क्या मकर संक्रांति पर इस सूर्य कुंड में स्नान से सारे पाप मिट जाते हैं? जानिए बिहार के देव सूर्य मंदिर के बारे में
सारांश
Key Takeaways
- मकर संक्रांति का त्योहार 14 जनवरी को मनाया जाता है।
- बिहार का देव सूर्य मंदिर भक्तों के लिए एक महत्वपूर्ण स्थान है।
- मंदिर का कुंड औषधीय गुणों से भरपूर माना जाता है।
- यहाँ हर साल लाखों भक्त दर्शन करने आते हैं।
- मार्तंड महोत्सव सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन किया जाता है।
नई दिल्ली, 8 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। 14 जनवरी को भारत के विभिन्न हिस्सों में भिन्न नामों और रीति-रिवाजों के साथ मनाया जाने वाला मकर संक्रांति का पर्व भगवान सूर्य से संबंधित है। इस दिन सूर्य धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करते हैं, जिसे गोचर उत्तरायण भी कहा जाता है।
सूर्य की स्थितियाँ करियर से लेकर स्वास्थ्य तक के विभिन्न पहलुओं पर प्रभाव डालती हैं। इस अवसर पर भक्त सूर्योदय के समय सूर्य देव की उपासना के लिए सूर्य मंदिरों में जाते हैं, लेकिन बिहार स्थित एक प्राचीन और विशाल सूर्य मंदिर खासतौर पर मकर संक्रांति के दिन बड़ी संख्या में भक्तों को आकर्षित करता है।
बिहार के औरंगाबाद जिले में स्थित देव सूर्य मंदिर मकर संक्रांति और छठ पूजा के दौरान भक्तों से भरा रहता है। यह मंदिर हिंदू भक्तों के लिए एक पवित्र स्थान है, जहाँ सूर्योदय और सूर्यास्त दोनों समय पर पूजा की जाती है।
मकर संक्रांति और छठ पूजा के दौरान यहाँ भीड़ की संख्या सबसे अधिक होती है। भक्त मंदिर के पवित्र कुंड में स्नान करते हैं और उगते सूर्य की उपासना करते हैं। स्थानीय मान्यता है कि मकर संक्रांति के दिन कुंड में स्नान करने से सभी कष्टों से मुक्ति मिलती है और भविष्य में सुख-शांति प्राप्त होती है।
मंदिर के परिसर में एक कुंड भी है, जिसमें पूरे साल पानी भरा रहता है। भक्त पहले इस कुंड में स्नान करते हैं और फिर मंदिर के गर्भगृह में जाकर सूर्य की उपासना करते हैं। कहा जाता है कि इस कुंड का पानी औषधीय गुणों से भरपूर होता है, जो स्नान करने से शारीरिक कष्टों और पापों से मुक्ति दिलाता है।
मकर संक्रांति के दिन यहाँ 'मार्तंड महोत्सव' जैसे सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं, जो पूरी तरह से सूर्य भगवान को समर्पित होते हैं। इस दौरान लोक कला, साहित्य और नृत्य का प्रदर्शन किया जाता है। भक्तों के लिए मेले का आयोजन भी होता है।
मंदिर का निर्माण त्रेतायुग में हुआ माना जाता है, जबकि एएसआई इसका निर्माण पांचवीं से छठी शताब्दी का बताते हैं, जिसमें गुप्तकालीन वास्तुकला के दर्शन होते हैं। हर साल मकर संक्रांति पर लाखों भक्त इस मंदिर में दर्शन के लिए आते हैं।