8 जुलाई 2026
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शीतला अष्टमी पर मां कल्याणी देवी मंदिर में उमड़े हजारों श्रद्धालु, 150 वर्ष पुरानी परंपरा का निर्वाह

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शीतला अष्टमी पर मां कल्याणी देवी मंदिर में उमड़े हजारों श्रद्धालु, 150 वर्ष पुरानी परंपरा का निर्वाह

सारांश

प्रयागराज के शक्तिपीठ मां कल्याणी देवी मंदिर में शीतला अष्टमी पर हजारों श्रद्धालु उमड़े। 150 वर्ष पुरानी बसौड़ा परंपरा के तहत सप्तमी को बना हलवा-पूरी अष्टमी को भोग लगाया गया और अष्टमी पर चूल्हा नहीं जला — यह आस्था और सांस्कृतिक निरंतरता का जीवंत उदाहरण है।

मुख्य बातें

8 जुलाई 2026 को प्रयागराज के शक्तिपीठ मां कल्याणी देवी मंदिर में शीतला अष्टमी पर विशेष पूजा-अर्चना आयोजित हुई।
इस धाम में वर्ष में चार शीतला अष्टमी — चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ और आषाढ़ मास में — मनाई जाती हैं।
सप्तमी को बनाई गई हलवा-पूरी अष्टमी को भोग के रूप में अर्पित की जाती है; इस दिन चूल्हा नहीं जलाया जाता — इसे बसौड़ा या बसिवटा अष्टमी कहते हैं।
यह परंपरा पिछले करीब 150 वर्षों से मां कल्याणी देवी धाम में अनवरत चली आ रही है।
प्रशासन ने भीड़ प्रबंधन और सुरक्षा के लिए विशेष व्यवस्था की।

प्रयागराज के शक्तिपीठ मां कल्याणी देवी मंदिर में 8 जुलाई 2026 को शीतला अष्टमी के पावन पर्व पर विशेष पूजा-अर्चना और धार्मिक अनुष्ठानों का आयोजन हुआ, जिसमें हजारों की संख्या में श्रद्धालु मां भगवती के दर्शन के लिए उमड़ पड़े। भक्तों ने परिवार की सुख-समृद्धि, अच्छे स्वास्थ्य और मंगल कामना के लिए मां कल्याणी देवी से आशीर्वाद माँगा।

मंदिर की धार्मिक परंपरा और महत्व

शक्तिपीठ मां कल्याणी देवी मंदिर के महासचिव पंडित श्याम जी पाठक ने बताया कि इस धाम में शीतला अष्टमी की परंपरा विशेष महत्व रखती है। उनके अनुसार यहाँ वर्ष में चार शीतला अष्टमी मनाई जाती हैं, जो चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ और आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को पड़ती हैं। यह धार्मिक अनुष्ठान चैत्र मास से आरंभ होता है और आषाढ़ अष्टमी पर इसका समापन होता है।

व्रत और बसौड़ा परंपरा

पंडित पाठक ने बताया कि शीतला अष्टमी पर माताएँ अपने पुत्रों और पतियों की दीर्घायु, स्वास्थ्य और परिवार की खुशहाली की कामना से सप्तमी तिथि को व्रत रखती हैं। परंपरा के अनुसार सप्तमी की रात हलवा-पूरी तैयार की जाती है, जिसे अगले दिन अष्टमी को मां शीतला को भोग के रूप में अर्पित किया जाता है और परिवार के सभी सदस्य इसे प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं।

उन्होंने बताया कि इस परंपरा के अंतर्गत कई घरों में अष्टमी के दिन चूल्हा नहीं जलाया जाता और सप्तमी को बनाए गए भोजन को ही पूरे दिन प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है। इसी कारण इस पर्व को बसौड़ा या बसिवटा अष्टमी भी कहा जाता है।

डेढ़ सौ वर्षों की अखंड परंपरा

पंडित श्याम जी पाठक के अनुसार तीर्थराज प्रयाग में स्थित मां कल्याणी देवी धाम में यह परंपरा पिछले करीब 150 वर्षों से अनवरत चली आ रही है। पूर्वजों के समय से प्रचलित इस धार्मिक अनुष्ठान का आज भी उसी श्रद्धा और विधि-विधान के साथ पालन किया जाता है, जो इस शक्तिपीठ की सांस्कृतिक पहचान को जीवंत बनाए रखता है।

श्रद्धालुओं की भीड़ और प्रशासनिक व्यवस्था

शीतला अष्टमी के अवसर पर मंदिर में सुबह से ही भक्तों की लंबी कतारें देखी गईं। श्रद्धालुओं ने मां कल्याणी देवी के दर्शन किए और विशेष पूजा-अर्चना में भाग लिया। प्रशासन की ओर से भीड़ प्रबंधन और सुरक्षा के लिए विशेष व्यवस्था की गई, ताकि श्रद्धालुओं को किसी प्रकार की असुविधा न हो।

यह आयोजन प्रयागराज की धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत का एक जीवंत प्रमाण है, और आने वाले वर्षों में भी इस परंपरा के उसी उत्साह के साथ जारी रहने की उम्मीद है।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि सामाजिक एकता और पीढ़ी-दर-पीढ़ी सांस्कृतिक हस्तांतरण का माध्यम भी है। हालाँकि बड़े धार्मिक आयोजनों में भीड़ प्रबंधन और बुनियादी सुविधाओं की पर्याप्तता एक स्थायी चुनौती बनी रहती है, जिस पर प्रशासन को दीर्घकालिक योजना बनानी चाहिए।
RashtraPress
8 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

शीतला अष्टमी क्या है और यह कब मनाई जाती है?
शीतला अष्टमी एक हिंदू धार्मिक पर्व है जो मां शीतला की पूजा को समर्पित है। मां कल्याणी देवी धाम, प्रयागराज में यह पर्व वर्ष में चार बार — चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ और आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को — मनाया जाता है।
बसौड़ा या बसिवटा अष्टमी क्यों कहते हैं?
इस परंपरा में सप्तमी की रात को हलवा-पूरी तैयार की जाती है और अष्टमी के दिन उसी 'बासी' भोजन को मां शीतला को भोग लगाया जाता है। अष्टमी के दिन चूल्हा नहीं जलाया जाता, इसीलिए इसे बसौड़ा या बसिवटा अष्टमी कहते हैं।
मां कल्याणी देवी मंदिर में शीतला अष्टमी की परंपरा कितनी पुरानी है?
मंदिर के महासचिव पंडित श्याम जी पाठक के अनुसार यह परंपरा पिछले करीब 150 वर्षों से अनवरत चली आ रही है। पूर्वजों के समय से प्रचलित यह अनुष्ठान आज भी उसी श्रद्धा और विधि-विधान के साथ निभाया जाता है।
शीतला अष्टमी का व्रत कौन रखता है और इसका क्या महत्व है?
यह व्रत मुख्यतः माताएँ अपने पुत्रों और पतियों की दीर्घायु, अच्छे स्वास्थ्य और परिवार की खुशहाली की कामना से रखती हैं। सप्तमी तिथि को व्रत रखकर अष्टमी को मां शीतला की विशेष पूजा की जाती है।
8 जुलाई 2026 को मां कल्याणी देवी मंदिर में क्या विशेष आयोजन हुआ?
8 जुलाई 2026 को आषाढ़ मास की शीतला अष्टमी पर मां कल्याणी देवी मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना और धार्मिक अनुष्ठान आयोजित हुए। हजारों श्रद्धालुओं ने दर्शन किए और प्रशासन ने भीड़ प्रबंधन के लिए विशेष व्यवस्था की।
राष्ट्र प्रेस
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