डॉ. एमएस स्वामीनाथन: कैम्ब्रिज छोड़ खेतों को चुना, 1960 के अकाल में बचाया भारत
सारांश
मुख्य बातें
डॉ. मनकोम्बु सांबशिवन स्वामीनाथन — जिन्हें दुनिया डॉ. एमएस स्वामीनाथन के नाम से जानती है — वह वैज्ञानिक थे जिन्होंने 1960 के दशक के भीषण अकाल के बीच भारत की कृषि को नई दिशा दी और देश को खाद्यान्न आत्मनिर्भरता की राह पर खड़ा किया। उनके विज्ञान-आधारित प्रयासों से जन्मी हरित क्रांति ने भारत को पश्चिमी खाद्य सहायता पर निर्भर देश से अनाज के निर्यातक राष्ट्र में बदल दिया। 28 सितंबर 2023 को उनके निधन के बाद 2024 में उन्हें मरणोपरांत भारत रत्न से सम्मानित किया गया।
बचपन की वह तस्वीर जिसने बदल दी जिंदगी की राह
7 अगस्त 1925 को तमिलनाडु के कुंबकोणम में जन्मे स्वामीनाथन को परिवार में प्यार से एमएसएस कहा जाता था। किशोरावस्था में ही उन्होंने द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान भारत में पड़े अकाल की त्रासदी को करीब से देखा — लाइन में खड़े भूखे लोग और खाली थालियाँ, यह दृश्य उनके मन में गहरे उतर गया और आगे की पूरी जीवन-यात्रा का आधार बन गया।
कृषि में डिग्री हासिल करने के बाद उन्होंने भारतीय पुलिस सेवा (IPS) की परीक्षा भी उत्तीर्ण की। वर्दी और रुतबे की निश्चित राह सामने थी, फिर भी उन्होंने उसे ठुकराकर खेत और प्रयोगशाला को चुना। वे जेनेटिक्स की उच्च शिक्षा के लिए कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय पहुँचे, जहाँ उन्होंने प्रख्यात वैज्ञानिक सर फ्रेडरिक गौलैंड हॉपकिंस के साथ काम किया।
नॉर्मन बोरलॉग से मुलाकात और हरित क्रांति की नींव
कैम्ब्रिज के बाद स्वामीनाथन की मुलाकात नोबेल पुरस्कार विजेता डॉ. नॉर्मन बोरलॉग से हुई। दोनों ने मिलकर भारत के खेतों में गेहूँ और धान की अधिक उपज देने वाली नई किस्में पेश कीं। स्वामीनाथन केवल प्रयोगशाला तक सीमित नहीं रहे — वे छोटे किसानों के बीच गए, उनकी समस्याएँ सुनीं, उनसे सीखा और उनका विश्वास अर्जित किया।
1960 के दशक में जब भारत भीषण अकाल की चपेट में था और पश्चिमी देशों से आने वाला अनाज ही देश की सांसें चला रहा था, तब स्वामीनाथन के प्रयासों से हरित क्रांति का सूत्रपात हुआ। यह केवल एक कृषि सुधार नहीं था — यह एक ऐसा वैज्ञानिक आंदोलन था जिसने भारत की खाद्य संप्रभुता की नींव रखी।
वैश्विक पहचान और 'एवरग्रीन रिवोल्यूशन' की अवधारणा
1980 के दशक तक स्वामीनाथन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक स्थापित नाम बन चुके थे। उन्होंने दुनियाभर के आयोगों की अध्यक्षता की, जैव विविधता नीतियाँ तैयार कीं और जीवनकाल में 80 से अधिक मानद डॉक्टरेट उपाधियाँ प्राप्त कीं। उन्हें वर्ल्ड फूड प्राइज़, रेमन मैग्सेसे पुरस्कार और पद्म विभूषण सहित अनेक सम्मान मिले।
स्वामीनाथन ने कृषि के प्रति एक समग्र दृष्टिकोण अपनाया — जिसमें स्थिरता, लैंगिक समानता और प्राकृतिक संसाधन संरक्षण को केंद्र में रखा गया। इसी सोच से उनकी 'एवरग्रीन रिवोल्यूशन' की अवधारणा उभरी, जो हरित क्रांति की उत्पादकता को पारिस्थितिक संतुलन के साथ जोड़ने का प्रयास था।
'बायोहैप्पीनेस' — जीवन के अंतिम चरण का संदेश
जीवन के अंतिम वर्षों में स्वामीनाथन ने एक नई अवधारणा — 'बायोहैप्पीनेस' — दुनिया के सामने रखी। इसका अर्थ है प्रकृति के साथ सामंजस्य बिठाकर जीने और जैविक संसाधनों के न्यायसंगत उपयोग से प्राप्त होने वाली सामूहिक खुशी। जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता के क्षरण और बढ़ती वैश्विक असमानता के इस दौर में यह विचार और भी प्रासंगिक हो उठा है।
विरासत: भारत रत्न और एक अमर योगदान
28 सितंबर 2023 को डॉ. एमएस स्वामीनाथन का निधन हो गया। 2024 में भारत सरकार ने उन्हें मरणोपरांत देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से विभूषित किया — कृषि और किसान कल्याण में उनके अभूतपूर्व योगदान की स्वीकृति के रूप में। वे एक वैज्ञानिक से कहीं अधिक थे — एक संवेदनशील शिक्षक, विनम्र मार्गदर्शक और सच्चे जनसेवक, जिनकी विरासत भारत की हर थाली में आज भी जीवित है।