राहुल गांधी का आरोप: बड़े सार्वजनिक ठेकों से बहुजन उद्यमियों को किया गया दूर
सारांश
Key Takeaways
- राहुल गांधी ने ठेकों में दलित, आदिवासी और ओबीसी उद्यमियों की अनुपस्थिति पर सवाल उठाए।
- सरकार के पास इन उद्यमियों को दिए गए ठेकों का कोई डेटा नहीं है।
- लघु एवं मध्यम उद्यमों से 25 प्रतिशत सार्वजनिक खरीद का लक्ष्य है।
- ठेकों की संख्या पिछले वर्षों में बढ़ी है।
- यह मुद्दा सामाजिक न्याय से गहराई से जुड़ा हुआ है।
नई दिल्ली, 7 अप्रैल (राष्ट्र प्रेस)। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता राहुल गांधी ने भारत में सार्वजनिक निर्माण एवं इंफ्रास्ट्रक्चर के ठेकों में दलित, आदिवासी और अन्य पिछड़े वर्ग (ओबीसी) के उद्यमियों की अनुपस्थिति को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं।
उन्होंने अपने फेसबुक पोस्ट में लिखा कि पिछले वर्ष 16,500 करोड़ रुपए के सार्वजनिक निर्माण ठेकों में कितने ठेके दलित, आदिवासी और पिछड़े वर्ग के व्यवसायों को प्राप्त हुए, इसका पता लगाने की कोशिश की तो नतीजा बेहद चिंताजनक था। सरकार के पास इस विषय में कोई डेटा उपलब्ध नहीं है।
वास्तव में, राहुल गांधी ने लोकसभा में एक प्रश्न (अतारांकित प्रश्न संख्या 6264) उठाया था, जिसमें पिछले पांच वर्षों में आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय द्वारा जारी किए गए सार्वजनिक निर्माण और इंफ्रास्ट्रक्चर ठेकों की कुल संख्या और मूल्य की जानकारी मांगी गई थी। साथ ही यह भी पूछा गया कि कितने ठेके एससी/एसटी और ओबीसी स्वामित्व वाले व्यवसायों को दिए गए और क्या सरकार ने 4 प्रतिशत का लक्ष्य पूरा किया है, जो एससी/एसटी स्वामित्व उद्यमों के लिए निर्धारित किया गया है। राहुल गांधी ने यह भी पूछा कि क्या ओबीसी स्वामित्व व्यवसायों के लिए भी ऐसा लक्ष्य बनाने का विचार है।
इस प्रश्न के उत्तर में केंद्रीय आवास और शहरी मामलों के राज्य मंत्री तोखन साहू ने कहा कि कुल ठेकों का डेटा उपलब्ध है, लेकिन एससी/एसटी और ओबीसी स्वामित्व वाले व्यवसायों को दिए गए ठेकों का कोई मौजूदा ट्रैकिंग सिस्टम नहीं है। इसके पीछे वजह बताई गई कि निर्माण ठेकों के लिए यह ट्रैकिंग अनिवार्य नहीं है।
राहुल गांधी ने कहा कि सरकार की नीति यह कहती है कि लघु एवं मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) से कम से कम 25 प्रतिशत सार्वजनिक खरीद होनी चाहिए, जिसमें अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति के स्वामित्व वाले व्यवसायों के लिए 4 प्रतिशत शामिल है, लेकिन सबसे बड़े और लाभकारी ठेकों, यानी सार्वजनिक निर्माण के ठेकों में, सरकार का कहना है कि यह अनिवार्य नहीं है।
राहुल गांधी ने इसे मात्र एक प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि एक ऐसा ढांचा बताया है जो जानबूझकर मोदी सरकार की नीतियों के माध्यम से सामाजिक और आर्थिक न्याय को कमजोर करता है।
संसदीय डेटा के अनुसार, पिछले पांच वर्षों में केंद्रीय सार्वजनिक निर्माण ठेकों की संख्या और मूल्य लगातार बढ़ते रहे हैं। केवल 2025-26 में ही 8,402 ठेके दिए गए, जिनकी कुल कीमत 16,587 करोड़ रुपए है।