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माता अमृतानंदमयी: 9 वर्ष में छूटा स्कूल, 'हगिंग संत' बनीं करोड़ों की अम्मा

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माता अमृतानंदमयी: 9 वर्ष में छूटा स्कूल, 'हगिंग संत' बनीं करोड़ों की अम्मा

सारांश

मछुआरे परिवार में जन्मी सुधामणि इदमन्नेल ने 9 वर्ष में स्कूल छोड़ा, सामाजिक वर्जनाओं को तोड़कर सबको गले लगाया और 'अम्मा' बन गईं। आज उनका मठ 1 लाख घर, सुनामी राहत और 20 से अधिक भाषाओं में भजनों के साथ वैश्विक करुणा का प्रतीक है।

मुख्य बातें

माता अमृतानंदमयी देवी का जन्म 27 सितंबर 1953 को केरल के अलप्पढ़ गाँव में एक मछुआरे परिवार में हुआ।
माँ की बीमारी के कारण 9 वर्ष की आयु में स्कूल छोड़ना पड़ा; 7 भाई-बहनों की देखभाल की ज़िम्मेदारी सँभाली।
1981 में माता अमृतानंदमयी मठ की स्थापना हुई; 1987 से वैश्विक कार्यक्रमों का आयोजन।
मठ के धर्मार्थ कार्यों में बेघरों के लिए 1 लाख घर , 3 अनाथालय और 2004 सुनामी राहत-पुनर्वास शामिल।
उनके भजनों की 100 से अधिक रिकॉर्डिंग 20 से अधिक भाषाओं में उपलब्ध; शिक्षाओं पर लगभग एक दर्जन पुस्तकें प्रकाशित।

आध्यात्मिक गुरु और मानवतावादी नेता माता अमृतानंदमयी देवी — जिन्हें विश्वभर में 'अम्मा' के नाम से जाना जाता है — का जन्म 27 सितंबर 1953 को केरल के छोटे से तटीय गाँव अलप्पढ़ में एक मछुआरे परिवार में हुआ था। बचपन का नाम सुधामणि इदमन्नेल रखने वाली इस बालिका ने सेवा, करुणा और प्रेम के बल पर 'हगिंग संत' की विशिष्ट पहचान अर्जित की और आज उनका संगठन, माता अमृतानंदमयी मठ, शिक्षा, स्वास्थ्य और आपदा राहत के क्षेत्र में विश्वस्तर पर सेवारत है।

बचपन का संघर्ष और स्कूल से विदाई

जब अम्मा मात्र नौ वर्ष की थीं, तब उनकी माँ गंभीर रूप से बीमार पड़ गईं। परिवार की जिम्मेदारियाँ कंधों पर आने के कारण उन्हें स्कूल छोड़ना पड़ा। अपने सात भाई-बहनों की देखभाल और घरेलू काम के साथ-साथ वे पड़ोसियों के घरों से परिवार की गायों के लिए बचा-खुचा अनाज इकट्ठा करने जाती थीं। इसी दौरान उन्हें समाज में व्याप्त गहरी गरीबी और पीड़ा का प्रत्यक्ष अनुभव हुआ, जिसने उनके भीतर करुणा का अटूट स्रोत जगाया।

सेवा का अनूठा मार्ग और 'अम्मा' की पहचान

जहाँ भी अम्मा को जरूरतमंद मिलते, वे अपने घर से भोजन और वस्त्र देने से नहीं चूकती थीं। परिवार की डाँट और दंड भी उन्हें इस राह से नहीं डिगा सके। वे स्वाभाविक रूप से दुखी लोगों को गले लगाकर सांत्वना देने लगीं। उस दौर में जब एक 14 वर्षीय कन्या को किसी पुरुष को भी स्पर्श करने की अनुमति नहीं थी, अम्मा ने सामाजिक वर्जनाओं की परवाह किए बिना यह सिलसिला जारी रखा। धीरे-धीरे लोग उन्हें प्रेमपूर्वक 'अम्मा' (माँ) कहने लगे।

अम्मा के शब्दों में: 'मैं यह नहीं देखती कि वह स्त्री है या पुरुष। मैं किसी को भी स्वयं से भिन्न रूप में नहीं देखती। मुझसे संसार की सभी रचनाओं की ओर एक निरंतर प्रेम धारा बहती है। एक चिकित्सक का कर्तव्य रोगियों का उपचार करना है — उसी प्रकार मेरा कर्तव्य उन लोगों को सांत्वना देना है जो कष्ट में हैं।'

माता अमृतानंदमयी मठ की स्थापना

माता-पिता के विवाह कराने के अनेक प्रयासों के बावजूद अम्मा ने गृहस्थ जीवन अस्वीकार कर दिया। 1981 में जब केरल के पर्यकडवु में बड़ी संख्या में जिज्ञासु उनके पास आकर शिष्यत्व ग्रहण करने लगे, तब माता अमृतानंदमयी मठ की औपचारिक स्थापना हुई। यह संगठन आज अनेक आध्यात्मिक और धर्मार्थ गतिविधियों में संलग्न है। 1987 से श्रद्धालुओं के अनुरोध पर अम्मा विश्व के विभिन्न देशों में धार्मिक कार्यक्रम आयोजित करती हैं।

विश्वव्यापी मानवीय सेवा

माता अमृतानंदमयी मठ के धर्मार्थ मिशन का विस्तार उल्लेखनीय है। इसमें बेघर लोगों के लिए 1 लाख घर, 3 अनाथालय, 2004 की सुनामी सहित अनेक आपदाओं में राहत एवं पुनर्वास कार्य, निःशुल्क चिकित्सा सेवाएँ, विधवाओं और दिव्यांगों के लिए पेंशन, पर्यावरण संरक्षण समूह, झुग्गी-नवीनीकरण, वृद्धों के लिए देखभाल केंद्र और गरीबों को मुफ्त वस्त्र एवं भोजन वितरण शामिल हैं।

भक्ति संगीत और साहित्यिक योगदान

अम्मा अपने भक्ति संगीत के लिए भी विख्यात हैं। उनके द्वारा गाए गए भजनों की 100 से अधिक रिकॉर्डिंग 20 से भी अधिक भाषाओं में उपलब्ध हैं। उनके शिष्यों ने भक्तों के साथ उनके संवादों को लिपिबद्ध कर उनकी शिक्षाओं पर लगभग एक दर्जन पुस्तकों का प्रकाशन किया है। यह साहित्यिक विरासत उनकी आध्यात्मिक शिक्षाओं को भावी पीढ़ियों तक पहुँचाने का माध्यम बनी हुई है।

आने वाले समय में माता अमृतानंदमयी मठ की सेवा गतिविधियाँ और विस्तृत होने की संभावना है, क्योंकि अम्मा के वैश्विक अनुयायियों की संख्या निरंतर बढ़ रही है।

संपादकीय दृष्टिकोण

उन्होंने आलिंगन को सेवा का साधन बनाया — और इसके लिए किसी राजकीय स्वीकृति की प्रतीक्षा नहीं की। उनके मठ का 1 लाख घर निर्माण और सुनामी राहत कार्य यह भी दर्शाता है कि आध्यात्मिक नेतृत्व केवल प्रवचन तक सीमित नहीं, बल्कि जमीनी हस्तक्षेप में भी उतना ही प्रभावशाली हो सकता है।
RashtraPress
26 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

माता अमृतानंदमयी देवी कौन हैं?
माता अमृतानंदमयी देवी एक आध्यात्मिक गुरु और मानवतावादी नेता हैं जिन्हें विश्वभर में 'अम्मा' और 'हगिंग संत' कहा जाता है। उनका जन्म 27 सितंबर 1953 को केरल के अलप्पढ़ गाँव में सुधामणि इदमन्नेल के रूप में हुआ था।
अम्मा ने 9 साल में स्कूल क्यों छोड़ा?
जब अम्मा नौ वर्ष की थीं, तब उनकी माँ गंभीर बीमारी की चपेट में आ गईं। परिवार की देखभाल और सात भाई-बहनों की जिम्मेदारी के चलते उन्हें स्कूल से हटा लिया गया।
माता अमृतानंदमयी मठ की स्थापना कब हुई?
माता अमृतानंदमयी मठ की स्थापना 1981 में हुई, जब केरल के पर्यकडवु में बड़ी संख्या में जिज्ञासु अम्मा के शिष्य बनने के लिए आने लगे। 1987 से अम्मा विश्व के विभिन्न देशों में कार्यक्रम आयोजित करती हैं।
माता अमृतानंदमयी मठ कौन-कौन से सेवा कार्य करता है?
मठ के सेवा कार्यों में बेघरों के लिए 1 लाख घर, 3 अनाथालय, 2004 सुनामी राहत-पुनर्वास, निःशुल्क चिकित्सा सेवाएँ, विधवाओं व दिव्यांगों के लिए पेंशन, वृद्धों की देखभाल और गरीबों को मुफ्त वस्त्र-भोजन वितरण शामिल हैं।
अम्मा को 'हगिंग संत' क्यों कहा जाता है?
अम्मा सभी दर्शनार्थियों को गले लगाकर सांत्वना और आशीर्वाद देती हैं, चाहे भीड़ हजारों की हो या लाखों की। वे सभी को दर्शन देने के बाद ही पीठम से उठती हैं, इसलिए उन्हें 'हगिंग संत' की उपाधि मिली।
राष्ट्र प्रेस
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