क्या प्रशासन का काम सराहनीय है? स्वामी सर्वानंद ने जताया दुख
सारांश
Key Takeaways
- स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के साथ विवाद ने मेला में हलचल मचाई।
- स्वामी अनंतानंद ने प्रशासन की सराहना की।
- भगदड़ के खतरे के प्रति चेतावनी दी गई।
- महान संतों द्वारा गंगा की पूजा का महत्व बताया गया।
- कुंभ मेले के अनुभव साझा किए गए।
प्रयागराज, 22 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। प्रयागराज के संगम में आयोजित माघ मेले में ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के साथ हुए विवाद ने हंगामा खड़ा कर दिया है। इस मुद्दे पर उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ से महंत स्वामी अनंतानंद और उत्तराखंड से स्वामी सर्वानंद ने अपनी राय व्यक्त की।
संगम घाट पर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और अधिकारियों के बीच विवाद को लेकर स्वामी अनंतानंद ने टिप्पणी की, "मेले में और अब रास्ते में बैरियर लगाए गए हैं। सही या गलत का पता तब चलेगा जब लोग वहां जाकर देखेंगे कि क्या हो रहा है। उन्होंने सड़क को रोका है और वहीं बैठे हैं। अगर मैं जिम्मेदार होता तो केवल नोटिस नहीं देता बल्कि सीधे कार्रवाई करता।"
स्वामी अनंतानंद ने प्रशासन की प्रशंसा करते हुए कहा कि वे अच्छी तरह से काम कर रहे हैं। उन्होंने पिछले कुंभ मेले की रिपोर्ट का उल्लेख करते हुए कहा कि कुछ लोग यह कहते हैं कि संगम नोज में ही स्नान का महत्व है। उन्होंने कहा, "ब्रह्मा का एक दिन पृथ्वी के 1 करोड़ दिनों के समान है।"
स्वामी अनंतानंद ने दुख व्यक्त करते हुए कहा कि सरकारों द्वारा पोषित कुछ लोग ऐसे बयान देते हैं। उन्होंने "हिंदू आतंकवाद" जैसे शब्दों का उल्लेख करते हुए पूछा कि उस समय अविमुक्तेश्वरानंद और उनके गुरुजी कहां थे जब हिंदुओं को आतंकवाद कहा जा रहा था। उन्होंने क्यों नहीं कहा कि हिंदू कभी आतंकवादी नहीं हो सकते?
स्वामी सर्वानंद ने इस घटना पर गहरा दुख जताया। उन्होंने कहा, "रामभद्राचार्य महाराज इतने महान विद्वान हैं कि उन्होंने अपने पूरे जीवन से अधिक समय ध्यान, चिंतन और साधना में बिताया है। वे कभी भावनाओं में आकर कोई बात नहीं कहेंगे। हम सभी उनके शब्दों का आध्यात्मिक दृष्टिकोण से सम्मान करते हैं।"
स्वामी सर्वानंद ने आगे कहा कि प्राचीन काल से महान संत और ऋषि मां गंगा की पूजा और श्रद्धा करते आए हैं। उन्होंने कहा, "13 अखाड़ों के संत गंगा स्नान के लिए 50 से 100 फीट दूर से चलकर आते हैं। इस वर्ष का माघ मेला दिल को दुख देने वाला और पीड़ा भरा रहा। शास्त्रों में माघ स्नान का विशेष महत्व है, विशेषकर कुंभ जैसे मेलों में शाही स्नान की परंपरा है।"
महंत ने साल 2025 के कुंभ मेले की घटना को याद करते हुए कहा, "पिछली बार कुंभ मेले में साधु-संतों ने अभिमान त्यागकर पहले सर्व साधारण को स्नान करने दिया और बाद में खुद स्नान किया। यह साधु-संतों की महिमा है कि वे जनता, भारत और धर्म को प्राथमिकता देते हैं। इस बार जो हुआ, वह मन को बहुत पीड़ा देने वाला है। यदि प्रशासन मदद नहीं करता तो कुंभ जैसी भगदड़ हो सकती थी और कई जानें जा सकती थीं।"