सुप्रीम कोर्ट ने हेट स्पीच पर नई गाइडलाइंस से किया इनकार, कहा- मौजूदा कानून पर्याप्त, अमल में कमी
सारांश
Key Takeaways
- सर्वोच्च न्यायालय ने 29 अप्रैल 2026 को हेट स्पीच पर अतिरिक्त न्यायिक दिशानिर्देश जारी करने से इनकार किया।
- जस्टिस विक्रमनाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने 2020 से लंबित सभी संबंधित याचिकाएँ खारिज कीं।
- कोर्ट ने कहा— समस्या कानून की कमी नहीं, बल्कि उसके प्रभावी क्रियान्वयन की है।
- संवैधानिक अदालतें संसद या राज्य विधानसभाओं को नया कानून बनाने के लिए बाध्य नहीं कर सकतीं।
- केंद्र व राज्य सरकारें लॉ कमीशन की 267वीं रिपोर्ट (2017) में सुझाए संशोधनों पर विचार करने के लिए स्वतंत्र हैं।
- एफआईआर दर्ज न होने पर पीड़ित एसपी, मजिस्ट्रेट या निजी शिकायत का रास्ता अपना सकते हैं।
सर्वोच्च न्यायालय ने बुधवार, 29 अप्रैल 2026 को हेट स्पीच (नफरत फैलाने वाले भाषणों) पर अंकुश लगाने के लिए अतिरिक्त न्यायिक दिशानिर्देश जारी करने से स्पष्ट रूप से इनकार कर दिया। नई दिल्ली स्थित शीर्ष अदालत ने कहा कि देश का मौजूदा कानूनी ढाँचा ऐसे मामलों से निपटने के लिए पर्याप्त है और असली समस्या कानून की कमी नहीं, बल्कि उसके प्रभावी क्रियान्वयन की है।
मुख्य फैसला और खारिज याचिकाएँ
जस्टिस विक्रमनाथ और जस्टिस संदीप मेहता की खंडपीठ ने उन सभी याचिकाओं को खारिज कर दिया जिनमें सांप्रदायिक हेट स्पीच के विरुद्ध और अधिक न्यायिक हस्तक्षेप की माँग की गई थी। इन याचिकाओं में 'कोरोना जिहाद', 'यूपीएसएस जिहाद' और विभिन्न धार्मिक सभाओं में दिए गए भड़काऊ भाषणों से जुड़े मामले शामिल थे। ये याचिकाएँ 2020 से लंबित थीं और इनमें ब्रॉडकास्ट मीडिया, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म तथा सार्वजनिक धार्मिक सभाओं के ज़रिये सांप्रदायिक सामग्री फैलाने के आरोप लगाए गए थे।
विधायिका के अधिकार क्षेत्र पर कोर्ट का रुख
खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि आपराधिक मामलों की परिभाषा और उनके लिए सज़ा तय करना पूरी तरह विधायिका के अधिकार क्षेत्र में आता है। अदालत ने कहा,