8 अगस्त 2026
LIVE
Get it on Google Play Download on the App Store

लीला सैमसन: 9 साल की उम्र में भरतनाट्यम को चुना, कलाक्षेत्र से शुरू हुई ऐतिहासिक यात्रा

शेयर करें:
ऑडियो वॉइस लोड हो रही है…
लीला सैमसन: 9 साल की उम्र में भरतनाट्यम को चुना, कलाक्षेत्र से शुरू हुई ऐतिहासिक यात्रा

सारांश

लीला सैमसन का जीवन एक सामान्य बचपन के फैसले की असाधारण कहानी है। 9 साल की उम्र में कलाक्षेत्र में प्रवेश से लेकर पद्मश्री तक, उन्होंने भरतनाट्यम को न केवल जीवित रखा, बल्कि इसे वैश्विक मंच पर प्रतिष्ठित किया। विवादों के बावजूद, वह भारतीय नृत्य के सबसे प्रभावशाली संरक्षकों में से एक बनीं।

मुख्य बातें

लीला सैमसन का जन्म 6 मई 1951 को कूनूर, तमिलनाडु में हुआ।
मात्र 9 वर्ष की आयु में चेन्नई के कलाक्षेत्र में भरतनाट्यम की शिक्षा शुरू की।
1995 में 'स्पंदा' नृत्य समूह की स्थापना की और नई पीढ़ी को भरतनाट्यम से जोड़ा।
2005-2012 तक कलाक्षेत्र की निदेशक और संगीत नाटक अकादमी की अध्यक्ष रहीं।
पद्मश्री सहित अनेक राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय सम्मान प्राप्त किए।

मुंबई, 5 मई 2026 — भारतीय शास्त्रीय नृत्य के इतिहास में लीला सैमसन का नाम उन विरल कलाकारों में शामिल है जिन्होंने भरतनाट्यम को केवल एक कला-रूप नहीं, बल्कि अपने जीवन की नींव बना दिया। 6 मई 1951 को तमिलनाडु के कूनूर में जन्मी सैमसन ने मात्र 9 वर्ष की आयु में चेन्नई के कलाक्षेत्र में प्रवेश लिया, जहाँ उन्होंने महान गुरु रुक्मिणी देवी अरुंडेल से शिक्षा ग्रहण की। यह बचपन का निर्णय आगे चलकर न केवल उनकी व्यक्तिगत पहचान बन गया, बल्कि भारतीय नृत्य को वैश्विक मंच पर प्रतिष्ठित करने का माध्यम भी बना।

परिवार का कला-अनुकूल वातावरण

लीला सैमसन के पिता बेंजामिन अब्राहम सैमसन भारतीय नौसेना में अधिकारी थे, जबकि उनकी माता लैला कला और संगीत के प्रति गहरे अनुराग रखती थीं। यह सांस्कृतिक परिवेश ही था जिसने बचपन से ही लीला को नृत्य की ओर प्रवृत्त किया। उनकी माता ने न केवल उन्हें प्रेरित किया, बल्कि इस कला-मार्ग पर अग्रसर होने के लिए सक्रिय रूप से समर्थन भी प्रदान किया। गौरतलब है कि 1960 के दशक में एक लड़की को भरतनाट्यम में पूर्णकालिक करियर के लिए प्रोत्साहित करना एक साहसिक और असामान्य कदम था।

कलाक्षेत्र में प्रशिक्षण और दीक्षा

जब लीला सैमसन 9 वर्ष की थीं, तब उनके पिता ने उन्हें चेन्नई के कलाक्षेत्र में भेजा, जो भारतीय शास्त्रीय कला का एक प्रमुख केंद्र है। यहाँ उन्होंने रुक्मिणी देवी अरुंडेल के मार्गदर्शन में भरतनाट्यम की कठोर साधना की। इस दौरान उन्होंने न केवल नृत्य के तकनीकी पहलुओं को आत्मसात किया, बल्कि इस कला-रूप के दार्शनिक और सांस्कृतिक आयामों को भी समझा। अपनी पढ़ाई के साथ-साथ उन्होंने नृत्य की साधना को निरंतर जारी रखा, जिससे वह अपनी किशोरावस्था तक ही एक प्रतिभाशाली नृत्यांगना के रूप में उभरने लगीं।

शिक्षक के रूप में योगदान

अपने करियर के प्रारंभिक दशकों में, लीला सैमसन ने दिल्ली के श्रीराम भारतीय कला केंद्र और गंधर्व महाविद्यालय में भरतनाट्यम की शिक्षा प्रदान की। वह केवल एक प्रदर्शनकारी नृत्यांगना नहीं रहीं, बल्कि एक समर्पित शिक्षक भी बनीं जिन्होंने सैकड़ों छात्रों को इस कला-रूप में प्रशिक्षित किया। उनके शिष्यों में से कई आगे चलकर स्वयं प्रतिष्ठित कलाकार बने और भारतीय नृत्य को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

अंतर्राष्ट्रीय मंच पर भारतीय नृत्य

लीला सैमसन ने न केवल भारत में, बल्कि यूरोप, अफ्रीका और अमेरिका जैसे महाद्वीपों में भी अपनी कला का प्रदर्शन किया। इन अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर उनकी प्रस्तुतियों ने पश्चिमी दर्शकों को भारतीय शास्त्रीय नृत्य की गहराई और सौंदर्य से परिचित कराया। उनके प्रदर्शन भारतीय संस्कृति के सांस्कृतिक राजदूत के रूप में कार्य करते रहे, जिससे भरतनाट्यम को वैश्विक पहचान मिली।

स्पंदा की स्थापना और नवाचार

1995 में, लीला सैमसन ने 'स्पंदा' नाम के एक नृत्य समूह की स्थापना की, जिसका उद्देश्य भरतनाट्यम को समकालीन दृष्टिकोण से प्रस्तुत करना था। इस संगठन के माध्यम से उन्होंने न केवल परंपरागत नृत्य को संरक्षित रखा, बल्कि आधुनिक विषयों और तकनीकों के साथ इसे जोड़ने का प्रयास भी किया। यह दृष्टिकोण नई पीढ़ी को भरतनाट्यम से जुड़ने के लिए प्रेरित करता रहा।

प्रशासनिक और संस्थागत भूमिकाएँ

अपनी कलात्मक प्रतिभा के अलावा, लीला सैमसन ने संस्कृति और कला के क्षेत्र में महत्वपूर्ण प्रशासनिक दायित्व भी संभाले। वह 2005 से 2012 तक कलाक्षेत्र की निदेशक रहीं, जहाँ उन्होंने संस्था को आधुनिकीकरण के साथ-साथ परंपरा को संरक्षित रखने का संतुलन बनाया। इसके अतिरिक्त, वह संगीत नाटक अकादमी की अध्यक्ष और केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (CBFC) की प्रमुख भी रहीं। इन पदों पर उनके कार्यकाल में कला और संस्कृति के क्षेत्र में अनेक महत्वपूर्ण और विवादास्पद निर्णय लिए गए।

पुरस्कार और सम्मान

लीला सैमसन के योगदान को भारत सरकार द्वारा मान्यता दी गई और उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया गया। इसके अलावा, उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार सहित अनेक राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय सम्मान प्राप्त हुए। ये सम्मान न केवल उनकी कलात्मक उत्कृष्टता, बल्कि भारतीय संस्कृति के संरक्षण और प्रचार में उनके अवदान की स्वीकृति थे।

विवाद और जटिल विरासत

अपनी उल्लेखनीय उपलब्धियों के बावजूद, लीला सैमसन के करियर में कुछ विवादास्पद क्षण भी आए। उनके कुछ प्रशासनिक निर्णयों और सांस्कृतिक नीतियों पर विभिन्न वर्गों से आलोचना हुई। हालांकि, इन विवादों के बावजूद, कला के क्षेत्र में एक समर्पित नृत्यांगना और शिक्षक के रूप में उनकी पहचान अटूट रही है। उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि कला के प्रति समर्पण और दीर्घकालीन प्रतिबद्धता कैसे एक व्यक्तिगत पथ को एक सांस्कृतिक आंदोलन में परिणत कर सकती है।

संपादकीय दृष्टिकोण

उन्होंने भरतनाट्यम को अंतर्राष्ट्रीय मंच पर प्रतिष्ठित किया; दूसरी ओर, उनके कुछ प्रशासनिक निर्णय विवादास्पद रहे। सवाल यह है कि क्या कलात्मक उत्कृष्टता और संस्थागत नेतृत्व में सदा सामंजस्य संभव है? उनकी विरासत न केवल नृत्य के क्षेत्र में, बल्कि इस बहस में भी महत्वपूर्ण है कि भारतीय कला को कैसे संरक्षित और आधुनिकीकृत किया जाए।
RashtraPress
8 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

लीला सैमसन ने भरतनाट्यम की शिक्षा कहाँ से ली?
लीला सैमसन ने 9 साल की उम्र में चेन्नई के कलाक्षेत्र में प्रवेश लिया, जहाँ उन्होंने महान गुरु रुक्मिणी देवी अरुंडेल से भरतनाट्यम सीखा। यह संस्थान भारतीय शास्त्रीय कला का एक प्रमुख केंद्र है।
स्पंदा नृत्य समूह की स्थापना क्यों की गई?
लीला सैमसन ने 1995 में स्पंदा की स्थापना की ताकि भरतनाट्यम को समकालीन दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया जा सके। इस समूह का उद्देश्य परंपरागत नृत्य को संरक्षित रखते हुए नई पीढ़ी को इस कला से जोड़ना था।
लीला सैमसन को कौन-से प्रमुख सम्मान मिले?
लीला सैमसन को पद्मश्री, संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार और अनेक अंतर्राष्ट्रीय सम्मान प्राप्त हुए। ये सम्मान उनकी कलात्मक उत्कृष्टता और भारतीय संस्कृति के संरक्षण में योगदान की स्वीकृति थे।
लीला सैमसन ने कलाक्षेत्र में क्या भूमिका निभाई?
लीला सैमसन 2005 से 2012 तक कलाक्षेत्र की निदेशक रहीं। इस अवधि में उन्होंने संस्था को आधुनिकीकरण के साथ-साथ परंपरा को संरक्षित रखने का संतुलन बनाया।
राष्ट्र प्रेस
सिलसिला

जुड़े बिंदु

इस ख़बर के पीछे की कड़ियाँ — सबसे नई पहले।

8 बिंदु
  1. नवीनतम 2 सप्ताह पहले
  2. 1 महीना पहले
  3. 2 महीने पहले
  4. 7 महीने पहले
  5. 7 महीने पहले
  6. 10 महीने पहले
  7. 10 महीने पहले
  8. 1 साल पहले