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प्रोसेस्ड फूड और सुस्त जीवनशैली भारतीयों की मेटाबोलिक हेल्थ को कर रहे बर्बाद: डॉ. राकेश कलापाला

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प्रोसेस्ड फूड और सुस्त जीवनशैली भारतीयों की मेटाबोलिक हेल्थ को कर रहे बर्बाद: डॉ. राकेश कलापाला

सारांश

हैदराबाद के वरिष्ठ गैस्ट्रोएंटरोलॉजिस्ट डॉ. राकेश कलापाला की चेतावनी — प्रोसेस्ड फूड, तनाव और निष्क्रियता मिलकर भारत में फैटी लिवर, डायबिटीज और यहाँ तक कि युवाओं में कोलोरेक्टल कैंसर को बढ़ावा दे रहे हैं। ICMR के अनुसार बचपन में मोटापे की दर 15-18% तक पहुँच चुकी है।

मुख्य बातें

राकेश कलापाला (AIG हॉस्पिटल्स, हैदराबाद) के अनुसार मोटापा अब एक जटिल मेटाबोलिक बीमारी है जो 'सिर से पैर तक' अंगों को प्रभावित करती है।
ICMR और नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे के आँकड़ों के अनुसार भारत में बचपन में मोटापे की दर 15 से 18 प्रतिशत तक पहुँच चुकी है।
फैटी लिवर अक्सर तब तक अनजान रहता है जब तक अल्ट्रासाउंड या लिवर फंक्शन टेस्ट में सामने नहीं आता — तब तक अंग को नुकसान हो चुका होता है।
एंटासिड का दीर्घकालिक बिना निगरानी के उपयोग हड्डियों, किडनी को नुकसान और गैस्ट्रिक कैंसर के जोखिम से जुड़ा है।
'10 का नियम' : केवल 10 प्रतिशत वजन कम करना भी मेटाबोलिक स्वास्थ्य पर सकारात्मक प्रभाव डाल सकता है।
GLP-1 एगोनिस्ट दवाएँ प्रभावी हैं, लेकिन बंद करने पर वजन फिर बढ़ सकता है; गंभीर मामलों में ESG एक विकल्प है।

हैदराबाद स्थित著名 गैस्ट्रोएंटरोलॉजिस्ट डॉ. राकेश कलापाला ने चेतावनी दी है कि बदलती खान-पान की आदतें, अत्यधिक प्रोसेस्ड फूड का सेवन और व्यापक रूप से फैली निष्क्रिय जीवनशैली भारत की मेटाबोलिक हेल्थ के लिए गंभीर खतरा बन चुकी हैं। एशियन इंस्टीट्यूट ऑफ गैस्ट्रोएंटरोलॉजी (AIG हॉस्पिटल्स) में कंसल्टेंट गैस्ट्रोएंटरोलॉजिस्ट और सेंटर फॉर ओबेसिटी एंड मेटाबोलिक थेरेपी के डायरेक्टर डॉ. कलापाला के अनुसार, मोटापे को अब एक अलग समस्या के रूप में नहीं, बल्कि एक जटिल मेटाबोलिक बीमारी के रूप में देखा जाना चाहिए जो 'सिर से पैर तक' शरीर के अंगों को प्रभावित करती है।

प्रोसेस्ड फूड का मेटाबोलिक स्वास्थ्य पर असर

डॉ. कलापाला ने बताया कि अधिक कार्बोहाइड्रेट, खराब फैट और रिफाइंड शुगर से भरे अल्ट्रा-प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थ अब शहरी और ग्रामीण दोनों बाज़ारों में आसानी से उपलब्ध हैं। उनके अनुसार, अमेरिकन बैरिएट्रिक एंडोस्कोपी के वाइस चेयर और अमेरिकन, यूरोपियन तथा जापानी एंडोस्कोपी सोसाइटीज़ के फेलो डॉ. कलापाला ने कहा, 'प्रोसेस्ड फूड खुद ही क्रेविंग बढ़ा देगा क्योंकि पेट देर से भरता है। एक बार जब आप ये फूड खाते हैं, जिनमें ज्यादा कार्ब्स, ज्यादा फैट, और वो भी बिना प्रोटीन वाला खराब फैट होता है, तो यह शरीर की मेटाबोलिक हेल्थ पर बुरा असर डालता है, जिससे वजन बढ़ना, फैटी लिवर, डायबिटीज और दूसरी सिस्टमिक दिक्कतें हो सकती हैं।'

उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि जो लोग खुद को पूर्णतः शाकाहारी या मद्यपान न करने वाला मानते हैं, वे भी मेटाबोलिक डिसऑर्डर से अछूते नहीं हैं। यह ऐसे समय में आया है जब भारत में गैर-संचारी रोगों का बोझ तेज़ी से बढ़ रहा है।

फैटी लिवर और स्ट्रेस का घातक संयोग

डॉ. कलापाला ने बताया कि खान-पान में बदलाव, निष्क्रिय जीवनशैली और अत्यधिक तनाव मिलकर फैटी लिवर जैसी गंभीर स्थिति पैदा करते हैं। उनके अनुसार, 'लिवर में फैट होने पर यह तब तक शांत रहता है जब तक अल्ट्रासाउंड या लिवर फंक्शन टेस्ट से पता नहीं चलता। जब तक किसी को पता चलता है, तब तक लिवर पहले ही डैमेज हो चुका होता है।' उन्होंने यह भी कहा कि तनाव पेट-ब्रेन एक्सिस के ज़रिए इस संकट को और गहरा कर देता है — 'स्ट्रेस एक ऐसी चीज है जो लोगों को ज्यादा खाने के लिए उकसाएगी,' जबकि शारीरिक गतिविधि को कम करती है।

बचपन में मोटापा: गर्भ से शुरू होती है समस्या

युवा पीढ़ी पर बात करते हुए डॉ. कलापाला ने ICMR और नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे के आँकड़ों का हवाला दिया, जिनके अनुसार भारत में बचपन में मोटापे की दर 15 से 18 प्रतिशत तक पहुँच चुकी है। गौरतलब है कि उन्होंने इस समस्या की जड़ें गर्भावस्था में ही बताईं — 'अगर प्रेग्नेंसी के दौरान माँ का वजन ज्यादा है, तो वही चीज बच्चे में पहुँचती है, तभी से बचपन में मोटापा शुरू हो जाता है।' पढ़ाई के दबाव और स्कूलों में खेल के मैदानों की कमी के चलते बच्चे किशोरावस्था में ही गंभीर मेटाबोलिक बदलावों का सामना करने लगते हैं।

एंटासिड के अंधाधुंध इस्तेमाल पर चेतावनी

डॉ. कलापाला ने गैस्ट्रोइसोफेगल रिफ्लक्स डिजीज (GERD) के लिए एसिड रिफ्लक्स दवाओं की बिना निगरानी के ओवर-द-काउंटर उपलब्धता पर गंभीर चिंता जताई। उनके अनुसार, एंटासिड का दीर्घकालिक और बिना निगरानी के उपयोग हड्डियों और किडनी की सेहत को नुकसान पहुँचा सकता है। मेडिकल साहित्य में इनके लंबे समय तक इस्तेमाल को गैस्ट्रिक कैंसर के बढ़ते जोखिम से भी जोड़ा गया है। उन्होंने यह भी बताया कि 30 से 40 वर्ष की उम्र में कोलोरेक्टल कैंसर के मामले बढ़ रहे हैं — एक प्रवृत्ति जो पहले वृद्धावस्था से जुड़ी मानी जाती थी।

समाधान: '10 का नियम' और जीवनशैली में बदलाव

डॉ. कलापाला ने '10 का नियम' का सुझाव दिया — यदि आप मोटे हैं, तो केवल 10 प्रतिशत वजन कम करना भी स्वास्थ्य पर सकारात्मक प्रभाव डाल सकता है। यह लक्ष्य तेल और प्रोसेस्ड फूड के उपयोग को 10 प्रतिशत घटाने के राष्ट्रीय सार्वजनिक स्वास्थ्य उद्देश्यों के अनुरूप है। उन्होंने चार मुख्य उपाय सुझाए: हर 30 से 60 मिनट पर एक-दो मिनट का वॉकिंग ब्रेक लेना; हाई-फाइबर और साबुत खाने को प्राथमिकता देना तथा मीठे पेय पदार्थों को आहार से हटाना; सक्रिय तनाव प्रबंधन अपनाना; और नियमित स्वास्थ्य जाँच के साथ AI-संचालित हेल्थ मॉनिटरिंग टूल्स का उपयोग करना।

वजन घटाने के नवीनतम चिकित्सा विकल्पों पर बात करते हुए उन्होंने बताया कि GLP-1 रिसेप्टर एगोनिस्ट दवाएँ भूख को प्रभावी ढंग से कम करती हैं, लेकिन इन्हें बंद करने पर अक्सर वजन फिर से बढ़ जाता है। अधिक गंभीर मामलों में एंडोस्कोपिक स्लीव गैस्ट्रोप्लास्टी (ESG) जैसी प्रक्रियाएँ — जो बिना सर्जिकल चीरे के पेट का आकार कम करती हैं — एक विकल्प के रूप में उभरी हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि भारत को जीवनशैली और चिकित्सा हस्तक्षेप दोनों को एक साथ अपनाना होगा, अन्यथा मेटाबोलिक बीमारियों का बोझ अगले दशक में और विकराल हो सकता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि एक सामान्य प्रवृत्ति बन रही है — फिर भी स्कूली पाठ्यक्रम में पोषण शिक्षा और खेल के मैदान दोनों हाशिये पर हैं। एंटासिड की ओवर-द-काउंटर बिक्री पर कोई प्रभावी नियमन न होना दर्शाता है कि भारत में दवा नियामक ढाँचा अभी भी उपभोक्ता सुरक्षा से अधिक व्यावसायिक सुविधा को प्राथमिकता देता है।
RashtraPress
6 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

प्रोसेस्ड फूड भारतीयों की मेटाबोलिक हेल्थ को कैसे नुकसान पहुँचाता है?
डॉ. राकेश कलापाला के अनुसार, अधिक कार्बोहाइड्रेट, खराब फैट और रिफाइंड शुगर से भरे प्रोसेस्ड फूड देर से पेट भरने का अहसास कराते हैं, जिससे अधिक खाने की प्रवृत्ति बढ़ती है। इससे वजन बढ़ना, फैटी लिवर, डायबिटीज और अन्य सिस्टमिक समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं।
भारत में बचपन में मोटापे की स्थिति कितनी गंभीर है?
ICMR और नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे के आँकड़ों के अनुसार भारत में बचपन में मोटापे की दर 15 से 18 प्रतिशत तक पहुँच चुकी है। डॉ. कलापाला के अनुसार इसकी जड़ें अक्सर गर्भावस्था में ही शुरू हो जाती हैं — यदि माँ का वजन अधिक हो, तो यह प्रवृत्ति बच्चे में भी जा सकती है।
फैटी लिवर के लक्षण कब तक छुपे रह सकते हैं?
डॉ. कलापाला के अनुसार फैटी लिवर तब तक चुपचाप नुकसान पहुँचाता रहता है जब तक अल्ट्रासाउंड या लिवर फंक्शन टेस्ट में सामने न आए। तब तक लिवर को काफी नुकसान हो चुका होता है, इसलिए नियमित जाँच ज़रूरी है।
एंटासिड दवाओं के लंबे समय तक इस्तेमाल से क्या खतरे हैं?
डॉ. कलापाला ने चेतावनी दी है कि GERD के लिए एंटासिड का बिना निगरानी के दीर्घकालिक उपयोग हड्डियों और किडनी की सेहत को नुकसान पहुँचा सकता है। मेडिकल साहित्य में इसे गैस्ट्रिक कैंसर के बढ़ते जोखिम से भी जोड़ा गया है।
मोटापे से निपटने के लिए डॉ. कलापाला का '10 का नियम' क्या है?
'10 का नियम' के अनुसार यदि आप मोटे हैं, तो केवल 10 प्रतिशत वजन कम करना भी स्वास्थ्य पर सकारात्मक असर डाल सकता है। यह लक्ष्य तेल और प्रोसेस्ड फूड के उपयोग को 10 प्रतिशत घटाने के राष्ट्रीय सार्वजनिक स्वास्थ्य उद्देश्यों के अनुरूप है।
राष्ट्र प्रेस
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