नायक अपनी पत्नी का दिल दोबारा जीत लेता है।
'हार जीत' (1990) में कौन-कौन से कलाकार थे?
'हार जीत' में कबीर बेदी, माधवी और फराह नाज़ ने मुख्य भूमिकाएँ निभाईं। फिल्म 27 जुलाई 1990 को रिलीज हुई थी।
'जुर्म' और 'हार जीत' किस हॉलीवुड फिल्म से प्रेरित थीं?
दोनों फिल्में हॉलीवुड फिल्म 'समवन टू वॉच ओवर मी' (Someone to Watch Over Me) की कहानी से प्रेरित बताई जाती हैं। एक ही स्रोत से प्रेरित दो हिंदी फिल्मों का एक ही महीने में रिलीज होना बॉलीवुड इतिहास में दुर्लभ संयोग माना जाता है।
'जुर्म' का निर्देशन किसने किया था?
'जुर्म' (1990) का निर्देशन महेश भट्ट ने किया था। फिल्म उस साल की चर्चित हिट फिल्मों में शामिल रही।
क्या एक जैसी कहानी होने के बावजूद दोनों फिल्में सफल रहीं?
हाँ, रिपोर्टों के अनुसार दोनों फिल्मों ने बॉक्स ऑफिस पर अच्छा प्रदर्शन किया। यह उस दौर के दर्शकों की उस प्रवृत्ति को दर्शाता है जहाँ सितारों की उपस्थिति और भावनात्मक कहानी कहानी की मौलिकता से अधिक मायने रखती थी।
राष्ट्र प्रेस
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