क्या पीएम मोदी ने 'मन की बात' में द्वितीय विश्व युद्ध से गीता महोत्सव तक की बात की?
सारांश
Key Takeaways
- पीएम मोदी ने द्वितीय विश्व युद्ध और गीता महोत्सव का महत्व बताया।
- कुरुक्षेत्र में महाभारत के अनुभव को डिजिटल तकनीक से प्रस्तुत किया जा रहा है।
- गीता महोत्सव में वैश्विक भागीदारी को सराहा गया।
- भारत की संस्कृति में शांति और करुणा का महत्व है।
नई दिल्ली, 30 नवंबर (राष्ट्र प्रेस)। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मासिक कार्यक्रम 'मन की बात' का 128वां एपिसोड रविवार को प्रसारित हुआ। इस दौरान पीएम मोदी ने महाभारत से लेकर द्वितीय विश्व युद्ध तक के विषयों का उल्लेख किया। उन्होंने हाल ही में अपनी कुरुक्षेत्र यात्रा, सऊदी अरब में सार्वजनिक मंच पर हुई गीता की प्रस्तुति और महाराजा दिग्विजय सिंह के अद्भुत कार्यों के बारे में भी जानकारी दी।
पीएम मोदी ने हरियाणा के कुरुक्षेत्र का जिक्र करते हुए बताया कि कैसे डिजिटल तकनीक के माध्यम से थ्रीडी, लाइट एंड साउंड शो का प्रदर्शन किया जा रहा है। उन्होंने कहा, "हरियाणा के कुरुक्षेत्र में महाभारत का युद्ध हुआ था, ये हम सभी जानते हैं, लेकिन युद्ध के इस अनुभव को आप वहां महाभारत अनुभव केंद्र में भी साक्षात अनुभव कर सकते हैं। इस अनुभव केंद्र में महाभारत की गाथा को थ्रीडी, लाइट एंड साउंड शो और डिजिटल तकनीक से दर्शाया जा रहा है। 25 नवंबर को जब मैं कुरुक्षेत्र गया था तो इस अनुभव केंद्र ने मुझे आनंद से भर दिया था।"
पीएम मोदी ने कुरुक्षेत्र में ब्रह्म सरोवर पर आयोजित अंतर्राष्ट्रीय गीता महोत्सव में भाग लेने को अपने लिए विशेष बताया। उन्होंने कहा, "कुरुक्षेत्र में ब्रह्म सरोवर पर आयोजित अंतर्राष्ट्रीय गीता महोत्सव में शामिल होना मेरे लिए बहुत विशेष रहा। मैंने देखा कि कैसे दुनियाभर के लोग दिव्य ग्रंथ गीता से प्रेरित हो रहे हैं। इस महोत्सव में यूरोप और सेंट्रल एशिया सहित विश्व के कई देशों के लोग शामिल हुए।"
उन्होंने आगे कहा, "इस महीने की शुरुआत में सऊदी अरब में पहली बार किसी सार्वजनिक मंच पर गीता की प्रस्तुति दी गई। यूरोप के लातविया में भी एक यादगार गीता महोत्सव आयोजित किया गया। इस महोत्सव में लातविया, एस्टोनिया, लिथुआनिया और अल्जीरिया के कलाकारों ने हिस्सा लिया।"
पीएम मोदी ने कहा, "भारत की महान संस्कृति में शांति और करुणा का भाव सर्वोपरि रहा है। आप द्वितीय विश्व युद्ध की कल्पना कीजिए, जब चारों ओर विनाश का भयावह माहौल था। ऐसे कठिन समय में गुजरात के नवानगर के जाम साहब, महाराजा दिग्विजय सिंह जी ने जो महान कार्य किए, वो आज भी हमें प्रेरित करते हैं। उस समय जाम साहब किसी सामरिक गठबंधन या युद्ध की रणनीति के बारे में नहीं सोच रहे थे, बल्कि उनकी चिंता यह थी कि कैसे विश्व युद्ध के बीच पोलिश यहूदी बच्चों की रक्षा हो।"