क्या बिहार चुनाव 2025 में फतुहा सीट पर राजद का दबदबा जारी रहेगा?

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क्या बिहार चुनाव 2025 में फतुहा सीट पर राजद का दबदबा जारी रहेगा?

सारांश

क्या बिहार चुनाव 2025 में फतुहा सीट पर राजद का दबदबा बना रहेगा? जातिगत समीकरण और राजनीतिक जटिलताएँ इस सीट की पहचान हैं। जानिए पिछली चुनावों के आंकड़े और आगामी चुनाव की रणनीतियाँ।

Key Takeaways

  • फतुहा सीट में जातिगत समीकरण महत्वपूर्ण हैं।
  • रामानंद यादव ने लगातार तीन बार जीत हासिल की है।
  • 2020 में उन्होंने भाजपा के सत्येंद्र सिंह को हराया।
  • इस बार उनका मुकाबला रूपा कुमारी से है।
  • फतुहा का नाम पारंपरिक उद्योग से जुड़ा है।

पटना, 25 अक्टूबर (राष्ट्र प्रेस)। पटना साहिब लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत आने वाली फतुहा विधानसभा सीट 1957 में अपनी स्थापना के बाद से 18 बार चुनावी प्रक्रिया का गवाह बन चुकी है। हाल के वर्षों में इसकी पहचान एक ऐसी सीट के रूप में बनी है, जहां जातीय गोलबंदी और सामाजिक समीकरण ही चुनावी परिणामों को प्रभावित करते हैं। यहां की राजनीति पूरी तरह से जातिगत फैक्टर पर निर्भर करती है।

फतुहा विधानसभा क्षेत्र अपनी सांस्कृतिक विरासत, औद्योगिक पहचान और सबसे महत्वपूर्ण, जटिल राजनीतिक स्थिति के लिए जाना जाता है।

यहां के मतदाताओं का समीकरण बेहद रोचक है। फतुहा एक सामान्य सीट है, लेकिन 2020 के आंकड़ों के अनुसार, कुल 2,71,238 मतदाताओं में अनुसूचित जाति के मतदाताओं की हिस्सेदारी लगभग 18.59 प्रतिशत है। मुस्लिम मतदाताओं की संख्या 2020 में मात्र 1.4 प्रतिशत थी, जबकि शहरी मतदाता लगभग 13.4 प्रतिशत थे।

पिछले डेढ़ दशक से फतुहा की चुनावी कहानी डॉ. रामानंद यादव के इर्द-गिर्द घूमती रही है। राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के प्रमुख नेता रामानंद यादव ने इस सीट को राजद का एक प्रकार से अभेद्य किला बना दिया है। वह लगातार तीन बार जीत हासिल कर चुके हैं और अब चौथी बार जीत का दावा कर रहे हैं।

फतुहा में मुकाबला हमेशा कड़ा रहा है, लेकिन जीत का सेहरा पिछले तीन बार से लगातार रामानंद यादव के सिर बंधा है।

2020 के चुनाव में रामानंद यादव ने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के उम्मीदवार सत्येंद्र सिंह को 19,370 वोटों के बड़े अंतर से हराकर सीट बरकरार रखी।

2015 के चुनाव में उनका मुकाबला लोक जनशक्ति पार्टी के उम्मीदवार सत्येंद्र कुमार सिंह से हुआ था, जिसमें यादव ने 30,402 वोटों के विशाल अंतर से जीत प्राप्त की थी।

2010 विधानसभा चुनाव वह वर्ष था जब रामानंद यादव ने पहली बार विधानसभा में प्रवेश किया था और तब से उनका विजय रथ थमा नहीं है।

2010 के बाद से भाजपा नीत एनडीए गठबंधन इस सीट पर अपनी पकड़ वापस नहीं बना सका है। सत्येंद्र कुमार सिंह, जिन्होंने 2015 में लोजपा और 2020 में भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ा, दोनों बार हार गए।

इस बार के चुनाव में राजद प्रत्याशी रामानंद का मुकाबला लोकजनशक्ति पार्टी (रामविलास) की उम्मीदवार रूपा कुमारी से होने वाला है।

फतुहा की मिट्टी में कई धर्मों की आस्था घुली हुई है। हिंदू धर्म में इसे वह पुण्य भूमि माना जाता है, जहां से मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम ने अपने भाइयों के साथ मिथिला यात्रा के दौरान गंगा पार की थी। कहा जाता है कि भगवान कृष्ण भी भीम के साथ राजगीर जाते समय यहीं से गुजरे थे। बौद्ध, जैन, सिख और मुस्लिम, सभी धर्मों के अनुयायियों के लिए यह समान रूप से पूज्यनीय स्थल है। संत कबीर की स्मृति में यहां एक विशाल मठ स्थापित है, वहीं मध्यकाल से ही यहां सूफी संतों का प्रभाव रहा है, जिसकी गवाही कच्ची दरगाह देती है।

फतुहा का नामकरण भी इसके व्यापारिक इतिहास से जुड़ा है। 'फतुहा' या 'फतुहां' नाम पारंपरिक वस्त्र निर्माण में निपुण 'पटवा' जाति से आया है, जिसने सदियों तक इस क्षेत्र को कुटीर उद्योगों का केंद्र बनाए रखा। आज भले ही समय बदल गया हो, लेकिन यहां स्थापित ट्रैक्टर निर्माण इकाई और एलपीजी बॉटलिंग प्लांट जैसी आधुनिक इकाइयां बिहार के औद्योगिक पुनरुद्धार की नई उम्मीद जगा रही हैं।

Point of View

यह चुनाव परिणाम न केवल स्थानीय बल्कि राष्ट्रीय राजनीति को भी प्रभावित कर सकते हैं।
NationPress
03/01/2026

Frequently Asked Questions

फतुहा विधानसभा सीट कब स्थापित हुई थी?
फतुहा विधानसभा सीट की स्थापना 1957 में हुई थी।
पिछले तीन चुनावों में जीतने वाले नेता कौन हैं?
पिछले तीन चुनावों में राजद के डॉ. रामानंद यादव ने जीत हासिल की है।
फतुहा में जाति का क्या प्रभाव है?
फतुहा की राजनीति पूरी तरह से जातिगत फैक्टर पर निर्भर करती है, जहां जातीय गोलबंदी और सामाजिक समीकरण चुनाव परिणामों को प्रभावित करते हैं।
इस बार फतुहा में कौन से उम्मीदवार हैं?
इस बार के चुनाव में राजद प्रत्याशी रामानंद का मुकाबला लोकजनशक्ति पार्टी की उम्मीदवार रूपा कुमारी से होगा।
फतुहा का नामकरण किससे जुड़ा है?
फतुहा का नामकरण 'पटवा' जाति से जुड़ा है, जो पारंपरिक वस्त्र निर्माण में निपुण है।
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