क्या माघ मेले में प्रयाग की पंचकोसी परिक्रमा की शुरुआत हो गई है?
सारांश
Key Takeaways
- पंचकोसी परिक्रमा की शुरुआत माघ मेले में हुई है।
- यह परंपरा प्रयागराज की धार्मिक धरोहर का हिस्सा है।
- साधु-संतों के लिए अंतिम दिन भंडारे का आयोजन होगा।
- यह परिक्रमा पांच दिनों तक चलेगी।
- संगम पर गंगा पूजन के साथ इसकी शुरुआत हुई।
प्रयागराज, 5 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। माघ मेला में प्रयाग की पंचकोसी परिक्रमा की शुरुआत हो चुकी है, जो सनातन परंपरा, आस्था एवं सांस्कृतिक चेतना का प्रतीक है। यह परिक्रमा अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद और श्री पंच दशनाम जूना अखाड़ा के नेतृत्व में संगम में गंगा पूजन के साथ सोमवार को प्रारंभ हुई।
यह पंचकोसी परिक्रमा अगले पांच दिनों तक चलेगी, जिसमें अंतिम दिन साधु-संतों के लिए भंडारे का आयोजन किया जाएगा। माघ मेला प्रशासन को इस परिक्रमा के आयोजन में यातायात व्यवस्था का ध्यान रखने की जिम्मेदारी सौंपी गई है। गंगा पूजन के बाद साधु-संतों का समूह अक्षयवट और आदि शंकर विमान मंडपम मंदिर भी गया। पहले दिन की परिक्रमा का समापन इसी के साथ हुआ।
पंचकोसी परिक्रमा प्रयाग की प्राचीन धार्मिक परंपरा है। अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के महामंत्री महंत हरि गिरि के अनुसार, इस परिक्रमा की परंपरा प्रयागराज के क्षेत्रीय विस्तार से जुड़ी हुई है, जिसके अनुसार प्रयाग मंडल पाँच योजन और बीस कोस में फैला हुआ है। यहाँ गंगा, यमुना और सरस्वती के 6 तट हैं, जिन्हें मिलाकर तीन अन्तर्वेदियां बनाई गई हैं - अंतर्वेदी, मध्य वेदी और बहिर्वेदी। इन तीनों वेदियों में कई तीर्थ, उप तीर्थ और आश्रम हैं, जिनकी परिक्रमा को पंचकोसी परिक्रमा में शामिल किया गया है। प्रयाग आने वाले सभी तीर्थ यात्रियों को इसकी परिक्रमा अवश्य करनी चाहिए, क्योंकि इससे सभी देवताओं, आश्रमों, मंदिरों, मठों और जलकुंडों के दर्शन से अक्षय पुण्य फल की प्राप्ति होती है।
दिव्य और भव्य माघ मेले के आयोजन में कई परंपराएं शामिल हैं, जिनमें कल्पवास और पंचकोशी परिक्रमा भी हैं। परिक्रमा में शामिल हुए अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत रविंद्र पुरी ने बताया कि यह पंचकोसी परंपरा 556 वर्ष पहले माघ मेले का अभिन्न हिस्सा थी, जिसे मुगल शासक अकबर ने रोक दिया था। कई वर्षों बाद साधु-संतों की मांग पर योगी सरकार की कोशिशों से पंचकोसी परिक्रमा की शुरुआत 2019 में हुई और अब यह परंपरा निरंतर जारी है।