संपत्ति धोखाधड़ी मामले में सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: सिर्फ खरीदारी से नहीं बनता आपराधिक मुकदमे का आधार
सारांश
Key Takeaways
- सर्वोच्च न्यायालय ने 28 अप्रैल 2026 को तमिलनाडु के संपत्ति धोखाधड़ी मामले में अपीलकर्ता एस. आनंद के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही रद्द की।
- पीठ ने माना कि रिकॉर्ड पर 'सबूत का एक कण भी' नहीं था जो अपीलकर्ता की जालसाजी में भागीदारी दर्शाए।
- जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने मद्रास उच्च न्यायालय का आदेश पलटा।
- अदालत ने स्थापित किया कि सद्भावपूर्ण (बोना फाइड) खरीदार के खिलाफ धोखाधड़ी का मुकदमा तब तक नहीं चलाया जा सकता जब तक सक्रिय साजिश का स्पष्ट सबूत न हो।
- शेष आरोपियों के खिलाफ आईपीसी धारा 467, 468, 471, 420 और 120-बी के तहत ट्रायल जारी रहेगा।
सर्वोच्च न्यायालय ने 28 अप्रैल 2026 को तमिलनाडु के करूर जिले से जुड़े एक दशकों पुराने जाली वसीयत और संपत्ति धोखाधड़ी मामले में अहम फैसला सुनाते हुए एक खरीदार के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि विवादित संपत्ति की मात्र खरीदारी, बिना जालसाजी या साजिश में सक्रिय भागीदारी के ठोस सबूत के, आपराधिक मुकदमे का आधार नहीं बन सकती।
मामले की पृष्ठभूमि
2004 में दर्ज एक एफआईआर में आरोप लगाया गया था कि शिकायतकर्ता के दिवंगत भाई ने अन्य आरोपियों के साथ मिलकर उनके पिता की वसीयत को जाली बनाया और उस जाली वसीयत के आधार पर खरीदारों के पक्ष में बिक्री विलेख (सेल डीड) निष्पादित किए। इससे वैध वारिसों को उनके संपत्ति अधिकारों से वंचित किया गया। पुलिस ने जाँच के बाद संपत्ति के खरीदारों सहित कई आरोपियों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 467, 468, 471, 420 और 120-बी के तहत चार्जशीट दायर की।
अपीलकर्ता की स्थिति और हाई कोर्ट का रुख
अपीलकर्ता एस. आनंद ने मद्रास उच्च न्यायालय में कार्यवाही रद्द करने की अर्जी दी, जिसे हाई कोर्ट ने अस्वीकार कर दिया। इसके बाद आनंद ने सर्वोच्च न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाया। सुप्रीम कोर्ट ने रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री की जाँच में पाया कि अपीलकर्ता का 12 सितंबर 1988 की कथित जाली वसीयत बनाने से कोई संबंध नहीं था और न ही वह उन पूर्व लेन-देन में कोई पक्षकार था, जो अभियोजन पक्ष के षड्यंत्र सिद्धांत का आधार बनी थीं।
सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणियाँ
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने कहा कि रिकॉर्ड पर 'सबूत का एक कण भी' ऐसा नहीं है जो यह दर्शाए कि अपीलकर्ता को खरीद के समय कथित जालसाजी की जानकारी थी। पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि अपीलकर्ता एक मूल्यवान प्रतिफल (कीमत) के बदले संपत्ति का क्रेता है और मौजूदा तथ्यों के आधार पर उसे कपटपूर्ण प्रलोभन देने वाला नहीं माना जा सकता।
गौरतलब है कि अदालत ने यह भी कहा कि जहाँ कोई व्यक्ति स्वामित्व का दावा करते हुए संपत्ति बेचता है, वहाँ धोखाधड़ीपूर्ण गलतबयानी के मामलों में पीड़ित पक्ष आमतौर पर खरीदार होता है, न कि कोई तीसरा पक्ष — सिवाय उन मामलों के जहाँ प्रत्यक्ष धोखे का सबूत हो। पीठ ने यहाँ तक कहा कि यदि वसीयत के जाली होने का आरोप सही भी साबित हो, तो भी खरीदार ही पीड़ित पक्ष होंगे, क्योंकि उनके मालिकाना हक पर सवाल उठेगा।
स्थापित कानूनी सिद्धांत की पुष्टि
सर्वोच्च न्यायालय ने संपत्ति विवादों में आपराधिक दायित्व को नियंत्रित करने वाले स्थापित सिद्धांतों को दोहराते हुए माना कि किसी 'बोना फाइड' (सद्भावपूर्ण) खरीदार के खिलाफ धोखाधड़ी के लिए आपराधिक मुकदमा तब तक नहीं चलाया जा सकता, जब तक धोखाधड़ी के इरादे या सक्रिय साजिश का स्पष्ट सबूत न हो। अदालत ने यह भी कहा कि न तो एफआईआर और न ही विवादित आदेश से ऐसा कोई ठोस साक्ष्य सामने आता है जो आरोप की पुष्टि करे।
फैसले का दायरा और आगे की राह
सर्वोच्च न्यायालय ने अपीलकर्ता के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही जारी रखने को 'प्रक्रिया का दुरुपयोग' करार देते हुए उसके खिलाफ सभी लंबित आपराधिक कार्रवाइयाँ रद्द कर दीं। अदालत ने स्पष्ट किया कि शेष आरोपियों के खिलाफ ट्रायल यथावत जारी रहेगा। यह फैसला उन लाखों संपत्ति खरीदारों के लिए एक महत्वपूर्ण नज़ीर है जो किसी विवादित संपत्ति के अनजाने में खरीदार बन जाते हैं।