प्रोसेस्ड फूड और सुस्त जीवनशैली भारत में मेटाबोलिक संकट की जड़: डॉ. राकेश कलापाला
सारांश
मुख्य बातें
हैदराबाद स्थित著名 गैस्ट्रोएंटरोलॉजिस्ट डॉ. राकेश कलापाला ने चेतावनी दी है कि प्रोसेस्ड फूड की बढ़ती खपत, शारीरिक निष्क्रियता और अनियंत्रित तनाव मिलकर भारत की मेटाबोलिक सेहत को गहरी चोट पहुँचा रहे हैं। एशियन इंस्टीट्यूट ऑफ गैस्ट्रोएंटरोलॉजी (AIG हॉस्पिटल्स) में सेंटर फॉर ओबेसिटी एंड मेटाबोलिक थेरेपी के निदेशक के रूप में कार्यरत डॉ. कलापाला ने 4 अगस्त को दिए एक विशेष साक्षात्कार में यह बात कही।
मोटापा: सिर्फ वजन नहीं, एक जटिल बीमारी
डॉ. कलापाला, जो अमेरिकन बैरिएट्रिक एंडोस्कोपी के वाइस चेयर और अमेरिकन, यूरोपियन तथा जापानी एंडोस्कोपी सोसाइटीज़ के फेलो भी हैं, ने स्पष्ट किया कि मोटापे को अब एक अलग-थलग समस्या के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। उनके अनुसार यह एक जटिल मेटाबोलिक बीमारी है जो 'सिर से पैर तक' शरीर के अंगों को प्रभावित करती है।
उन्होंने बताया कि अत्यधिक कार्बोहाइड्रेट, खराब वसा और परिष्कृत शर्करा से भरपूर प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थ अब शहरी और ग्रामीण, दोनों बाज़ारों में समान रूप से उपलब्ध हैं और बड़े पैमाने पर खाए जा रहे हैं।
प्रोसेस्ड फूड कैसे बिगाड़ता है मेटाबोलिज्म
डॉ. कलापाला ने समझाया, 'प्रोसेस्ड फूड खुद ही क्रेविंग बढ़ा देगा क्योंकि पेट देर से भरता है। एक बार जब आप ये फूड खाते हैं, जिनमें ज्यादा कार्ब्स, ज्यादा फैट, और वो भी बिना प्रोटीन वाला खराब फैट होता है, तो यह शरीर की मेटाबोलिक हेल्थ पर बुरा असर डालता है, जिससे वजन बढ़ना, फैटी लिवर, डायबिटीज और दूसरी सिस्टमिक दिक्कतें हो सकती हैं।'
उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि जो लोग खुद को पूर्णतः शाकाहारी या मदिरा से दूर मानते हैं, वे भी मेटाबोलिक विकारों की चपेट में आ रहे हैं। फैटी लिवर विशेष रूप से चिंताजनक है क्योंकि यह अल्ट्रासाउंड या लिवर फंक्शन टेस्ट तक लक्षणहीन रहता है — और जब तक पता चलता है, तब तक नुकसान हो चुका होता है।
तनाव और युवा पीढ़ी पर बढ़ता खतरा
डॉ. कलापाला के अनुसार, आधुनिक जीवन का तनाव 'गट-ब्रेन एक्सिस' के माध्यम से इस संकट को और गहरा करता है। तनाव न केवल अत्यधिक खाने की प्रवृत्ति को बढ़ावा देता है, बल्कि शारीरिक गतिविधि को भी कम करता है।
ICMR और नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे के आँकड़ों का हवाला देते हुए उन्होंने बताया कि भारत में बचपन में मोटापे की दर 15 से 18 प्रतिशत तक पहुँच चुकी है। गौरतलब है कि इसकी जड़ें प्रायः गर्भावस्था में ही पड़ जाती हैं — यदि माँ का वजन गर्भावस्था के दौरान अधिक हो, तो यह प्रवृत्ति शिशु में भी स्थानांतरित हो सकती है। पढ़ाई का दबाव और खेल के मैदानों की कमी किशोरावस्था में ही गंभीर मेटाबोलिक बदलावों को जन्म दे रही है।
एंटासिड का अंधाधुंध इस्तेमाल और कैंसर का जोखिम
डॉ. कलापाला ने गैस्ट्रोइसोफेगल रिफ्लक्स डिजीज (GERD) के लिए एसिड रिफ्लक्स दवाओं की बेरोकटोक, ओवर-द-काउंटर उपलब्धता पर गंभीर चिंता व्यक्त की। चिकित्सा साहित्य के अनुसार, एंटासिड का दीर्घकालिक और अनियंत्रित उपयोग हड्डियों और किडनी की सेहत पर प्रतिकूल असर डाल सकता है और गैस्ट्रिक कैंसर के जोखिम से भी जोड़ा गया है।
उन्होंने यह भी बताया कि कोलोनिक पॉलीप्स पश्चिमी देशों की तुलना में भारत में कम हैं, लेकिन कोलन कैंसर के मामले अब 30 से 40 वर्ष की आयु में भी देखे जा रहे हैं। बिना उपचार के GERD, हेपेटाइटिस से जुड़ा सिरोसिस और धूम्रपान गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल कैंसर के जोखिम को और बढ़ा देते हैं। समाज में पेट की समस्याओं को लेकर फैली भ्रांतियाँ मरीज़ों को गंभीर लक्षण — जैसे रक्तस्राव या काला मल — आने तक इलाज से दूर रखती हैं।
समाधान: '10 का नियम' और चार सूत्री जीवनशैली
डॉ. कलापाला ने '10 का नियम' का सुझाव दिया, जो प्रधानमंत्री के तेल और प्रोसेस्ड फूड की खपत को 10 प्रतिशत तक घटाने के राष्ट्रीय सार्वजनिक स्वास्थ्य लक्ष्य से मेल खाता है। उन्होंने कहा, 'अगर आप मोटे हैं, तो बस 10 प्रतिशत वजन कम करें — इससे भी स्वास्थ्य पर सकारात्मक असर पड़ेगा।'
उन्होंने चार व्यावहारिक सुझाव दिए: पहला, लंबे समय तक बैठे रहने को 'पैसिव स्मोकिंग' जितना हानिकारक मानते हुए हर 30 से 60 मिनट में एक-दो मिनट का वॉकिंग ब्रेक लेना; दूसरा, मात्रा से अधिक गुणवत्ता को प्राथमिकता देते हुए उच्च-फाइबर, साबुत खाद्य पदार्थों को अपनाना और मीठे पेय पदार्थों से परहेज़ करना; तीसरा, तनाव प्रबंधन को सक्रिय रूप से अपनाना; और चौथा, नियमित स्वास्थ्य जाँच तथा AI-संचालित मॉनिटरिंग टूल्स के माध्यम से निवारक और प्रिसिजन मेडिसिन को अपनाना।
वजन घटाने के उपायों पर बात करते हुए उन्होंने बताया कि GLP-1 रिसेप्टर एगोनिस्ट दवाएँ भूख को प्रभावी रूप से नियंत्रित करती हैं, लेकिन इन्हें बंद करने पर वजन पुनः बढ़ सकता है। अधिक जटिल मामलों में एंडोस्कोपिक स्लीव गैस्ट्रोप्लास्टी (ESG) जैसी एडवांस्ड एंडोबेरिएट्रिक प्रक्रियाएँ — जो बिना सर्जिकल चीरे के पेट का आकार कम करती हैं — एक विकल्प हो सकती हैं।
यह ऐसे समय में आया है जब भारत में गैर-संचारी रोगों (NCDs) का बोझ तेज़ी से बढ़ रहा है और स्वास्थ्य नीति निर्माता जीवनशैली-जनित बीमारियों की रोकथाम को प्राथमिकता देने पर विचार कर रहे हैं।