वट सावित्री व्रत और शनि अमावस्या: प्रयागराज-हरिद्वार में लाखों श्रद्धालुओं ने लगाई आस्था की डुबकी

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वट सावित्री व्रत और शनि अमावस्या: प्रयागराज-हरिद्वार में लाखों श्रद्धालुओं ने लगाई आस्था की डुबकी

सारांश

वट सावित्री व्रत, शनि जयंती और अमावस्या का दुर्लभ त्रिसंयोग 16 मई को देशभर के तीर्थों पर लाखों श्रद्धालुओं को खींच लाया। प्रयागराज के त्रिवेणी संगम से हरिद्वार की हर की पौड़ी तक आस्था का जो सैलाब उमड़ा, वह भारतीय धार्मिक परंपरा की अटूट जीवंतता का प्रमाण है।

मुख्य बातें

16 मई को वट सावित्री व्रत और शनि अमावस्या का दुर्लभ संयोग बना — शनिवार, अमावस्या और शनि जयंती एक साथ पड़े।
प्रयागराज के त्रिवेणी संगम पर लाखों श्रद्धालुओं ने पवित्र स्नान किया; विवाहित महिलाओं ने बरगद पूजन कर पतियों की दीर्घायु की कामना की।
हरिद्वार की हर की पौड़ी पर भी बड़ी संख्या में गंगा स्नान और बरगद पूजन हुआ।
तीर्थ पुरोहित गोपाल गुरु ने इस अमावस्या को बरगदही अमावस्या बताया और इसे अत्यंत शुभ कहा।
अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत रविंद्र पुरी ने वट सावित्री की पौराणिक कथा — सावित्री द्वारा यमराज से सत्यवान के प्राण वापस लाने — का स्मरण कराया।
दिल्ली के नजफगढ़ स्थित श्री राधा कृष्ण मंदिर सहित देशभर के मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना हुई।

वट सावित्री व्रत और शनि अमावस्या के पवित्र संयोग पर शनिवार, 16 मई को देशभर के तीर्थ स्थलों पर श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ पड़ा। प्रयागराज के त्रिवेणी संगम से लेकर हरिद्वार की हर की पौड़ी तक लाखों लोगों ने पवित्र स्नान किया और परिवार व विश्व कल्याण की कामना के साथ पूजा-अर्चना की। धार्मिक दृष्टि से यह दिन इसलिए भी विशेष रहा क्योंकि इस बार शनि देव जयंती, अमावस्या और शनिवार — तीनों का दुर्लभ संयोग एक साथ बना।

प्रयागराज में त्रिवेणी संगम पर उमड़ा जनसैलाब

प्रयागराज में भोर से ही श्रद्धालु त्रिवेणी संगम की ओर रवाना होने लगे। विवाहित महिलाओं ने गंगा-यमुना-सरस्वती के संगम में स्नान के पश्चात बरगद के पेड़ की परिक्रमा कर अपने पतियों की दीर्घायु और सुख-समृद्धि की प्रार्थना की। एक महिला श्रद्धालु ने बताया, 'आज वट सावित्री व्रत है, जिसका बहुत अधिक महत्व होता है। विवाहित महिलाएं यहाँ आती हैं, पूजा-अर्चना करती हैं और धार्मिक अनुष्ठान करती हैं।' एक अन्य श्रद्धालु ने कहा, 'आज हम यहाँ संगम में पवित्र डुबकी लगाने आए हैं। आज शनि अमावस्या है, जो कि एक बहुत ही महत्वपूर्ण अमावस्या मानी जाती है। स्नान करने के बाद, हमने सभी लोगों के कल्याण और पूरे विश्व के मंगल के लिए प्रार्थना की।'

धार्मिक महत्व: बरगदही अमावस्या का पुराना संदर्भ

तीर्थ पुरोहित गोपाल गुरु ने इस अवसर की पौराणिक पृष्ठभूमि स्पष्ट करते हुए कहा, 'आज की अमावस्या को अत्यंत शुभ माना जाता है और इसे बरगदही अमावस्या के नाम से जाना जाता है। पूरे भारत में हिंदू महिलाएं अपने पतियों की लंबी उम्र के लिए व्रत रखती हैं और धार्मिक अनुष्ठान करती हैं। इस दिन महिलाएं बरगद के पेड़ की पूजा करती हैं — यह भी माना जाता है कि ऐसा करने से उनकी स्वयं की आयु में भी वृद्धि होती है। आज भगवान शनि का जन्मोत्सव भी है।' अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत रविंद्र पुरी ने व्रत की पौराणिक कथा का उल्लेख करते हुए कहा, 'जब सत्यवान का जीवन समाप्त होने वाला था, तब देवी सावित्री ने यह व्रत रखा था और तब से यह परंपरा चली आ रही है। वह अपने पति का जीवन यमराज से वापस ले आई थीं।' उन्होंने आगे जोड़ा कि आज शनिवार, अमावस्या और शनि जयंती का संयोग इस दिन को असाधारण रूप से विशेष बनाता है।

हरिद्वार में हर की पौड़ी पर गंगा स्नान

हरिद्वार की हर की पौड़ी पर भी बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने गंगा स्नान किया। सुहागिन महिलाओं ने बरगद के पेड़ों के समीप पारंपरिक विधि-विधान से पूजा कर अपने पतियों की दीर्घायु की मनोकामना की। एक महिला श्रद्धालु ने कहा, 'आज के दिन बरगद की पूजा होती है। सुहागिन महिलाएं स्नान करती हैं, अपने पतियों की लंबी उम्र के लिए व्रत रखती हैं और पूजा-अर्चना करती हैं।' गंगा तट पर श्रद्धालुओं की कतारें सुबह से ही लगी रहीं और सायंकालीन आरती तक भीड़ बनी रही।

दिल्ली के मंदिरों में विशेष आयोजन

दिल्ली के नजफगढ़ स्थित श्री राधा कृष्ण मंदिर में भी सुबह से श्रद्धालुओं की उपस्थिति रही। महिलाओं ने पारंपरिक वेशभूषा में व्रत और पूजा-अर्चना की। गौरतलब है कि यह ऐसे समय में आया है जब देशभर में धार्मिक पर्वों पर तीर्थ स्थलों पर भीड़ प्रबंधन एक महत्वपूर्ण विषय बना हुआ है।

आगे का दृष्टिकोण

वट सावित्री व्रत और शनि अमावस्या जैसे पर्वों पर तीर्थ स्थलों पर उमड़ने वाली भीड़ न केवल आस्था का प्रतीक है, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक एकता की भी अभिव्यक्ति है। प्रशासन और मंदिर समितियाँ आने वाले वर्षों में बेहतर भीड़ प्रबंधन की दिशा में कार्यरत हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन मुख्यधारा की कवरेज अक्सर भीड़ के दृश्यों तक सिमट जाती है। असली सवाल यह है कि इतनी बड़ी धार्मिक भीड़ के लिए तीर्थ स्थलों पर बुनियादी ढाँचा — सुरक्षा, स्वच्छता, चिकित्सा सुविधा — कितना पर्याप्त है। प्रयागराज में महाकुंभ के बाद भी भीड़ प्रबंधन की चुनौतियाँ बनी हुई हैं, और हर बड़े धार्मिक अवसर पर यह सवाल फिर उठता है। आस्था की यह शक्ति तब और सार्थक होगी जब प्रशासनिक तैयारी उसके अनुरूप हो।
RashtraPress
16 मई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

वट सावित्री व्रत क्या है और यह कब मनाया जाता है?
वट सावित्री व्रत हिंदू विवाहित महिलाओं द्वारा अपने पतियों की दीर्घायु के लिए रखा जाने वाला व्रत है, जो ज्येष्ठ मास की अमावस्या को मनाया जाता है। इस दिन महिलाएं बरगद के पेड़ की पूजा करती हैं और उपवास रखती हैं। 2025 में यह व्रत 16 मई को पड़ा।
शनि अमावस्या का क्या महत्व है?
शनि अमावस्या वह अमावस्या है जो शनिवार के दिन पड़ती है और इसे शनि देव की उपासना के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है। 16 मई 2025 को यह अमावस्या शनि जयंती के साथ भी संयोग में रही, जिससे इसका धार्मिक महत्व और बढ़ गया।
प्रयागराज के त्रिवेणी संगम पर वट सावित्री व्रत पर क्या होता है?
त्रिवेणी संगम पर विवाहित महिलाएं गंगा-यमुना-सरस्वती के पवित्र जल में स्नान करती हैं और फिर बरगद के पेड़ की परिक्रमा कर पतियों की दीर्घायु की प्रार्थना करती हैं। इस अवसर पर लाखों श्रद्धालु संगम तट पर एकत्र होते हैं।
बरगदही अमावस्या क्या है?
तीर्थ पुरोहितों के अनुसार, वट सावित्री व्रत वाली अमावस्या को बरगदही अमावस्या कहते हैं क्योंकि इस दिन बरगद यानी वट वृक्ष की पूजा का विशेष विधान है। मान्यता है कि इस पूजा से महिलाओं की स्वयं की आयु में भी वृद्धि होती है।
वट सावित्री व्रत की पौराणिक कथा क्या है?
पौराणिक कथा के अनुसार, देवी सावित्री ने यमराज से अपने पति सत्यवान के प्राण वापस लाने के लिए यह व्रत रखा था। अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत रविंद्र पुरी के अनुसार, तभी से यह परंपरा चली आ रही है और विवाहित महिलाएं पति की दीर्घायु के लिए इस व्रत को मनाती हैं।
राष्ट्र प्रेस
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