शीतलाष्टमी पर कल्याणी देवी मंदिर में श्रद्धालुओं की भारी भीड़, 150 वर्षों की ऐतिहासिक परंपरा

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शीतलाष्टमी पर कल्याणी देवी मंदिर में श्रद्धालुओं की भारी भीड़, 150 वर्षों की ऐतिहासिक परंपरा

सारांश

प्रयागराज में शीतलाष्टमी पर कल्याणी देवी मंदिर में हजारों श्रद्धालुओं का समागम हुआ। इस बार का मेला 150 वर्षों की परंपरा का प्रतीक है। जानिए इस पर्व का महत्व और यहां की विशेष परंपराएं।

मुख्य बातें

शीतलाष्टमी का पर्व धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व रखता है।
150 वर्षों से चल रही परंपरा ने इसे खास बना दिया है।
श्रद्धालु बासी भोजन का भोग मां को अर्पित करते हैं।
इस दिन माता के दर्शन के लिए बड़ी संख्या में लोग आते हैं।
मंदिर में विभिन्न प्रकार के सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित होते हैं।

प्रयागराज, 11 मार्च (राष्ट्र प्रेस)। शीतलाष्टमी के पर्व पर शक्तिपीठ मां कल्याणी देवी मंदिर में श्रद्धालुओं की एक बड़ी भीड़ जुटी हुई है। अनेक श्रद्धालु माता के दर्शन के लिए आ रहे हैं। शक्तिपीठ मां कल्याणी देवी मंदिर के महासचिव पंडित श्याम जी पाठक के अनुसार, यह मेला पिछले लगभग 150 वर्षों से यहां आयोजित किया जा रहा है। इस उत्सव को शीतला अष्टमी के रूप में जाना जाता है।

मेले के महत्व को बताते हुए उन्होंने कहा कि सप्तमी तिथि को माताएं अपने पुत्रों के लिए मंगलकामना हेतु व्रत करती हैं और पूड़ी आदि बनाकर मां को भोग अर्पित करती हैं। पूरा परिवार इसी प्रसाद का सेवन करता है। इस दिन माताएं अपने घरों में चूल्हा नहीं जलाती हैं। यह परंपरा पिछले 150 वर्षों से चली आ रही है। उन्होंने बताया कि आज के दिन लगभग एक लाख लोग मां के दर्शन करने आते हैं।

पंडित जी ने कहा कि यहां पर देवी जागरण, बिरहा और नौटंकी पारंपरिक रूप से आयोजित की जाती है। उन्होंने बताया कि ढोल और बैंड बाजे के साथ श्रद्धालु निशान लेकर आते हैं। पूरे दिन विभिन्न प्रकार के आयोजन होते हैं और रातभर मां का कपाट खुला रहता है। उन्होंने कहा कि कल दोपहर एक बजे मां का पट बंद किया जाएगा।

मां के दर्शन करने आई एक महिला श्रद्धालु ने राष्ट्र प्रेस से कहा कि आज का महत्व यह है कि पुत्रों की प्राप्ति के लिए व्रत रखा जाता है। भोर में ही पूरी-हलवा भगवान को भोग लगाने के लिए बनाया जाता है। एक और महिला श्रद्धालु ने कहा कि आज के दिन संतान के लिए उपवास रखा जाता है ताकि बच्चे का जीवन सुखद हो।

यह उल्लेखनीय है कि मां शीतला का व्रत चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है, जिसे शीतला सप्तमी या बासौड़ा के नाम से भी जाना जाता है। यह व्रत मुख्यतः आरोग्य, स्वास्थ्य और रोगों से मुक्ति के लिए किया जाता है। इस दिन ताजा गर्म भोजन नहीं बनाया जाता। एक दिन पहले (षष्ठी या सप्तमी की शाम) को बना बासी (ठंडा) भोजन ही मां को भोग लगाया जाता है और परिवार भी वही खाता है। यह शीतलता का प्रतीक है और मां को प्रसन्न करने का एक महत्वपूर्ण विधान है।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि इसका ऐतिहासिक महत्व भी है। 150 वर्षों से चल रही इस परंपरा ने न केवल स्थानीय बल्कि दूर-दूर से श्रद्धालुओं को आकर्षित किया है। इस तरह के मेलों से हमारी संस्कृति और धार्मिकता को भी बल मिलता है।
RashtraPress
13 मई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

यह पर्व कब मनाया जाता है?
यह पर्व चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है।
इस दिन क्या विशेषताएँ होती हैं?
इस दिन माताएं व्रत रखकर बासी भोजन का भोग मां को अर्पित करती हैं।
कल्याणी देवी मंदिर का महत्व क्या है?
यह मंदिर शक्तिपीठ है और यहां 150 वर्षों से शीतलाष्टमी का मेला आयोजित होता है।
मेले में कितने लोग आते हैं?
इस दिन लगभग एक लाख श्रद्धालु मां के दर्शन करने आते हैं।
राष्ट्र प्रेस
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