क्या राही मासूम रज़ा ने परदेस में रहकर देस के चांद को देखा?

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क्या राही मासूम रज़ा ने परदेस में रहकर देस के चांद को देखा?

सारांश

राही मासूम रज़ा की जीवन यात्रा एक संघर्ष की कहानी है, जिसने हिंदी और उर्दू साहित्य को समृद्ध किया। उनकी रचनाएं गंगा-जमुनी तहजीब की गहराई को दर्शाती हैं, जो सामाजिक एकता के संदेश को फैलाती हैं। जानिए उनके जीवन और कार्यों के बारे में।

Key Takeaways

  • राही मासूम रज़ा का जीवन संघर्ष और सृजनात्मकता का प्रतीक है।
  • उनकी रचनाएं गंगा-जमुनी तहजीब की सुगंध बिखेरती हैं।
  • उन्होंने भारतीय साहित्य में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
  • राही की लेखनी ने समाज को एकता का संदेश दिया।
  • उनकी रचनाएं आज भी प्रासंगिक हैं।

नई दिल्ली, 31 अगस्त (राष्ट्र प्रेस)। राही मासूम रज़ा एक ऐसे प्रसिद्ध साहित्यकार थे, जिन्होंने अपनी लेखनी के माध्यम से हिंदी और उर्दू साहित्य को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया। राही ने परदेस में रहकर देस के चांद को याद करते हुए लिखा, “हम तो हैं परदेस में, देस में निकला होगा चांद।” उनकी रचनाएं भारतीय संस्कृति की गंगा-जमुनी तहजीब की सुगंध बिखेरती हैं, जो सामाजिक एकता और मानवीय संवेदनाओं को गहराई से व्यक्त करती हैं।

राही मासूम रज़ा का जीवन एक प्रेरणादायक कहानी है, जो कठिनाइयों, संघर्षों और सृजनात्मकता से भरी पड़ी है। १ सितंबर १९२७ को उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले के गंगौली गांव में जन्मे राही को बचपन में पोलियो और टीबी जैसी गंभीर बीमारियों का सामना करना पड़ा, जिसके कारण उनकी पढ़ाई कुछ समय के लिए बाधित हुई। इस दौरान, घर में मौजूद किताबों ने उनका साथ दिया।

परिवार ने उनके मनोरंजन के लिए एक मुलाज़िम, कल्लू काका, को नियुक्त किया, जिनकी कहानियां सुनकर राही की कल्पना को नए पंख मिले। उन्होंने बाद में कहा कि अगर कल्लू काका न होते, तो शायद उनकी लेखनी में वह जादू न होता। गाजीपुर में प्रारंभिक शिक्षा के बाद, राही ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से उर्दू में पीएचडी की और “तिलिस्म-ए-होशरुबा” पर शोध किया। यहीं से उनकी साहित्यिक यात्रा शुरू हुई।

राही मासूम रज़ा की रचनाएं, जैसे “आधा गांव”, “टोपी शुक्ला”, “ओस की बूंद” और “नीम का पेड़”, भारतीय समाज की जटिलताओं को दर्शाती हैं। “आधा गांव” में उन्होंने भारत के बंटवारे के दर्द और गांव की सामाजिक संरचना को उकेरा, जो हिंदू-मुस्लिम एकता का प्रतीक है। यह उपन्यास गंगौली गांव के दो मुस्लिम जमींदार परिवारों की कहानी है, जो आपसी वैमनस्य और सामाजिक बदलावों के बीच प्यार, दुख और मानवीयता को चित्रित करता है।

“टोपी शुक्ला” में उन्होंने भारतीय राजनीति की कड़वी सच्चाइयों को हास्य और व्यंग्य के साथ प्रस्तुत किया। उन्होंने “कटरा बी आर्जू” में आपातकाल की क्रूरता को दर्शाया, जो स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की लड़ाई का प्रतीक बना।

राही ने साहित्य के साथ-साथ बॉलीवुड और टेलीविजन में भी अपनी अमिट छाप छोड़ी। उन्होंने “मिली”, “मैं तुलसी तेरे आंगन की”, “तवायफ” और “लम्हे” जैसी फिल्मों के लिए संवाद लिखे, जिसमें उनकी गहरी भावनात्मक समझ के लिए सराहा गया। उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि टीवी धारावाहिक “महाभारत” की पटकथा और संवाद थे, जो भारतीय टेलीविजन के इतिहास में मील का पत्थर साबित हुए। इस धारावाहिक ने उन्हें हर घर में पहचान दिलाई। उनके संवादों ने महाभारत के पात्रों को जीवंत कर दिया और दर्शकों के दिलों में गहरी छाप छोड़ी।

राही मासूम रज़ा का जीवन सामाजिक समरसता और साहित्यिक सृजन का प्रतीक रहा। उनकी शादी नय्यर जहां से हुई, जिसके कारण उन्हें सामाजिक विवाद का सामना करना पड़ा, लेकिन उन्होंने अपने सिद्धांतों पर अडिग रहकर समाज को एकता का संदेश दिया।

१५ मार्च १९९२ को उनका निधन हो गया, लेकिन उनकी रचनाएं आज भी प्रासंगिक हैं। राही की लेखनी गंगा की तरह बहती है, जो समाज को जोड़ने और मानवता को उजागर करने का काम करती है।

Point of View

बल्कि यह सामाजिक समरसता और एकता के लिए भी एक उदाहरण प्रस्तुत करता है। हमें उनके विचारों को समझने और फैलाने की आवश्यकता है।
NationPress
31/08/2025

Frequently Asked Questions

राही मासूम रज़ा की प्रमुख रचनाएं कौन सी हैं?
राही मासूम रज़ा की प्रमुख रचनाएं 'आधा गांव', 'टोपी शुक्ला', 'ओस की बूंद' और 'नीम का पेड़' हैं।
राही मासूम रज़ा ने किस विश्वविद्यालय से पीएचडी की?
राही मासूम रज़ा ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से उर्दू में पीएचडी की।
राही मासूम रज़ा का योगदान क्या है?
उन्होंने हिंदी और उर्दू साहित्य में महत्वपूर्ण योगदान दिया और भारतीय टेलीविजन के लिए भी चर्चित पटकथाएं लिखीं।
राही मासूम रज़ा की मृत्यु कब हुई?
राही मासूम रज़ा का निधन 15 मार्च 1992 को हुआ।
क्या राही मासूम रज़ा की रचनाएं आज भी प्रासंगिक हैं?
हाँ, राही मासूम रज़ा की रचनाएं आज भी प्रासंगिक हैं और सामाजिक मुद्दों पर गहन विचार प्रस्तुत करती हैं।