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मेट्रो मैन ई. श्रीधरन: 45 दिनों में पम्बन पुल से दिल्ली मेट्रो तक, अनुशासन से बदली भारत की परिवहन तस्वीर

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मेट्रो मैन ई. श्रीधरन: 45 दिनों में पम्बन पुल से दिल्ली मेट्रो तक, अनुशासन से बदली भारत की परिवहन तस्वीर

सारांश

45 दिनों में पम्बन पुल, 7 साल में 760 किमी कोंकण रेलवे, और दिल्ली मेट्रो को वैश्विक मानक पर खड़ा करने वाले ई. श्रीधरन सिर्फ इंजीनियर नहीं — भारत के बुनियादी ढाँचे की नींव में बसी एक कार्यसंस्कृति के निर्माता हैं।

मुख्य बातें

श्रीधरन का जन्म 12 जून 1932 को केरल के करुकापुथुर में हुआ; वे 'मेट्रो मैन' के नाम से विख्यात हैं।
1963 में पम्बन पुल का पुनर्निर्माण तीन महीने की समय सीमा के बजाय मात्र 45 दिनों में पूरा किया।
कोंकण रेलवे — 760 किमी लंबी, 150 से अधिक पुलों वाली परियोजना — सात वर्षों में पूरी की।
दिल्ली मेट्रो (DMRC) का नेतृत्व 1995 से 2012 तक किया; पहला चरण समय से पहले और बजट के भीतर पूरा।
भारत सरकार ने पद्म श्री (2001) और पद्म विभूषण (2008) से सम्मानित किया; टाइम ने 2003 में 'एशिया का हीरो' घोषित किया।
2015 में संयुक्त राष्ट्र के सतत परिवहन उच्चस्तरीय सलाहकार समूह (HLAG-ST) के सदस्य नियुक्त।

भारत के सुविख्यात सिविल इंजीनियर और 'मेट्रो मैन' के नाम से पहचाने जाने वाले ई. श्रीधरन उन विरले व्यक्तित्वों में से हैं, जिन्होंने केवल संरचनाएँ नहीं बनाईं, बल्कि पूरे राष्ट्र की गतिशीलता की दिशा तय की। अनुशासन, ईमानदारी और समयबद्धता को अपनी कार्यशैली का मूल मंत्र बनाकर उन्होंने भारत के सार्वजनिक परिवहन को वैश्विक पहचान दिलाई। 12 जून 1932 को केरल के करुकापुथुर में जन्मे एल्लाट्टुवलपिल श्रीधरन का जीवन इस बात का प्रमाण है कि दृढ़ संकल्प और स्पष्ट कार्यप्रणाली से असंभव लगने वाले लक्ष्य भी हासिल किए जा सकते हैं।

शिक्षा और प्रारंभिक जीवन

श्रीधरन की प्राथमिक शिक्षा पलक्कड़ जिले के पट्टांबी के निकट सरकारी लोअर प्राइमरी स्कूल, चथन्नूर में हुई। इसके बाद उन्होंने बेसल इवेंजेलिकल मिशन हायर सेकेंडरी स्कूल से उच्च माध्यमिक शिक्षा प्राप्त की और पालघर के विक्टोरिया कॉलेज में अध्ययन किया। सिविल इंजीनियरिंग की डिग्री उन्होंने काकीनाडा के सरकारी इंजीनियरिंग कॉलेज से हासिल की। शिक्षा के दौरान ही उनमें गुणवत्ता और समय-पालन के प्रति जो निष्ठा विकसित हुई, वह आगे चलकर उनकी सबसे बड़ी पहचान बनी।

पम्बन पुल: असाधारण क्षमता की पहली मिसाल

1963 में रामेश्वरम और तमिलनाडु को जोड़ने वाला पम्बन पुल टूट गया था। रेलवे ने पुनर्निर्माण के लिए पहले छह महीने का लक्ष्य रखा, जिसे बाद में घटाकर तीन महीने कर दिया गया। यह जिम्मेदारी श्रीधरन को सौंपी गई। उन्होंने इस चुनौती को स्वीकार किया और मात्र 45 दिनों में पुल का पुनर्निर्माण पूरा कर दिया — यह उपलब्धि उनकी असाधारण नेतृत्व क्षमता का पहला सार्वजनिक प्रमाण थी।

कोंकण रेलवे: पहाड़ों को चीरती इंजीनियरिंग

श्रीधरन की उल्लेखनीय उपलब्धियों में कोंकण रेलवे परियोजना का विशेष स्थान है। भारत के पश्चिमी तट के साथ 760 किलोमीटर लंबी इस रेलवे लाइन का निर्माण अत्यंत चुनौतीपूर्ण था — 150 से अधिक पुलों और जटिल भूभाग के बावजूद यह परियोजना महज सात वर्षों में पूरी की गई। गौरतलब है कि इस तरह की परियोजनाएँ सामान्यतः दशकों में पूरी होती हैं।

दिल्ली मेट्रो: एक सपने को वैश्विक सफलता में बदलना

1995 में दिल्ली मेट्रो रेल निगम (DMRC) के प्रबंध निदेशक के रूप में नियुक्त होने के बाद श्रीधरन ने राष्ट्रीय राजधानी के सार्वजनिक परिवहन को पूरी तरह बदल दिया। 1995 से 2012 तक के अपने कार्यकाल में उन्होंने पहले चरण का निर्माण निर्धारित समय से पहले और तय बजट के भीतर पूरा किया — भारतीय बुनियादी ढाँचा क्षेत्र में यह अपने आप में एक असाधारण उपलब्धि थी। दिल्ली मेट्रो की सफलता ने लखनऊ, कोच्चि, जयपुर और हैदराबाद जैसे शहरों को भी मेट्रो रेल नेटवर्क अपनाने के लिए प्रेरित किया। कोलकाता मेट्रो की योजना को आकार देने में भी उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा।

अंतरराष्ट्रीय सम्मान और विरासत

भारत सरकार ने श्रीधरन को 2001 में पद्म श्री और 2008 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया। फ्रांस सरकार ने 2005 में उन्हें प्रतिष्ठित शेवेलियर डे ला लेगियोन डी'होनूर प्रदान किया। टाइम पत्रिका ने 2003 में उन्हें 'एशिया का हीरो' और दुनिया के 100 सबसे प्रभावशाली लोगों में शामिल किया। 2013 में जापान ने उन्हें ऑर्डर ऑफ द राइजिंग सन — गोल्ड एंड सिल्वर स्टार से नवाजा। 2015 में संयुक्त राष्ट्र के तत्कालीन महासचिव बान की-मून ने उन्हें सतत परिवहन पर संयुक्त राष्ट्र के उच्चस्तरीय सलाहकार समूह (HLAG-ST) का सदस्य नियुक्त किया।

2011 में दिल्ली मेट्रो में उनके उत्तराधिकारी के रूप में मंगू सिंह की नियुक्ति हुई, लेकिन श्रीधरन द्वारा स्थापित कार्य-संस्कृति और मानक आज भी भारतीय बुनियादी ढाँचा परियोजनाओं के लिए एक जीवंत प्रेरणास्रोत बने हुए हैं। सेवानिवृत्ति के बाद भी वे राष्ट्रीय विकास से जुड़े मुद्दों पर सलाहकार की भूमिका में सक्रिय रहे।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि एक कार्यसंस्कृति की है जो भारत के सरकारी बुनियादी ढाँचे में अपवाद बनकर उभरी, नियम नहीं। यह विचारणीय है कि जिस समयबद्धता और बजट-अनुशासन के लिए वे जाने जाते हैं, वह उनके बाद की अधिकांश परियोजनाओं में दोहराई नहीं जा सकी। दिल्ली मेट्रो के विस्तार के बाद के चरणों में लागत और समय दोनों में उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई। असली प्रश्न यह है कि क्या भारत ने श्रीधरन से केवल उनकी परियोजनाओं को अपनाया, या उनकी कार्यप्रणाली को भी — और उत्तर अभी भी अधूरा है।
RashtraPress
27 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

ई. श्रीधरन को 'मेट्रो मैन' क्यों कहा जाता है?
ई. श्रीधरन को 'मेट्रो मैन' इसलिए कहा जाता है क्योंकि उन्होंने 1995 से 2012 तक दिल्ली मेट्रो रेल निगम (DMRC) का नेतृत्व करते हुए पहले चरण का निर्माण निर्धारित समय से पहले और बजट के भीतर पूरा किया। उनके नेतृत्व में दिल्ली मेट्रो भारत की सबसे सफल सार्वजनिक परिवहन परियोजनाओं में से एक बनी।
ई. श्रीधरन ने पम्बन पुल का पुनर्निर्माण कितने दिनों में किया?
1963 में टूटे पम्बन पुल का पुनर्निर्माण श्रीधरन ने मात्र 45 दिनों में पूरा किया, जबकि रेलवे ने इसके लिए तीन महीने की समय सीमा तय की थी। यह उपलब्धि उनकी असाधारण कार्यक्षमता की पहली बड़ी मिसाल बनी।
कोंकण रेलवे परियोजना क्या थी और इसमें श्रीधरन की क्या भूमिका रही?
कोंकण रेलवे भारत के पश्चिमी तट के साथ 760 किलोमीटर लंबी रेलवे लाइन है, जिसमें 150 से अधिक पुल शामिल हैं। अत्यंत चुनौतीपूर्ण भूभाग के बावजूद इसे सात वर्षों में पूरा किया गया, और इस परियोजना में श्रीधरन की केंद्रीय भूमिका रही।
ई. श्रीधरन को कौन-कौन से प्रमुख सम्मान मिले हैं?
भारत सरकार ने उन्हें 2001 में पद्म श्री और 2008 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया। इसके अलावा फ्रांस ने 2005 में शेवेलियर डे ला लेगियोन डी'होनूर, जापान ने 2013 में ऑर्डर ऑफ द राइजिंग सन — गोल्ड एंड सिल्वर स्टार दिया, और टाइम पत्रिका ने 2003 में उन्हें 'एशिया का हीरो' घोषित किया।
दिल्ली मेट्रो के बाद श्रीधरन की भूमिका क्या रही?
2012 में दिल्ली मेट्रो से सेवानिवृत्ति के बाद भी श्रीधरन राष्ट्रीय विकास से जुड़े मुद्दों पर सलाहकार की भूमिका में सक्रिय रहे। 2015 में संयुक्त राष्ट्र के महासचिव बान की-मून ने उन्हें सतत परिवहन पर उच्चस्तरीय सलाहकार समूह (HLAG-ST) का सदस्य नियुक्त किया।
राष्ट्र प्रेस
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