क्या प्रियंका चतुर्वेदी ने जेएनयू विवाद की निंदा की? ऐसी नारेबाजी वास्तविक मुद्दों से ध्यान भटका देती है

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क्या प्रियंका चतुर्वेदी ने जेएनयू विवाद की निंदा की? ऐसी नारेबाजी वास्तविक मुद्दों से ध्यान भटका देती है

सारांश

प्रियंका चतुर्वेदी ने जेएनयू में विवादास्पद नारों की निंदा की है। क्या यह नारेबाजी वास्तविक मुद्दों से ध्यान भटकाने का एक तरीका है? जानिए इस मुद्दे पर उनके विचार और प्रशासन की सख्त कार्रवाई के पीछे की वजहें।

Key Takeaways

  • जेएनयू में विवादास्पद नारेबाजी की निंदा।
  • प्रशासन की सख्त कार्रवाई की आवश्यकता।
  • छात्रों के खिलाफ बेबुनियाद आरोप लगाना अनुचित।
  • लोकतंत्र की बुनियाद को बनाए रखना आवश्यक।
  • राजनीतिक मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता।

नई दिल्ली, 7 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) परिसर में उठे विवादास्पद नारों को लेकर प्रशासन ने कड़ा रुख अपनाया है। प्रशासन ने स्पष्ट रूप से कहा है कि जेएनयू को नफरत की पाठशाला नहीं बनने दिया जाएगा। इस मामले पर शिवसेना (यूबीटी) की सांसद प्रियंका चतुर्वेदी ने नारेबाजी की निंदा की। उन्होंने छात्रों पर की जा रही व्यापक कार्रवाई और बयानों पर भी सवाल उठाए।

प्रियंका चतुर्वेदी ने राष्ट्र प्रेस के साथ बातचीत में कहा कि जो नारें लगाए गए हैं, वे पूरी तरह से गलत हैं और उनका समर्थन नहीं किया जा सकता। विपक्ष के पास सरकार से संबंधित कई महत्वपूर्ण मुद्दे और जनहित से जुड़े सवाल हैं, लेकिन इस प्रकार की नारेबाजी उन वास्तविक मुद्दों से ध्यान भटका देती है। प्रियंका चतुर्वेदी के अनुसार, ऐसे घटनाक्रम भारतीय जनता पार्टी को अपनी जवाबदेही से बचने का एक और मौका दे देते हैं। यदि कानून का उल्लंघन हुआ है तो एफआईआर दर्ज होनी चाहिए और सभी कानूनी प्रक्रियाओं का पालन किया जाना चाहिए, लेकिन कार्रवाई संतुलित और तथ्यों के आधार पर होनी चाहिए।

शिवसेना (यूबीटी) सांसद ने छात्रों पर लगाए जा रहे आरोपों पर भी आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि छात्रों पर बेबुनियाद आरोप लगाना और पूरे विश्वविद्यालय को ‘नफरत की पाठशाला’ कहकर उसकी छवि को धूमिल करना उचित नहीं है। यदि कुछ छात्रों ने गलत नारे लगाए हैं तो कार्रवाई उन्हीं तक सीमित रहनी चाहिए। पूरे छात्र समुदाय या संस्थान को बदनाम करना न तो न्यायसंगत है और न ही लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप।

वहीं, उत्तर प्रदेश में एसआईआर ड्राफ्ट वोटर लिस्ट 2026 के तहत 2.89 करोड़ मतदाताओं के नाम हटाए जाने को लेकर प्रियंका चतुर्वेदी ने गंभीर सवाल खड़े किए। उन्होंने कहा कि इस सूची से एक मौजूदा सांसद का नाम तक हटा दिया गया है, जो इस पूरी प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर सवाल उठाता है। उन्होंने आरोप लगाया कि यूपी में एसआईआर के पीछे की मंशा को समझना जरूरी है और यही स्थिति तब भी देखने को मिलेगी, जब महाराष्ट्र में एसआईआर लागू किया जाएगा।

प्रियंका चतुर्वेदी ने कहा कि एसआईआर जैसे मुद्दों को एक कानूनी आवश्यकता और आधिकारिक जिम्मेदारी के नाम पर राजनीतिक हथकंडे की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि इस प्रक्रिया के जरिए विपक्षी दलों के वोटरों के नाम मतदाता सूची से हटाए जा रहे हैं, जिससे उन्हें अपने मताधिकार से वंचित किया जा सके। उन्होंने इसे बेहद दुर्भाग्यपूर्ण बताया और कहा कि इससे लोकतंत्र की बुनियाद कमजोर होती है। साथ ही उन्होंने यह सवाल भी उठाया कि क्या चुनाव आयोग देश और प्रदेश के नागरिकों के हित में काम कर रहा है या फिर केवल भारतीय जनता पार्टी के हितों की रक्षा कर रहा है।

Point of View

यह स्पष्ट है कि इस प्रकार की घटनाएं न केवल विश्वविद्यालयों की छवि को प्रभावित करती हैं, बल्कि यह समग्र समाज में भी विभाजन पैदा करती हैं। हमें हमेशा लोकतांत्रिक मूल्यों का पालन करना चाहिए और किसी भी प्रकार की नारेबाजी को अस्वीकार करना चाहिए जो वास्तविक मुद्दों से ध्यान भटकाती है।
NationPress
08/01/2026

Frequently Asked Questions

प्रियंका चतुर्वेदी ने जेएनयू विवाद पर क्या कहा?
प्रियंका चतुर्वेदी ने नारेबाजी की निंदा की और कहा कि यह वास्तविक मुद्दों से ध्यान भटका देती है।
क्या प्रशासन ने कोई कार्रवाई की है?
हां, प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि जेएनयू को नफरत की पाठशाला नहीं बनने दिया जाएगा।
प्रियंका चतुर्वेदी का मानना क्या है?
वह मानती हैं कि छात्रों पर बेबुनियाद आरोप लगाना और पूरे विश्वविद्यालय को बदनाम करना उचित नहीं है।
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