क्या नेताजी ने अंग्रेजी हुकूमत की नौकरी ठुकराकर अपनी मातृभूमि को चुना? आजाद हिंद फौज से लिखी नई कहानी
सारांश
Key Takeaways
- नेताजी का साहस और समर्पण हमेशा प्रेरणा का स्रोत रहे हैं।
- उन्होंने अंग्रेजी हुकूमत की नौकरी को ठुकराया, जो एक बड़ा निर्णय था।
- आजाद हिंद फौज ने देशभक्ति और संगठन का अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत किया।
- नेताजी का नारा आज भी हमारे दिलों में गूंजता है।
- भारत सरकार ने उनकी जयंती को पराक्रम दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया।
नई दिल्ली, 22 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। वर्तमान में बहुतेरे लोग सरकारी नौकरी को अपनी ज़िन्दगी की सबसे बड़ी उपलब्धि मानते हैं। कई सालों की मेहनत, अध्ययन और सपने देखने के बाद कुछ ही लोग इसे वास्तविकता में तब्दील कर पाते हैं। परंतु, कुछ ऐसे भी थे जिन्होंने इस प्रतिष्ठित और सुरक्षित मार्ग को छोड़कर अपनी माटी, अपने देश और उसकी आजादी को चुना। ऐसे ही महान व्यक्तित्वों में सुभाष चंद्र बोस शामिल हैं, जिन्होंने अपने कार्यों और निर्णयों से इतिहास रच दिया।
सुभाष चंद्र बोस एक भारतीय राष्ट्रवादी नेता थे, जिनका नाम आज हर भारतीय गर्व के साथ लेता है। उन्होंने ब्रिटिश शासन के खिलाफ भारत की आज़ादी की लड़ाई में अद्वितीय भूमिका निभाई। बोस ने अपने जीवन में कई साहसिक कदम उठाए जो आज भी प्रेरणा का स्रोत हैं। उनके 'पराक्रम' की शुरुआत तब हुई जब उन्होंने अंग्रेजी हुकूमत की नौकरी ठुकराई। यह निर्णय कोई साधारण नहीं था। उस समय आईसीएस (अब आईएएस) जैसी प्रतिष्ठित नौकरी को छोड़कर उन्होंने अपनी पूरी ताकत आज़ादी के लिए लगा दी।
सुभाष चंद्र बोस का जन्म 23 जनवरी 1897 को ओडिशा के कटक में हुआ था। बचपन से ही उनमें जिज्ञासा और सीखने की लगन दिखती थी। प्रारंभिक शिक्षा के बाद उन्होंने कलकत्ता यूनिवर्सिटी से डिग्री प्राप्त की। पढ़ाई में तेज होने के बावजूद उनका लक्ष्य केवल व्यक्तिगत सफलता नहीं था, बल्कि देश की भलाई और आज़ादी थी, इसलिए उन्होंने आगे चलकर आईसीएस की परीक्षा देने इंग्लैंड जाने का निर्णय लिया। वर्ष 1919-20 में उन्होंने यह परीक्षा पास की और चौथे स्थान के साथ आईसीएस अधिकारी बने।
लेकिन, बोस के लिए यह नौकरी केवल एक व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं थी। उनके दिल और दिमाग में हमेशा एक ही बात थी: भारत को स्वतंत्र देखना, इसलिए उन्होंने अंग्रेजी हुकूमत की प्रतिष्ठित नौकरी को ठुकरा दिया और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से जुड़ गए। कांग्रेस में शामिल होकर बोस तेजी से नेतृत्व की ओर बढ़े। उनके क्रांतिकारी विचार और ब्रिटिश शासन से पूर्ण स्वतंत्रता की वकालत उन्हें अन्य नेताओं से अलग बनाती थी। वर्ष 1938 और 1939 में उन्हें कांग्रेस का अध्यक्ष चुना गया, लेकिन बाद में उन्होंने अपने विचारों और रणनीति के चलते इस्तीफा दे दिया।
देश को आज़ाद कराने के लिए बोस ने अपनी सेना 'आजाद हिंद फौज' का गठन किया। यह केवल एक सेना नहीं थी, बल्कि उनके नेतृत्व, साहस और अनुशासन की एक मिसाल थी। आज़ाद हिंद फौज ने भारतीय जवानों को न केवल लड़ने के लिए, बल्कि देशभक्ति, संगठन और साहस के लिए प्रशिक्षित किया। बोस ने न केवल देश में, बल्कि विदेशों में भी स्वतंत्रता आंदोलन को आगे बढ़ाया। उन्होंने बर्लिन में फ्री इंडिया सेंटर की स्थापना की और आजाद हिंद रेडियो की शुरुआत की, जिससे आज़ादी का संदेश जन-जन तक पहुंचा।
नेताजी का नारा, 'तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूंगा,' आज भी हर भारतीय के दिल में गूंजता है। यह नारा केवल शब्द नहीं, बल्कि संकल्प और हिम्मत का प्रतीक है। इसी कारण भारत सरकार ने 2021 से हर वर्ष 23 जनवरी को उनकी जयंती पर पराक्रम दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की। यह दिन केवल नेताजी की याद दिलाने के लिए नहीं है, बल्कि उनके विचारों, साहस और दृढ़ संकल्प को जीवित रखने का प्रतीक है।