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उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन ने किया 'द लाइब्रेरी मैन ऑफ इंडिया' का विमोचन, पढ़ने की घटती आदतों पर जताई गहरी चिंता

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उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन ने किया 'द लाइब्रेरी मैन ऑफ इंडिया' का विमोचन, पढ़ने की घटती आदतों पर जताई गहरी चिंता

सारांश

उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन ने केरल के साक्षरता अग्रदूत पीएन पणिक्कर पर लिखी पुस्तक का विमोचन करते हुए चेताया — जो समाज पढ़ना छोड़ देता है, वह आलोचनात्मक सोच और गहन समझ की क्षमता खो बैठता है। डिजिटल युग में पठन-संस्कृति को बचाने की यह पुकार आज पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक है।

मुख्य बातें

उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन ने 22 मई 2026 को उपराष्ट्रपति भवन, नई दिल्ली में 'द लाइब्रेरी मैन ऑफ इंडिया' पुस्तक का विमोचन किया।
पुस्तक के लेखक पीपी सत्यन हैं और यह केरल के साक्षरता अग्रदूत पीएन पणिक्कर के जीवन पर आधारित है।
उपराष्ट्रपति ने चेताया कि मोबाइल फोन और सोशल मीडिया पर अत्यधिक निर्भरता से गहन पठन और आलोचनात्मक चिंतन की क्षमता क्षीण हो रही है।
सरकार की 'एक राष्ट्र, एक सदस्यता' पहल और ज्ञान भारतम मिशन की सराहना की गई।
पीएन पणिक्कर फाउंडेशन के अध्यक्ष एन.
बालागोपाल के नेतृत्व में पणिक्कर की विरासत को आगे बढ़ाने के प्रयासों की प्रशंसा की गई।

उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन ने 22 मई 2026 को नई दिल्ली स्थित उपराष्ट्रपति भवन में लेखक पीपी सत्यन की पुस्तक 'द लाइब्रेरी मैन ऑफ इंडिया: द स्टोरी ऑफ पीएन पणिक्कर' का विधिवत विमोचन किया। इस अवसर पर उन्होंने साक्षरता आंदोलन के अग्रदूत पीएन पणिक्कर को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए उन्हें एक ऐसा दूरदर्शी बताया जिन्होंने पुस्तकों और ज्ञान की मौन शक्ति के माध्यम से लाखों वंचित लोगों के जीवन को बदला। उपराष्ट्रपति ने कहा कि यह प्रकाशन पणिक्कर की असाधारण दूरदृष्टि और अमिट विरासत का जीवंत प्रमाण है।

पणिक्कर की विरासत और साधारण आरंभ

उपराष्ट्रपति ने केरल के कुट्टानाड में पणिक्कर के साधारण आरंभ को याद करते हुए कहा कि उन्होंने जीवन के शुरुआती दौर में ही यह समझ लिया था कि निरक्षरता केवल पढ़ने में असमर्थता नहीं, बल्कि यह गरिमा, अवसर और मानवीय प्रगति की राह में एक बड़ी बाधा है। राधाकृष्णन ने कहा कि पणिक्कर ने सादगीपूर्ण जीवन व्यतीत करते हुए भी एक असाधारण स्वप्न देखा — कि जाति, वर्ग, गरीबी या भौगोलिक स्थिति की परवाह किए बिना प्रत्येक व्यक्ति को ज्ञान प्राप्त होना चाहिए।

सनातन धर्म पुस्तकालय नामक एक साधारण वाचनालय से शुरू हुई यह यात्रा अंततः केरल के सामाजिक और बौद्धिक परिदृश्य को बदलने में सहायक रही। पणिक्कर ने गांवों और दूरदराज की आदिवासी बस्तियों में अथक यात्राएं कीं और 'पढ़ो और आगे बढ़ो' के सरल किंतु शक्तिशाली संदेश से आम लोगों व स्वयंसेवकों को प्रेरित किया।

पुस्तकालयों की परंपरा और डिजिटल युग की चुनौतियाँ

उपराष्ट्रपति ने नालंदा और तक्षशिला जैसे भारत के ऐतिहासिक ज्ञान केंद्रों का उल्लेख करते हुए कहा कि इन संस्थानों ने सदियों तक विश्व भर के विद्वानों को आकर्षित किया। उन्होंने स्वीकार किया कि पुस्तकालय आज ई-पुस्तकों, डिजिटल अभिलेखागारों और ऑनलाइन संसाधनों के माध्यम से डिजिटल युग में प्रवेश कर चुके हैं, परंतु युवाओं में पढ़ने की आदत में लगातार आती गिरावट एक गंभीर चिंता का विषय बनी हुई है।

गौरतलब है कि यह चेतावनी ऐसे समय में आई है जब स्मार्टफोन उपयोग और सोशल मीडिया की लत वैश्विक स्तर पर युवाओं की एकाग्रता को प्रभावित कर रही है। राधाकृष्णन ने कहा कि प्रौद्योगिकी ने सुविधा तो दी है, लेकिन साथ ही धैर्य, एकाग्रता और साहित्य एवं ज्ञान के साथ सार्थक जुड़ाव को भी कम किया है।

पढ़ना छोड़ने वाले समाज पर कड़ी चेतावनी

उपराष्ट्रपति ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि 'जो समाज पढ़ना छोड़ देता है, वह धीरे-धीरे आलोचनात्मक चिंतन, रचनात्मक कल्पना और गहन समझ की क्षमता खो देता है।' मोबाइल फोन और संक्षिप्त मनोरंजन पर अत्यधिक निर्भरता पर चिंता जताते हुए उन्होंने कहा कि गहन पठन, चिंतन और विचारपूर्वक सीखना धीरे-धीरे लुप्त हो रहा है।

उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि 'द लाइब्रेरी मैन ऑफ इंडिया' जैसी पुस्तकें युवा पीढ़ी में पढ़ने और चिंतन की संस्कृति को पुनर्जीवित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।

सरकारी पहलें और पणिक्कर फाउंडेशन की सराहना

उपराष्ट्रपति ने एन. बालागोपाल के नेतृत्व में पीएन पणिक्कर फाउंडेशन के कार्यों की प्रशंसा करते हुए कहा कि यह संस्था पणिक्कर की विरासत को सजीव रखने में उल्लेखनीय भूमिका निभा रही है। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा 'मन की बात' में व्यक्त दृष्टिकोण का हवाला देते हुए कहा कि पुस्तकालयों को रचनात्मकता के गतिशील केंद्रों के रूप में विकसित होना चाहिए।

उन्होंने 'एक राष्ट्र, एक सदस्यता' पहल की भी सराहना की, जो देश भर के छात्रों और शोधकर्ताओं के लिए अंतरराष्ट्रीय अकादमिक शोध और पत्रिकाओं तक पहुंच सुनिश्चित करने के उद्देश्य से शुरू की गई है। साथ ही, भारत की हस्तलिखित विरासत को संरक्षित और डिजिटाइज करने के लिए ज्ञान भारतम मिशन की भी प्रशंसा की।

समापन संदेश: एक किताब जीवन बदल सकती है

अपने संबोधन के अंत में उपराष्ट्रपति ने कहा कि पणिक्कर की महानता केवल पुस्तकालयों के निर्माण में नहीं, बल्कि आम नागरिकों में आशा, जागरूकता और आत्मविश्वास जगाने में निहित है। उन्होंने कहा — 'एक पुस्तकालय बच्चे का भविष्य बदल सकता है, एक किताब जीवन को रूपांतरित कर सकती है, और एक दृढ़ निश्चयी व्यक्ति पूरे समाज को बदल सकता है।' उन्होंने माता-पिता, शिक्षकों और संस्थानों से आग्रह किया कि वे बच्चों में पढ़ने की आदत विकसित करने के प्रति सजग रहें और ज्ञान के प्रसार की इस परंपरा को आगे बढ़ाएं।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन असली सवाल यह है कि 'एक राष्ट्र, एक सदस्यता' जैसी पहलें ग्रामीण और वंचित वर्गों तक कितनी पहुंच पा रही हैं, जहाँ डिजिटल खाई अभी भी गहरी है। पठन-संस्कृति को पुनर्जीवित करने के लिए भाषण से आगे बढ़कर बजटीय प्रतिबद्धता और जमीनी क्रियान्वयन की जरूरत है।
RashtraPress
8 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

'द लाइब्रेरी मैन ऑफ इंडिया' पुस्तक किस पर आधारित है?
यह पुस्तक केरल के साक्षरता अग्रदूत पीएन पणिक्कर के जीवन और उनके पुस्तकालय आंदोलन पर आधारित है, जिसे लेखक पीपी सत्यन ने लिखा है। पणिक्कर ने 'पढ़ो और आगे बढ़ो' के संदेश से केरल में साक्षरता क्रांति की नींव रखी थी।
पीएन पणिक्कर कौन थे और उनका योगदान क्यों महत्वपूर्ण है?
पीएन पणिक्कर केरल के कुट्टानाड से थे और उन्हें केरल के सांस्कृतिक पुनर्जागरण का जनक माना जाता है। उन्होंने सनातन धर्म पुस्तकालय की स्थापना से शुरुआत करते हुए गांवों और आदिवासी बस्तियों तक पुस्तकालय आंदोलन फैलाया और जाति व वर्ग की परवाह किए बिना ज्ञान को सर्वसुलभ बनाने का स्वप्न देखा।
उपराष्ट्रपति ने युवाओं में पढ़ने की आदत को लेकर क्या चिंता जताई?
उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन ने कहा कि मोबाइल फोन, सोशल मीडिया और संक्षिप्त मनोरंजन पर अत्यधिक निर्भरता से गहन पठन और आलोचनात्मक चिंतन की क्षमता धीरे-धीरे लुप्त हो रही है। उन्होंने चेताया कि जो समाज पढ़ना छोड़ देता है, वह रचनात्मक कल्पना और गहन समझ खो बैठता है।
'एक राष्ट्र, एक सदस्यता' पहल क्या है?
यह भारत सरकार की एक पहल है जिसका उद्देश्य देश भर के छात्रों और शोधकर्ताओं को अंतरराष्ट्रीय अकादमिक शोध पत्रिकाओं तक सुलभ पहुंच प्रदान करना है। उपराष्ट्रपति ने इसे भारत के ज्ञान पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत करने की दिशा में एक सकारात्मक कदम बताया।
ज्ञान भारतम मिशन का उद्देश्य क्या है?
ज्ञान भारतम मिशन का लक्ष्य भारत की अमूल्य हस्तलिखित विरासत को प्रौद्योगिकी और नवाचार के माध्यम से संरक्षित, डिजिटाइज और प्रसारित करना है। उपराष्ट्रपति ने इस मिशन की प्रशंसा करते हुए इसे भारत की सांस्कृतिक धरोहर को सुरक्षित रखने का महत्वपूर्ण प्रयास बताया।
राष्ट्र प्रेस
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