16 मई: वट सावित्री व्रत और शनि जन्मोत्सव एक साथ, जानें शुभ मुहूर्त और अशुभ काल
सारांश
मुख्य बातें
16 मई 2025 को सनातन धर्म के दो महत्वपूर्ण पर्व एकसाथ मनाए जाएंगे — वट सावित्री व्रत और शनि जन्मोत्सव। ज्येष्ठ कृष्ण अमावस्या के इस संयोग पर विवाहित महिलाएं पति की दीर्घायु, सुख और आरोग्य की कामना से व्रत रखेंगी, जबकि शनिभक्त शनिदेव की विशेष पूजा-अर्चना करेंगे।
वट सावित्री व्रत का महत्व और पौराणिक संदर्भ
धर्मशास्त्रों के अनुसार, सावित्री ने अपने पति सत्यवान के प्राण यमराज से वापस दिलाने के लिए अपनी बुद्धि और अटूट भक्ति का परिचय दिया था। इसी पौराणिक कथा की स्मृति में सुहागिन स्त्रियाँ वट वृक्ष (बरगद) की जड़ में जल, पुष्प, अक्षत और फल अर्पित कर पूजा करती हैं। मान्यता है कि इस व्रत से पारिवारिक सुख और वैवाहिक जीवन में स्थिरता आती है।
शनि जन्मोत्सव: पूजा विधि और दान का महत्व
शनि जयंती पर शनि दोष और साढ़े साती के प्रभाव को कम करने के लिए शनि शांति पूजा और तेलाभिषेक का विशेष विधान है। धर्माचार्यों के अनुसार, इस दिन काले तिल, सरसों का तेल और लोहे की वस्तुएं दान करने से शनिदेव की कृपा प्राप्त होती है। हवन और दीप-दान भी शुभ माने जाते हैं।
अमावस्या तिथि और सूर्योदय-सूर्यास्त का समय
दृक पंचांग के अनुसार, अमावस्या तिथि 16 मई को प्रातः 5 बजकर 11 मिनट से आरंभ होगी और 17 मई की रात्रि 1 बजकर 30 मिनट तक रहेगी। सूर्योदय प्रातः 5 बजकर 30 मिनट पर और सूर्यास्त सायं 7 बजकर 5 मिनट पर होगा।
शुभ मुहूर्त और योग
पंचांग के अनुसार 16 मई के प्रमुख शुभ काल इस प्रकार हैं:
ब्रह्म मुहूर्त: प्रातः 4:07 से 4:48 बजे तक। अभिजीत मुहूर्त: दोपहर 11:50 से 12:45 बजे तक। विजय मुहूर्त: दोपहर 2:34 से 3:28 बजे तक। अमृत काल: दोपहर 1:15 से 2:40 बजे तक। गोधूलि मुहूर्त: सायं 7:04 से 7:25 बजे तक। इस दिन पूरे दिन आडल योग रहेगा।
अशुभ काल — इन समयों में पूजा से बचें
पंचांग के अनुसार 16 मई के अशुभ समय इस प्रकार हैं:
राहुकाल: प्रातः 8:54 से 10:36 बजे तक। यमगंड: दोपहर 2:00 से 3:42 बजे तक। गुलिक काल: प्रातः 5:30 से 7:12 बजे तक। दुर्मुहूर्त: प्रातः 5:30 से 6:24 बजे तक और 6:24 से 7:19 बजे तक। इन कालों में शुभ कार्य, पूजा-पाठ और व्रत-संकल्प से परहेज करना उचित माना जाता है।
धर्मशास्त्रों के अनुसार, इन दोनों व्रतों और पूजाओं के एकसाथ पड़ने से इस दिन का धार्मिक महत्व और भी बढ़ जाता है। श्रद्धालु शुभ मुहूर्त का लाभ उठाकर पूजा-अर्चना कर सकते हैं।