15 जुलाई 2026
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मध्य प्रदेश में 46°C तापमान के बीच गहरा जल संकट, कांग्रेस-भाजपा में सियासी घमासान

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मध्य प्रदेश में 46°C तापमान के बीच गहरा जल संकट, कांग्रेस-भाजपा में सियासी घमासान

सारांश

46°C की तपती गर्मी में मध्य प्रदेश के गाँवों में बच्चे मीलों पैदल चल रहे हैं और गुना में लोग गड्ढों का कीचड़युक्त पानी पी रहे हैं — यह सिर्फ मौसम का संकट नहीं, ₹25,000 करोड़ की जल योजनाओं की विफलता का सवाल है जो नगरीय निकाय चुनावों से पहले सियासी बम बन चुका है।

मुख्य बातें

मध्य प्रदेश के कई जिलों में तापमान 42 से 46 डिग्री सेल्सियस के बीच, पेयजल संकट विकराल।
नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार का आरोप — 2024–26 में जल जीवन मिशन पर ₹25,000 करोड़ और नल-जल योजना पर ₹490 करोड़ खर्च, फिर भी राहत नहीं।
गुना जिले के टांडा गाँव में लोग गड्ढे खोदकर कीचड़युक्त पानी इकट्ठा करने को मजबूर।
भोपाल के कुछ इलाकों में जलापूर्ति घटकर प्रतिदिन केवल 12–15 मिनट ; टैंकर की कीमत ₹350 से बढ़कर ₹500 तक।
कांग्रेस के दावे के अनुसार इंदौर के 240 पानी के नमूनों में से 98% में हानिकारक बैक्टीरिया — भाजपा ने आरोप खारिज किए।
नगरीय निकाय चुनावों से पहले जल संकट प्रदेश की राजनीति का केंद्रीय मुद्दा बनता जा रहा है।

मध्य प्रदेश के दर्जनों जिलों में 42 से 46 डिग्री सेल्सियस तक पहुँचे तापमान ने पेयजल संकट को विकराल रूप दे दिया है। 30 मई 2026 तक की स्थिति में शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में जलापूर्ति बुरी तरह प्रभावित है, और यह संकट अब भारतीय जनता पार्टी (BJP) तथा भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (कांग्रेस) के बीच तीखी राजनीतिक लड़ाई का केंद्र बन चुका है।

ज़मीनी हालात: कुएँ सूखे, टैंकर महँगे

उमरिया जिले में कुएँ और हैंडपंप सूख चुके हैं। सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में बच्चे रोज़ाना कई किलोमीटर पैदल चलकर पानी भरते दिख रहे हैं। गुना जिले के टांडा गाँव में ग्रामीणों को गड्ढे खोदकर कीचड़युक्त पानी इकट्ठा करते देखा गया है — जहाँ इंसान और पशु एक ही जल स्रोत पर निर्भर हैं।

राजधानी भोपाल — जिसे 'झीलों का शहर' कहा जाता है — में भी बोरवेल सूखने लगे हैं। स्थानीय निवासियों के अनुसार, कुछ इलाकों में नर्मदा जलापूर्ति घटकर प्रतिदिन केवल 12 से 15 मिनट रह गई है। निजी पानी के टैंकर पर निर्भरता बढ़ने से 5,000 लीटर टैंकर की कीमत ₹350 से बढ़कर ₹450–500 तक पहुँच गई है।

कांग्रेस का हमला: हज़ारों करोड़ खर्च, फिर भी पानी नहीं

विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने शनिवार को आरोप लगाया कि 2024–26 के दौरान जल जीवन मिशन के तहत करीब ₹25,000 करोड़ और ग्रामीण नल-जल योजना के तहत ₹490 करोड़ खर्च किए गए, लेकिन आम जनता को इसका लाभ नहीं मिला।

उन्होंने कहा, 'मध्य प्रदेश के लोग आज पानी जैसी बुनियादी जरूरत के लिए तरस रहे हैं। आदिवासी महिलाओं को कई किलोमीटर पैदल चलकर पानी लाना पड़ रहा है। बच्चे दूषित पानी पीने को मजबूर हैं और गाँवों में संकट लगातार बढ़ रहा है।'

इससे पहले इस सप्ताह मध्य प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने इंदौर में विरोध प्रदर्शन किया। उन्होंने दावा किया कि इंदौर के 29 वार्डों से लिए गए 240 पानी के नमूनों में से लगभग 98 प्रतिशत में हानिकारक बैक्टीरिया पाए गए। यह दावा कांग्रेस का है और इसकी स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है।

भाजपा का पलटवार

भाजपा ने इन आरोपों को सिरे से खारिज किया है। इंदौर के महापौर पुष्यमित्र भार्गव ने नगर निगम प्रशासन का बचाव करते हुए कहा कि कांग्रेस कार्यकर्ता अनावश्यक विवाद पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं। राज्य सरकार ने पाइपलाइन विस्तार, जल संरक्षण और जल स्रोतों के सुदृढ़ीकरण से जुड़ी परियोजनाओं को गिनाया है।

गौरतलब है कि यह ऐसे समय में आया है जब राज्य में अगले वर्ष नगरीय निकाय चुनाव होने हैं, जिससे इस मुद्दे का राजनीतिक तापमान और अधिक बढ़ गया है।

आम जनता पर असर

भूजल स्तर में भारी गिरावट के कारण ग्रामीण इलाकों में पशुपालकों पर दोहरी मार पड़ रही है — पीने के पानी के साथ-साथ पशुओं के लिए भी जल उपलब्धता गंभीर रूप से घटी है। शहरों में निम्न-आय वर्ग के लोग टैंकर की बढ़ी कीमतों का बोझ उठाने में असमर्थ हैं।

आगे क्या

जल संकट और राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का यह सिलसिला तब तक थमने की संभावना नहीं है जब तक मानसून राहत नहीं देता। नगरीय निकाय चुनावों के मद्देनज़र दोनों दल इस मुद्दे को चुनावी हथियार के रूप में भुनाने की कोशिश में हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि दीर्घकालिक समाधान के लिए जल संरक्षण और भूजल पुनर्भरण में ठोस निवेश ज़रूरी है।

संपादकीय दृष्टिकोण

000 करोड़ की जल जीवन मिशन राशि और ज़मीन पर गड्ढों का कीचड़युक्त पानी — यह विरोधाभास मध्य प्रदेश की शासन-क्षमता पर गंभीर सवाल उठाता है। असली मुद्दा यह नहीं कि पैसा खर्च हुआ या नहीं, बल्कि यह है कि खर्च का सत्यापन किसने और कैसे किया। दोनों दलों की सियासी जंग में आदिवासी महिलाएँ और ग्रामीण बच्चे महज़ फोटो-ऑप बनकर रह जाते हैं — जबकि भूजल पुनर्भरण और पाइपलाइन रखरखाव जैसे दीर्घकालिक समाधान किसी के चुनावी भाषण में जगह नहीं पाते।
RashtraPress
15 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

मध्य प्रदेश में जल संकट कितना गंभीर है?
मध्य प्रदेश के दर्जनों जिलों में 42 से 46 डिग्री सेल्सियस तापमान के कारण भूजल स्तर तेज़ी से गिरा है और कुएँ व हैंडपंप सूख गए हैं। गुना जिले के टांडा गाँव में लोग गड्ढे खोदकर कीचड़युक्त पानी पी रहे हैं, जबकि भोपाल के कुछ इलाकों में नर्मदा जलापूर्ति प्रतिदिन केवल 12–15 मिनट रह गई है।
जल जीवन मिशन पर मध्य प्रदेश में कितना पैसा खर्च हुआ?
कांग्रेस नेता उमंग सिंघार के अनुसार 2024–26 के दौरान जल जीवन मिशन के तहत करीब ₹25,000 करोड़ और ग्रामीण नल-जल योजना के तहत ₹490 करोड़ खर्च किए गए। हालाँकि उनका आरोप है कि इन योजनाओं का लाभ आम जनता तक नहीं पहुँचा।
इंदौर के पानी की गुणवत्ता पर कांग्रेस ने क्या दावा किया?
मध्य प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने दावा किया कि इंदौर के 29 वार्डों से लिए गए 240 पानी के नमूनों में से लगभग 98 प्रतिशत में हानिकारक बैक्टीरिया पाए गए। भाजपा और इंदौर के महापौर पुष्यमित्र भार्गव ने इन आरोपों को खारिज करते हुए इसे राजनीतिक विवाद बताया है।
भोपाल में पानी के टैंकर की कीमत क्यों बढ़ी?
जल संकट गहराने के साथ निजी टैंकरों पर निर्भरता बढ़ गई है, जिससे 5,000 लीटर पानी के टैंकर की कीमत ₹350 से बढ़कर ₹450–500 तक पहुँच गई है। यह वृद्धि निम्न-आय वर्ग के परिवारों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ डाल रही है।
मध्य प्रदेश में जल संकट राजनीतिक मुद्दा क्यों बना?
राज्य में अगले वर्ष नगरीय निकाय चुनाव होने हैं, जिससे कांग्रेस और भाजपा दोनों इस मुद्दे को चुनावी हथियार बना रहे हैं। कांग्रेस सरकार की योजनाओं की विफलता का आरोप लगा रही है, जबकि भाजपा विकास कार्यों की सूची गिनाकर आरोपों को नकार रही है।
राष्ट्र प्रेस
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