16 अक्टूबर 2026
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प्रयागराज के दारागंज में 'काली स्वांग' जुलूस: 1920 से चली आ रही परंपरा, हजारों श्रद्धालु हुए शामिल

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प्रयागराज के दारागंज में 'काली स्वांग' जुलूस: 1920 से चली आ रही परंपरा, हजारों श्रद्धालु हुए शामिल

सारांश

प्रयागराज के दारागंज में 1920 से चली आ रही 'काली स्वांग' जुलूस की परंपरा इस बार भी हजारों श्रद्धालुओं के जयकारों के बीच जीवंत हुई। अंग्रेजों के दौर में रोकने की कोशिश के बावजूद जीवित रही यह परंपरा प्रयागराज की आस्था और सांस्कृतिक विरासत का अटूट प्रतीक है।

मुख्य बातें

प्रयागराज के दारागंज में 16 अक्टूबर 2026 की रात पारंपरिक 'काली स्वांग' जुलूस निकाला गया।
यह परंपरा सन् 1920 से अनवरत चली आ रही है और ब्रिटिश शासनकाल में रोकने के प्रयास के बावजूद जीवित रही।
कलाकार सचिन शुक्ला ने बताया कि इस भूमिका के लिए कम से कम दो महीने की कठोर शारीरिक तैयारी करनी होती है।
दारागंज रामलीला समिति के अध्यक्ष राजेंद्र कुमार यादव के अनुसार, कलाकार पूरे वर्ष भजन-कीर्तन और ब्रह्मचर्य के अनुशासन में रहते हैं।
जुलूस रामायण की एक पौराणिक कथा से जुड़ा माना जाता है और हर साल पर्यटकों को भी आकर्षित करता है।

प्रयागराज के ऐतिहासिक दारागंज इलाके में 16 अक्टूबर 2026 की गुरुवार रात नवरात्रि के पावन अवसर पर पारंपरिक 'काली स्वांग' जुलूस निकाला गया, जिसमें हजारों श्रद्धालु उमड़ पड़े। देवी काली का रूप धारण किए कलाकार हाथों में हथियार और खोपड़ी के पात्र लिए 'जय माँ काली' के जयकारों के बीच सड़कों पर नृत्य करते दिखे, जिससे पूरा दारागंज भक्तिमय वातावरण में डूब गया। यह आयोजन केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का जीवंत प्रमाण है।

सदियों पुरानी परंपरा का गौरवशाली इतिहास

स्थानीय निवासी नीलांश श्रीवास्तव के अनुसार, यह परंपरा सन् 1920 से निरंतर चली आ रही है — यानी यह जुलूस भारत की आजादी से भी पुरानी है। उन्होंने बताया कि ब्रिटिश शासनकाल में इस परंपरा को रोकने का प्रयास भी किया गया था, किंतु स्थानीय समुदाय के संकल्प के चलते इसे पुनः जीवित किया गया। गौरतलब है कि यह जुलूस रामायण की एक पौराणिक कथा से जुड़ा माना जाता है और हर वर्ष पर्यटकों को भी प्रयागराज की ओर आकर्षित करता है।

नीलांश ने कहा, 'इस परंपरा का चमत्कार आप इसी बात से समझ सकते हैं कि जुलूस वाली रात पूरा दारागंज जागता है। हर कोई पूजा और आरती के लिए उत्सुक रहता है। ऐसा लगता है जैसे सड़कों पर एक नई रोशनी और नई ऊर्जा उतर आई हो।'

कलाकार की कठोर साधना

देवी काली की भूमिका निभाने वाले कलाकार सचिन शुक्ला ने अपनी तैयारी के बारे में विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने बताया, 'देवी काली की भूमिका निभाने के लिए बहुत कठिन तैयारी करनी पड़ती है। हमें इसके लिए कम से कम दो महीने का समय मिलता है। इस दौरान दौड़, शारीरिक व्यायाम और खुद को पूरी तरह फिट रखना पड़ता है, तभी हम इस स्वरूप को सही तरीके से निभा पाते हैं।'

यह कठिन शारीरिक और मानसिक अनुशासन इस आयोजन की गरिमा को बनाए रखने का आधार है। एक सामान्य सांस्कृतिक प्रदर्शन से इसे अलग करने वाली बात यही तपस्या है।

दारागंज रामलीला समिति का योगदान

दारागंज रामलीला समिति के अध्यक्ष राजेंद्र कुमार यादव ने इस आयोजन के पीछे की कठोर प्रक्रिया का विवरण दिया। उन्होंने बताया, 'कलाकार पूरे साल इस भूमिका की तैयारी करता है। इसके लिए एक विशेष रिहर्सल तय की जाती है। इस दौरान कलाकार को सख्त खान-पान का पालन करना होता है, नियमित रूप से भजन-कीर्तन करना होता है और ब्रह्मचर्य का कठोरता से पालन करना पड़ता है।'

यह समिति वर्षों से इस परंपरा की संरक्षक रही है और प्रत्येक वर्ष इस आयोजन को और भव्य रूप देने का प्रयास करती है।

आम जनता पर असर और सांस्कृतिक महत्व

यह जुलूस प्रयागराज की नवरात्रि आस्था का सबसे भव्य जनप्रदर्शन माना जाता है। स्थानीय व्यापार, पर्यटन और सामाजिक एकजुटता — तीनों पर इसका सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। हर वर्ष यह आयोजन देश के अलग-अलग हिस्सों से श्रद्धालुओं और जिज्ञासु पर्यटकों को खींचता है, जो प्रयागराज की सांस्कृतिक पहचान को और मजबूत करता है।

क्या होगा आगे

नवरात्रि के शेष दिनों में दारागंज और प्रयागराज के अन्य प्रमुख क्षेत्रों में धार्मिक आयोजनों का क्रम जारी रहने की उम्मीद है। इस 'काली स्वांग' की बढ़ती लोकप्रियता को देखते हुए आने वाले वर्षों में इस परंपरा का दायरा और व्यापक होने की संभावना है।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि एक समुदाय की पहचान और स्मृति का वार्षिक उत्सव है। यह ऐसे समय में और प्रासंगिक हो जाता है जब शहरीकरण और आधुनिकता के दबाव में अनेक स्थानीय परंपराएँ विलुप्त हो रही हैं। दारागंज रामलीला समिति जैसे संगठनों की भूमिका इस विरासत के संरक्षण में निर्णायक है, और इस परंपरा को मिलने वाला व्यापक जनसमर्थन यह संकेत देता है कि सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ाव अभी भी उतना ही गहरा है।
RashtraPress
16 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

'काली स्वांग' जुलूस क्या है?
'काली स्वांग' प्रयागराज के दारागंज इलाके में नवरात्रि के दौरान निकाला जाने वाला एक पारंपरिक धार्मिक जुलूस है, जिसमें कलाकार देवी काली का रूप धारण कर सड़कों पर नृत्य करते हैं। यह परंपरा रामायण की एक पौराणिक कथा से जुड़ी मानी जाती है और 1920 से अनवरत चली आ रही है।
यह परंपरा कब से चली आ रही है?
स्थानीय निवासी नीलांश श्रीवास्तव के अनुसार, 'काली स्वांग' की परंपरा सन् 1920 से चली आ रही है, जो भारत की स्वतंत्रता से भी पूर्व की है। ब्रिटिश शासनकाल में इसे रोकने का प्रयास किया गया था, लेकिन स्थानीय समुदाय ने इसे पुनर्जीवित किया।
देवी काली की भूमिका के लिए कलाकार कैसे तैयारी करते हैं?
कलाकार सचिन शुक्ला के अनुसार, इस भूमिका के लिए कम से कम दो महीने की कठोर शारीरिक तैयारी — दौड़, व्यायाम और शारीरिक फिटनेस — आवश्यक है। इसके अलावा दारागंज रामलीला समिति के अध्यक्ष राजेंद्र कुमार यादव के अनुसार, कलाकार पूरे वर्ष सख्त खान-पान, भजन-कीर्तन और ब्रह्मचर्य के अनुशासन का पालन करते हैं।
इस जुलूस का प्रयागराज के लिए क्या महत्व है?
यह जुलूस प्रयागराज की सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान का प्रतीक है। हर वर्ष यह आयोजन न केवल स्थानीय श्रद्धालुओं को एकजुट करता है, बल्कि देश के अन्य हिस्सों से पर्यटकों को भी आकर्षित करता है, जिससे शहर की सांस्कृतिक विरासत को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिलती है।
इस बार जुलूस में कितने लोग शामिल हुए?
16 अक्टूबर 2026 की गुरुवार रात दारागंज में निकले 'काली स्वांग' जुलूस में हजारों श्रद्धालु शामिल हुए। जुलूस वाली पूरी रात दारागंज में उत्सव का माहौल रहा और 'जय माँ काली' के जयकारों से पूरा इलाका गूँजता रहा।
राष्ट्र प्रेस
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