मध्य प्रदेश में 46°C तापमान के बीच गहरा जल संकट, कांग्रेस-भाजपा में सियासी घमासान
सारांश
मुख्य बातें
मध्य प्रदेश के दर्जनों जिलों में 42 से 46 डिग्री सेल्सियस तक पहुँचे तापमान ने पेयजल संकट को विकराल रूप दे दिया है। 30 मई 2026 तक की स्थिति में शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में जलापूर्ति बुरी तरह प्रभावित है, और यह संकट अब भारतीय जनता पार्टी (BJP) तथा भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (कांग्रेस) के बीच तीखी राजनीतिक लड़ाई का केंद्र बन चुका है।
ज़मीनी हालात: कुएँ सूखे, टैंकर महँगे
उमरिया जिले में कुएँ और हैंडपंप सूख चुके हैं। सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में बच्चे रोज़ाना कई किलोमीटर पैदल चलकर पानी भरते दिख रहे हैं। गुना जिले के टांडा गाँव में ग्रामीणों को गड्ढे खोदकर कीचड़युक्त पानी इकट्ठा करते देखा गया है — जहाँ इंसान और पशु एक ही जल स्रोत पर निर्भर हैं।
राजधानी भोपाल — जिसे 'झीलों का शहर' कहा जाता है — में भी बोरवेल सूखने लगे हैं। स्थानीय निवासियों के अनुसार, कुछ इलाकों में नर्मदा जलापूर्ति घटकर प्रतिदिन केवल 12 से 15 मिनट रह गई है। निजी पानी के टैंकर पर निर्भरता बढ़ने से 5,000 लीटर टैंकर की कीमत ₹350 से बढ़कर ₹450–500 तक पहुँच गई है।
कांग्रेस का हमला: हज़ारों करोड़ खर्च, फिर भी पानी नहीं
विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने शनिवार को आरोप लगाया कि 2024–26 के दौरान जल जीवन मिशन के तहत करीब ₹25,000 करोड़ और ग्रामीण नल-जल योजना के तहत ₹490 करोड़ खर्च किए गए, लेकिन आम जनता को इसका लाभ नहीं मिला।
उन्होंने कहा, 'मध्य प्रदेश के लोग आज पानी जैसी बुनियादी जरूरत के लिए तरस रहे हैं। आदिवासी महिलाओं को कई किलोमीटर पैदल चलकर पानी लाना पड़ रहा है। बच्चे दूषित पानी पीने को मजबूर हैं और गाँवों में संकट लगातार बढ़ रहा है।'
इससे पहले इस सप्ताह मध्य प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने इंदौर में विरोध प्रदर्शन किया। उन्होंने दावा किया कि इंदौर के 29 वार्डों से लिए गए 240 पानी के नमूनों में से लगभग 98 प्रतिशत में हानिकारक बैक्टीरिया पाए गए। यह दावा कांग्रेस का है और इसकी स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है।
भाजपा का पलटवार
भाजपा ने इन आरोपों को सिरे से खारिज किया है। इंदौर के महापौर पुष्यमित्र भार्गव ने नगर निगम प्रशासन का बचाव करते हुए कहा कि कांग्रेस कार्यकर्ता अनावश्यक विवाद पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं। राज्य सरकार ने पाइपलाइन विस्तार, जल संरक्षण और जल स्रोतों के सुदृढ़ीकरण से जुड़ी परियोजनाओं को गिनाया है।
गौरतलब है कि यह ऐसे समय में आया है जब राज्य में अगले वर्ष नगरीय निकाय चुनाव होने हैं, जिससे इस मुद्दे का राजनीतिक तापमान और अधिक बढ़ गया है।
आम जनता पर असर
भूजल स्तर में भारी गिरावट के कारण ग्रामीण इलाकों में पशुपालकों पर दोहरी मार पड़ रही है — पीने के पानी के साथ-साथ पशुओं के लिए भी जल उपलब्धता गंभीर रूप से घटी है। शहरों में निम्न-आय वर्ग के लोग टैंकर की बढ़ी कीमतों का बोझ उठाने में असमर्थ हैं।
आगे क्या
जल संकट और राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का यह सिलसिला तब तक थमने की संभावना नहीं है जब तक मानसून राहत नहीं देता। नगरीय निकाय चुनावों के मद्देनज़र दोनों दल इस मुद्दे को चुनावी हथियार के रूप में भुनाने की कोशिश में हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि दीर्घकालिक समाधान के लिए जल संरक्षण और भूजल पुनर्भरण में ठोस निवेश ज़रूरी है।